श्री तुलसी स्तवराजः
शौनकः --
सूत सूत महाप्राज्ञ सर्वशास्रविशारद |
ब्रूहि मे स्तवराजं तु तुलस्याः पुण्यवर्धनं ||1||
श्री सूतः --
साधु साधु महाभाग कृतः प्रश्नस्त्वयाऽनघ |
तुलस्याः स्तवराजं तु को नु वर्णयितुं क्षमः ||2||
इह लोके परत्रापि ब्रह्मणाऽपि न शक्यते |
तुलसीकाननं दृष्ट्वा यत्र कुत्रापि वै स्थले ||3||
स्मरणात्कीर्तनाद् ध्यानात् सर्वपापैः प्रमुच्यते |
किमुत स्तवराजेन स्तुवतो मुक्तिरस्य वै ||4||
भविशष्यतीति संदेहो रौरवं नरकं व्रजेत् |
तुलसीस्तवराजस्य छंदोऽनुष्टुप् प्रकीर्तितं |
ऋषिर्नारायणो देवो देवता श्रीरुदीरिता ||5||
श्रीरिति बीजं, तुमिति कीलकं, लमिति शक्तिः,
श्रीमिति दिग्बंधः | नम इति सर्वभूतोच्वाटनं ||
अंगन्यासः -
ॐ श्री हृदयाय नमः | ॐ तुं शिरसे स्वाहा |
ॐ लं शिखायै वषट् | ॐ स्यैं कवचाय हुं |
ॐ नं नेत्रत्रयाय वौषट्| ॐ मः अस्राय फट् |
भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बंधः ||
ध्यानं -
चतुर्बाहुयुतां देवीं शंखपुस्तकधारिणीं |
पद्माक्षमालां पुष्पं च धारिणीं पुण्यदायिनीं ||6||
अमृताब्धिसमुत्पन्ने सर्वशोकविनाशिनी |
सर्वसौभाग्यदात्री(यी ) त्वं तुलसि (सी) रक्षणं कुरु ||7||
दक्षिणे लोकविख्याते विष्णुधृतशरीरिणि |
विश्वरूपी विश्वकर्त्री तुलसी रक्षणं कुरु ||8||
सर्वलोकमये(यी ) पूज्ये सर्वसंपत्प्रदायिनि |
सर्वतापप्रशमनि तुलसी रक्षणं कुरु ||9||
महिता लोकपूज्या च महिषासुरभंजनि |
करवीरपुरावासे तुलसी रक्षणं कुरु ||10||
मायावती भगवती महिला भद्रकालिका |
मोहिनी संगता शौरी तुलसी रक्षणं कुरु ||11||
महालक्ष्मि महाकाली सर्वत्र विजया जया |
अशरीरी शरीरी च तुलसी रक्षणं कुरु ||12||
ब्रह्माणी शंकरी सौम्या वैष्णवी च स्वधा तथा |
देवसेना महारौद्री तुलसी रक्षणं कुरु ||13||
चामुंडा चंचला भीमा रेणुका मारिका तथा |
पद्माक्षी पञ्ममाला च तुलसी रक्षणं कुरु ||14||
शुभाशुभप्रदात्री त्वं वृषभासुरभंजनी |
वंजुला जर्झरी क्रूरा तुलसी रक्षणं कुरु ||15||
अतिगुह्यतमं दिव्यं पुत्रपौत्रप्रवर्धनं |
नास्तिकाय प्रदेयं न नाभक्ताय कदाचन ||16||
शुश्रूषवे च भक्ताय प्रदेयं हितमिच्छता |
विष्णुभक्ताय पूज्याय वैराग्य गुणशालिने ||17||
भृगुवारे भौमवारे प्रदोषे च विशेषतः |
प्रभाते सर्वदा जप्यं लिखित्वा पुस्तकं यदि ||18||
स्थापितं पूजितं चेत्स्यात् सर्वरोगैः प्रमुच्यते |
महालक्ष्मीः सिंधुतीरे विष्णुना प्रभविष्णुना ||19||
साऽपि विधये प्रोक्तवती तेनोक्तं नारदाय वै |
नारदः प्रोक्तवान्मह्यं तदेतत्प्रोक्तवानहं ||20||
एवं परंपराप्राप्तं सर्वशास्रार्थ संग्रहं |
तुलसीकवचं पुण्यं तस्मात्स्तोत्रं महात्फलं ||21||
तस्मात्कोटिगुणं पुण्यं तुलसीस्तवराजतः |
पुत्रार्थी पुत्रमाप्नोति राज्यार्थी राज्यमाप्नुयात् ||22||
किं तेन बहुनोक्तेन मोक्षार्थी मोक्षामाप्नुयात्त् |
सप्तद्वीपवतीं पृथ्वीं दत्वा यत्फलमाप्नुयात् |
तत्फलं समवाप्नोति तुलसीपत्रदानतः ||23||
इति ब्रह्मपुराणांतर्गतः तुलसीस्तवराजः संपूर्णः |
अर्थ
श्री तुलसी स्तवराज, भगवती तुलसी देवी की महिमा का गुणगान करने वाला एक अत्यंत पवित्र स्तोत्र है। महाज्ञानी शौनक महर्षि ने सूत महर्षि से पूछा, 'हे महाप्राज्ञ, सर्वशास्त्र विशारद, मुझे तुलसी देवी का पुण्यवर्धक स्तवराज सुनाइए।' इस पर सूत महर्षि ने उत्तर दिया, 'आपका प्रश्न अत्यंत पुण्यप्रद है। तुलसी देवी के स्तवराज का वर्णन करना तो ब्रह्मा जी के लिए भी कठिन है।' यह स्तोत्र तुलसी देवी की परम वैष्णव शक्ति का विस्तृत वर्णन करता है।
इस स्तोत्र की महिमा अपरंपार है। शास्त्रों में कहा गया है कि केवल तुलसी वन के दर्शन मात्र से या तुलसी देवी का स्मरण करने, जप करने अथवा ध्यान करने से समस्त पापों का नाश हो जाता है। ऐसे में, श्री तुलसी स्तवराज का पाठ करने वालों को मोक्ष की प्राप्ति सहज ही हो जाती है, इसमें कोई संदेह नहीं। इस स्तोत्र के ऋषि नारायण, छंद अनुष्टुप और देवता श्री तुलसी देवी हैं। स्तोत्र में अंगन्यास और दिग्बंध की विधि का भी उल्लेख है, जो पाठ की शुद्धता और प्रभाव को बढ़ाता है।
तुलसी देवी का ध्यान रूप अत्यंत मनमोहक है। ध्यान में, वे चतुर्भुजा रूप में प्रकट होती हैं, जिनके हाथों में शंख, पुस्तक, पुष्प और जपमाला सुशोभित होती है, और वे दिव्य पवित्रता बिखेरती हैं। उन्हें अमृत सागर से उत्पन्न हुई, दुःखों को दूर करने वाली और समृद्धि प्रदान करने वाली बताया गया है। वे भगवान विष्णु के साथ एकाकार मानी जाती हैं। यह स्तोत्र वर्णन करता है कि वे दरिद्रता का नाश करने वाली, महिषासुर का संहार करने वाली और महालक्ष्मी, काली, चामुंडा, भीमा, रेणुका और भद्रकाली जैसे अनेक देवी रूपों में प्रकट होती हैं।
यह स्तोत्र अत्यंत गोपनीय है और इसे केवल सच्चे भक्तों के साथ ही साझा किया जाना चाहिए, नास्तिकों के साथ नहीं, ऐसा स्पष्ट निर्देश दिया गया है। विशेष रूप से शुक्रवार, मंगलवार या प्रदोष काल में इस स्तोत्र का पाठ करने से सभी रोगों का नाश होता है। यह पवित्र स्तोत्र ब्रह्मा जी से नारद जी को और नारद जी से सूत महर्षि को प्राप्त हुआ है, जो इसकी प्राचीनता और प्रामाणिकता को दर्शाता है। इसका पाठ करने वाला पुत्र सौभाग्य, राज्याधिकार, धन और अंततः मोक्ष प्राप्त करता है। यहां तक कि एक तुलसी पत्र का दान भी सप्तद्वीप पृथ्वी के दान के समान पुण्य फल प्रदान करता है।
लाभ (Benefits):
- समस्त पापों का नाश: तुलसी देवी के स्मरण, जप, ध्यान या इस स्तवराज के पाठ से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
- मोक्ष की प्राप्ति: इस स्तोत्र का निष्ठापूर्वक पाठ करने वालों को सहज ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- रोगों से मुक्ति: शुक्रवार, मंगलवार या प्रदोष काल में पाठ करने से सभी प्रकार के रोग दूर होते हैं।
- धन और संतान सुख: इस स्तोत्र के पाठ से पुत्र सौभाग्य, राज्याधिकार और धन की प्राप्ति होती है।
- दिव्य कृपा और शांति: तुलसी देवी के विभिन्न रूपों का स्मरण करने से जीवन में शांति, समृद्धि और दैवीय कृपा प्राप्त होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री तुलसी स्तवराज क्या है?
श्री तुलसी स्तवराज का पाठ कब करना चाहिए?
श्री तुलसी स्तवराज पाठ के प्रमुख लाभ क्या हैं?
यह स्तोत्र कौन पढ़ सकता है?
श्री तुलसी स्तवराज का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री तुलसी स्तवराज का उद्गम क्या है?
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