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श्री तुलसी देवि अष्टोत्तर शतनामावळिः

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अष्टोत्तर108 नाम
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  1. ॐ श्री तुलसीदेव्यै नमः
  2. ॐ श्री सुख्यै- श्री भद्रायै नमः
  3. ॐ श्री मनोज्ञन पल्लवयै नमः
  4. ॐ पुरंदरसतीपूज्यायै नमः
  5. ॐ पुण्यदायै नमः
  6. ॐ पुण्यरूपिण्यै नमः
  7. ॐ ज्ञानविज्ञानजनन्यै नमः
  8. ॐ तत्त्वज्ञानप्रियायै नमः
  9. ॐ जानकिदुःखशमन्यै नमः
  10. ॐ जनार्धनप्रियायै नमः
  11. ॐ सर्वकल्मषसंहर्यै नमः
  12. ॐ स्मरकोटिसमप्रभायै नमः
  13. ॐ पांचालिपूज्यचरणायै नमः
  14. ॐ पापारण्यदवानलायै नमः
  15. ॐ कामितार्थ प्रदायै नमः
  16. ॐ गौरीशारदासंसेवितायै नमः
  17. ॐ वंदारुजनमंदारायै नमः
  18. ॐ निलंपाभरणसक्तयै नमः
  19. ॐ लक्ष्मीचंद्रसहोदर्यै नमः
  20. ॐ सनकादिमुनिध्येयायै नमः
  21. ॐ कृष्णानंदजनित्र्यै नमः
  22. ॐ चिदानंदस्वरूपिन्यै नमः
  23. ॐ नारायण्यै नमः
  24. ॐ सत्यरूपायै नमः
  25. ॐ मायातीतायै नमः
  26. ॐ महेश्वर्यै नमः
  27. ॐ वदनच्चविनिर्धूतराका नमः
  28. ॐ पूर्णनिशाकरायै नमः
  29. ॐ रोचनापंकतिलकल नमः
  30. ॐ सन्निटलभासुरायै नमः
  31. ॐ शुभप्रदायै नमः
  32. ॐ शुद्धायै,- पल्लवोष्ट्यै नमः
  33. ॐ पद्ममुख्यै नमः
  34. ॐ पुल्लपद्मदळैक्षणायै नमः
  35. ॐ चांपेयकळिकाकारनासा नमः
  36. ॐ दंडविराजितायै नमः
  37. ॐ मंदस्मितायै नमः
  38. ॐ मंजुलांग्यै नमः
  39. ॐ माधवप्रियाभामिन्यै नमः
  40. ॐ माणिक्यकंकळधरायै नमः
  41. ॐ मणिकुंडलमंडितायै नमः
  42. ॐ इंद्रसंपत्कर्यै नमः
  43. ॐ शक्त्यै नमः
  44. ॐ इंद्रगोपनीभांशुकायै नमः
  45. ॐ क्षीराब्दितनयायै नमः
  46. ॐ क्षीरसागरसंक्षीवायै नमः
  47. ॐ शांतिकांतिगुणोपॆतायै नमः
  48. ॐ बृंदानुगुणसंपत्र्यै नमः
  49. ॐ पूतात्मिकायै नमः
  50. ॐ पूतनादिस्वरूपिण्यै नमः
  51. ॐ योगध्येयायै नमः
  52. ॐ योगानंदपदायै नमः
  53. ॐ चतुर्वर्गप्रदाय नमः
  54. ॐ चातुर्वर्णयिकपावनायै नमः
  55. ॐ त्रिलोकजनन्यै नमः
  56. ॐ ग्रहमेधिसमाराध्यायै नमः
  57. ॐ सदानांगणपावनायै नमः
  58. ॐ मुनींद्रहृदयावासायै नमः
  59. ॐ मूलप्रकृतिसंज्ञिकायै नमः
  60. ॐ ब्रह्मरूपिण्यै नमः
  61. ॐ परंज्योतिष्यै नमः
  62. ॐ अवाजनसगोचरायै नमः
  63. ॐ पंचभूतात्मिकायै नमः
  64. ॐ पंचकलात्मिकायै नमः
  65. ॐ योगायै नमः
  66. ॐ अच्युतायै नमः
  67. ॐ यज्ञरूपिण्यै नमः
  68. ॐ संसारदुःखशमन्यै नमः
  69. ॐ सृष्टि स्थित्यंतकारिण्यै नमः
  70. ॐ सर्वप्रपंचनिर्मात्र्यै नमः
  71. ॐ वैष्णव्यै नमः
  72. ॐ मधुरस्वरूपायै नमः
  73. ॐ नितरीश्वरायै नमः
  74. ॐ निर्गुणायै,- नित्यायै नमः
  75. ॐ निराटंकायै नमः
  76. ॐ दीनजनपालनतत्परायै नमः
  77. ॐ रणत्किंकिणिकाजालरत्न नमः
  78. ॐ कांचीलसत्कटायै नमः
  79. ॐ चलन्मंजीरचरणायै नमः
  80. ॐ चतुरानसेवितायै नमः
  81. ॐ अहोरात्रिकारिण्यै नमः
  82. ॐ मुक्ताहारभराक्रांतायै नमः
  83. ॐ मुद्रिकारत्नभासुरायै नमः
  84. ॐ सिद्दिप्रदायै नमः
  85. ॐ अमलायै,- कमलायै नमः
  86. ॐ लोकसुंदर्यै नमः
  87. ॐ हेमकुंभकुचद्वयायै नमः
  88. ॐ लसितकुंभचद्वयायै नमः
  89. ॐ चंचलायै,- लक्ष्म्यॆ नमः
  90. ॐ श्रीकृष्णप्रियायै नमः
  91. ॐ रामप्रियायै नमः
  92. ॐ विष्णुप्रियायै नमः
  93. ॐ शांकर्यै नमः
  94. ॐ शिवशंकर्यै नमः
  95. ॐ तुलस्यै नमः
  96. ॐ कुंदकुट्मलरदनायै नमः
  97. ॐ पक्वबिंबोष्यै नमः
  98. ॐ शरश्चंद्रिकायै नमः
  99. ॐ चांपेयनासिकायै महा
  100. ॐ कंबुसुंदरगळायै नमः
  101. ॐ तटिल्लतांग्यै नमः
  102. ॐ मत्तबंधुरकुंतलायै नमः
  103. ॐ नक्षत्रनिभानखायै नमः
  104. ॐ रंभानिभोरुयुग्मायै नमः
  105. ॐ सैकतश्रोण्यै नमः
  106. ॐ मदकंथीरवमध्यायै नमः
  107. ॐ कीरवाण्यै नमः
  108. ॐ श्री महा तुलसीदेव्यै नमः

|| इति श्री तुलसी देवी अष्टोत्तर शतनामावळि संपूर्णं  ||

अर्थ

श्री तुलसी देवी अष्टोत्तर शतनामावलिः, पवित्र तुलसी देवी के 108 दिव्य नामों का एक स्तोत्र है। हिन्दू धर्म में तुलसी को अत्यंत पूजनीय पौधा माना जाता है, जिसे केवल एक वनस्पति नहीं, बल्कि साक्षात् देवी का स्वरूप समझा जाता है। यह नामावलि तुलसी देवी के विभिन्न गुणों, महिमाओं और शक्तियों का वर्णन करती है, जो भक्तों को उनकी दिव्य कृपा प्राप्त करने में मार्गदर्शन करती है। विष्णु की प्रिय तुलसी को लक्ष्मी का अवतार और सभी लोकों के लिए शुभता लाने वाली शक्ति का प्रतीक माना गया है। इस स्तोत्र का पाठ भक्तों के मन और आत्मा को शुद्ध करता है।

यह अष्टोत्तर शतनामावलि तुलसी देवी के अद्भुत गुणों और उनकी दिव्य शक्तियों को गहराई से व्यक्त करती है। उन्हें 'सुखदायिनी', 'भद्रायै' (सुख और मंगल प्रदान करने वाली), 'पुण्यरूपिणी' (पुण्य का स्वरूप), 'ज्ञानविज्ञानजननी' (ज्ञान और विज्ञान की जननी) के रूप में वर्णित किया गया है। उन्हें जानकी (सीता) के दुःखों को दूर करने वाली और जनार्दन (विष्णु) की प्रिया बताया गया है। सभी पापों का नाश करने वाली और करोड़ों कामदेवों के समान कांति वाली कहकर उनकी स्तुति की जाती है। द्रौपदी द्वारा पूजित चरणों वाली और पापों के वन के लिए दावाग्नि के समान कहकर उनकी शक्ति का वर्णन किया गया है।

तुलसी भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली 'कामितार्थ प्रदायी' हैं और गौरी तथा शारदा देवी द्वारा सेवित हैं। भक्तों के लिए कल्पवृक्ष के समान मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली 'वंदारुजनमंदारा' कहकर उनकी करुणा को स्वीकारा गया है। वे लक्ष्मी और चंद्रमा की बहन हैं, सनकादि मुनियों द्वारा ध्यात हैं, कृष्ण को आनंद प्रदान करने वाली और चिदानंद स्वरूपिणी हैं। नारायणी, सत्यरूपिणी, मायातीत और महेश्वरी कहकर इस नामावलि में उन्हें परम शक्ति के रूप में स्तुति की गई है। उनके मुख की कांति पूर्णिमा के चंद्रमा को भी मात देती है, यह उनके दिव्य सौंदर्य को दर्शाता है।

इस पवित्र नामावलि का भक्तिपूर्वक पाठ करने से भक्त तुलसी देवी की पूर्ण कृपा के पात्र बनते हैं। वे केवल एक पौधा नहीं, बल्कि भगवान विष्णु की प्रिय पत्नी और समस्त शुभ कार्यों का मूल हैं। उनकी महिमा अपरंपार है, और उनकी पूजा करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है। इस नामावलि का प्रत्येक नाम तुलसी देवी के एक-एक दिव्य गुण को उजागर करता है और उनकी अनंत शक्ति और करुणा को समझाता है। प्रतिदिन तुलसी को जल अर्पित कर इस नामावलि का पाठ करना सभी पापों का निवारण कर मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।

प्रयोजन (Benefits):

  • आध्यात्मिक शुद्धि: इस नामावलि का निरंतर पाठ मन, शरीर और आत्मा को शुद्ध करता है, आंतरिक शांति प्रदान करता है।
  • समृद्धि और ऐश्वर्य: तुलसी देवी लक्ष्मी का स्वरूप हैं, अतः उनकी पूजा करने से घर में धन-संपत्ति और समृद्धि बढ़ती है।
  • स्वास्थ्य और सुरक्षा: तुलसी में औषधीय गुण होते हैं, और उनकी पूजा करने से उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त होता है तथा नकारात्मक शक्तियों से रक्षा मिलती है।
  • पाप निवारण: 'सर्वकल्मषसंहारी' और 'पापारण्यदवानलायै' जैसे नामों के अनुसार, उन्हें स्मरण करने से सभी पापों का नाश होता है।
  • मनोकामना सिद्धि: 'कामितार्थ प्रदायी' होने के कारण, भक्तों की सभी सद्भावनापूर्ण इच्छाएँ पूर्ण होती हैं।
  • विष्णु की कृपा: तुलसी देवी भगवान विष्णु की प्रिय हैं, इसलिए उनकी पूजा करने से भगवान विष्णु की कृपा भी प्राप्त होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री तुलसी देवी अष्टोत्तर शतनामावलिः क्या है?
यह पवित्र तुलसी देवी के 108 दिव्य नामों का संग्रह है, जो उनके विभिन्न गुणों, शक्तियों और महिमाओं की स्तुति करता है। हिन्दू धर्म में तुलसी को अत्यंत पूजनीय पौधा और देवी का स्वरूप माना जाता है।
इस नामावलि का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस नामावलि का पाठ प्रतिदिन, विशेषकर कार्तिक मास में, एकादशी के दिन या किसी भी शुभ दिन पर तुलसी के पौधे के पास शुद्ध मन और भक्ति के साथ करना चाहिए। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करके पाठ करना उत्तम है।
श्री तुलसी देवी अष्टोत्तर शतनामावलिः के पाठ के क्या लाभ हैं?
इस स्तोत्र का पाठ करने से आध्यात्मिक शुद्धि, घर में सुख, शांति, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य, सभी पापों का निवारण और मनोकामनाओं की सिद्धि होती है। भगवान विष्णु की कृपा भी प्राप्त होती है।
इस नामावलि का पाठ कौन कर सकता है?
कोई भी भक्त, लिंग भेद के बिना, जो तुलसी देवी में विश्वास और भक्ति रखता है, इस नामावलि का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से वैष्णव और पारिवारिक समृद्धि चाहने वाले इसका पाठ कर सकते हैं।
इस नामावलि का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
प्रतिदिन कम से कम एक बार पाठ करना शुभ माना जाता है। विशेष परिणामों के लिए, 11, 21, या 108 बार पाठ किया जा सकता है, यह आपकी श्रद्धा और समय पर निर्भर करता है।
इस स्तोत्र का उद्गम क्या है?
ये अष्टोत्तर शतनामावलियाँ पुराणों और विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में वर्णित हैं। यह तुलसी देवी को लक्ष्मी देवी का स्वरूप और भगवान विष्णु की प्रिय पत्नी के रूप में वर्णित करने वाली परंपरा का एक हिस्सा है।

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