वृंदावन द्वादशी व्रतं
तुलसी विष्णुविवाहविधिः
देशकालौ ततः स्मृत्वा गणेशं तत्र पूजयेत् |
पुण्याहं वाचयित्वाऽथ नांदीश्राद्धं समाचरेत् ||1||
वेदवाद्यादिनिर्घोषैः विष्णुमूर्तिं समानयेत् |
तुलस्या निकटे सा तु स्थाप्या चांतर्हिता घटैः ||2||
आगच्छ भगवन् देव अर्हयिष्यामि केशव |
तुभ्यं ददामि तुलसीं सर्वकामप्रदो भव ||3||
दद्याद् द्विवारमर्घ्यं च पाद्यं विष्टरमेव च |
ततश्चाचमनीयं च त्रिरुक्त्वा च प्रदापयेत् ||4||
पयो दधि घृतं क्षौद्रं कांस्यपात्रपुटे घृतं |
मधुपर्कं गृहाण त्वं वासुदव नमोऽस्तु ते ||5||
ततो ये स्वकुलाचाराः कर्तव्या विष्णुतुष्टये |
हरिद्रालेपनाभ्यंगः कार्यः सर्वं विधाय च ||6||
गोधूलि समये पूज्यौ तुलसीकेशवौ पुनः |
पृथक्पृथक्ततः कार्यौ सम्मुखं मंगलं पठेत् ||7||
इष्टदेशे भास्वरे तु संकल्पं तु समर्पयेत् |
स्वगोत्रप्रवरानुक्त्चा तथा त्रिपुरुषादिकं ||8||
अनादिमध्यनिधन त्रैलोक्यप्रतिपालक |
इमां गृहाण तुलसीं विवाहविधिनेश्वर ||9||
पार्वती बीजसंभूतां वृंदाभस्मनि संस्थितां |
अनादिमध्यनिधनां वल्लभां ते ददाम्यहं ||10||
पयोघृतैश्च सेवाभिः कन्यावद्वर्धितां मया |
त्वत्प्रियां तुलसीं तुभ्यं दास्यामि त्वं गृहाण भोः ||11||
एवं दत्वा तु तुलसीं पश्चात्तौ पूजयेत्ततः |
रात्रौ जागरणं कुर्यात् विवाहोत्सवपूर्वकं ||12||
प्रतिवर्षमिदं कुर्यात् कार्तिकव्रतसिद्धये |
ततः प्रभातसमये तुलसीं विष्णुमर्चयेत् ||13||
वह्नि संस्थापनं कृत्वा द्वादशाक्षरविद्यया |
पायसाज्य क्षौद्रतिलैः हुनेदष्टोत्तरं शतं ||14||
ततः स्विष्टकृतं हुत्वा दद्यात्पूर्णाहुतिं ततः |
आचार्यं च समभ्यर्च्य होमशेषं समापयेत् ||15||
चतुरो वार्षिकान्मासान् नियमं यस्य यत्कृतं |
कथयित्वा द्विजेभ्यस्तत् तथाऽन्यत्परिपूजयेत् ||16||
इदं व्रतं मया देव कृतं प्रीत्यै तव प्रभो |
नूनं संपूर्णतां यातु त्वत्प्रसादात् जनार्दन ||17||
रेवतीतुर्यचरणे द्वादशीसंयुते नरः |
न कुर्यात्पारणां कुर्वन् व्रतं निष्फलतां व्रजेत् ||18||
ततो येषां पदार्थानां वर्जनं तु कृतं भवेत् |
चातुर्मास्येऽथवा तूर्जे ब्राह्मणेभ्यः समर्पयेत् ||19||
ततः सर्वं समश्नीयात् यद्यदुक्तं व्रते स्थितः |
दंपतिभ्यां सहैवात्र भोक्तव्यं वा द्विजैः सह ||20||
ततो भुक्तोत्तरं यानि गलितानि दलानि च |
तुलस्यास्तानि भुक्त्वा तु सर्वपापैः प्रमुच्यते ||21||
भोजनानंतरं विष्णोरर्पितं तुलसीदलं |
भक्षणात्पापनिर्मुक्तिः चांद्रायण शताधिकं ||22||
इक्षुखंडं तथा धात्रीफलं पूगीफलं तथा | |
भुक्त्वा तु भोजनस्यांते तस्योच्छिष्टं विनश्यति ||23||
एषु त्रिषु न भुक्तं चेदैककमपि येन तु |
ज्ञेयं उच्छिष्ट आवर्षं नरोऽसौ नात्र संशयः ||24||
ततः सायं पुनः पूज्यौ इक्षुवंशैश्च मंडितौ |
तुलसीवासुदेवौ च कृतकृत्यो भवेत्ततः ||25||
ततो विसर्जनं कुर्यात् दत्वा देयादिकं हरेः |
वैकुंठं गच्छ भगवन् तुलस्या सहितः प्रभो ||26||
मत्कृतं पूजनं गृह्य संतुष्टो भव सर्वदा |
गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थानं परमेश्वर ||27||
यत्र ब्रह्मादयो देवाः तत्र गच्छ जनार्दन |
एवं विसृज्य देवेशं आचार्याय प्रदापयेत् ||28||
मूर्त्यादिकं सर्वमेव कृतकृत्यो भवेन्नरः |
प्रतिवर्षं करोत्येवं तुलस्युद्वाहनं शुभं ||29||
इह लोके परत्रापि विपुलं सद्यशो भवेत् |
प्रतिवर्षं तु यः कुर्यात् तुलसीकरपीडनं |
भक्तिमान् धनधान्यैश्च युक्तो भवति निश्चितं ||30||
इति सनत्कुमारसंहितांतर्गतं वृंदावनद्वादशीव्रतं संपूर्णं |
अर्थ
वृंदावन द्वादशी व्रतं कार्तिक मास की द्वादशी तिथि पर आयोजित होने वाले तुलसी-विष्णु विवाह की पवित्र विधि का वर्णन करता है। यह व्रत भक्ति, पवित्रता, दाम्पत्य सुख और मोक्ष प्राप्ति का प्रतीक है। व्रत का आरंभ विघ्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा, पुण्याहवाचन और नांदी श्राद्ध से होता है। वैदिक मंत्रों और वाद्यों के घोष के साथ भगवान विष्णु को आमंत्रित कर तुलसी के समीप स्थापित किया जाता है। यह समारोह देवी-देवताओं का आशीर्वाद आमंत्रित कर एक शुभ वातावरण का निर्माण करता है।
व्रत के अगले चरणों में, भक्त भगवान विष्णु को विशेष अर्पण करते हैं। 'हे केशव! मैं आपको तुलसी अर्पित करता हूँ, आप सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले हों' ऐसी प्रार्थना के साथ पाद्य, अर्घ्य और आचमनीय अर्पित किए जाते हैं। दूध, दही, घी और शहद से बना मधुपरक कांस्य पात्र में रखकर 'वासुदेव नमोऽस्तु ते' कहकर चढ़ाया जाता है। इसके पश्चात् हरिद्रा लेपन और अभ्यंग स्नान जैसे अनुष्ठान किए जाते हैं, जो दिव्य युगल के पवित्र शुद्धिकरण का प्रतीक हैं।
गोधूलि वेला में, तुलसी और केशव की पुनः पूजा की जाती है और संकल्प किया जाता है। इस संकल्प में भक्त अपने गोत्र और प्रवर का उल्लेख करते हुए तीन पीढ़ियों के पूर्वजों का स्मरण करते हैं। 'अनादि, मध्य और अंत रहित प्रभु! पार्वती के बीज से उत्पन्न, वृंदा रूपिणी तुलसी को मैं आपसे विवाह के रूप में समर्पित करता हूँ' इन मंत्रों का उच्चारण तुलसी के दिव्य उद्भव और विष्णु के साथ उनके अटूट संबंध को दर्शाता है। पूरी रात जागरण कर, भजन-कीर्तन और प्रार्थनाओं के माध्यम से तुलसी-विष्णु विवाहोत्सव मनाया जाता है।
अगले दिन सुबह, तुलसी और विष्णु की पुनः पूजा की जाती है, जिसके बाद द्वादशाक्षर मंत्र के साथ अष्टोत्तर शत होम किया जाता है। होम के समापन पर, आचार्य को सम्मानित किया जाता है। व्रत के नियमों का विवरण देकर, 'यह आपकी प्रसन्नता के लिए है' कहकर विष्णु को समर्पित किया जाता है। द्वादशी के दिन पारण नहीं करना चाहिए; इसके बजाय, विष्णु को अर्पित किए गए तुलसी दल का सेवन करने से सभी पापों का नाश होता है। भोजन के उपरांत इक्षु (गन्ना), धात्रीफल (आंवला) और पूगीफल (सुपारी) का सेवन करना चाहिए। संध्याकाल में, तुलसी और वासुदेव की पुनः पूजा कर, उन्हें विश्राम दिया जाता है और विसर्जन किया जाता है।
जो भक्त इस व्रत को श्रद्धा और भक्ति से करते हैं, उन्हें इस लोक में कीर्ति, धन, सुख और परलोक में वैकुंठ की प्राप्ति होती है। तुलसी-विष्णु विवाह करने वाले भक्त धन, धान्य और सौभाग्य से परिपूर्ण रहते हैं। यह व्रत भक्त के हृदय में सत्य संकल्प, दैवी अनुराग और धर्मनिष्ठा को पुनः जागृत करता है। यह जीवन में ऐश्वर्य, स्वास्थ्य, संतान, धर्म और भक्ति – इन पाँच वरदानों को प्रदान करता है, जिससे समग्र कल्याण होता है।
लाभ (Benefits):
- सर्व पाप मुक्ति: कार्तिक मास की द्वादशी पर यह व्रत करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है।
- इहलोक और परलोक सुख: इस लोक में प्रसिद्धि, धन, सुख और परलोक में वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।
- दाम्पत्य सुख और संतान प्राप्ति: तुलसी-विष्णु विवाह आदर्श दाम्पत्य का प्रतीक है, जो दाम्पत्य सुख और उत्तम संतान का आशीर्वाद प्रदान करता है।
- धन-धान्य समृद्धि: इस व्रत का पालन करने वाले भक्त धन, धान्य और सभी प्रकार के सौभाग्य से परिपूर्ण होते हैं।
- आध्यात्मिक उन्नति: यह भक्त के हृदय में सत्य संकल्प, दैवी प्रेम और धर्मनिष्ठा को पुनः जागृत कर आध्यात्मिक रूप से उन्नत करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
वृंदावन द्वादशी व्रतं क्या है?
यह व्रत कब और कैसे करना चाहिए?
वृंदावन द्वादशी व्रत करने से क्या लाभ मिलते हैं?
वृंदावन द्वादशी व्रत किसे करना चाहिए?
व्रत के दौरान किन मंत्रों का जाप करना चाहिए?
वृंदावन द्वादशी व्रत का मूल क्या है?
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