उज्ज्वलवेंकटनाथ स्तोत्रं
रंगे तुंगे कवेराचलजकनकनद्यंतरंगे भुजंगे
शेषे शेषे विचिन्वन् जगदवननयं भात्यशेषेऽपि दोषे |
निद्रामुद्रां दधानो निखिलजनगुणध्यानसांद्रामतंद्रां
चिंतां यां तां वृषाद्रौ विरचयसि रमाकांत कांतां शुभांतां || 1 ||
तां चिंतां रंगक्लुप्तां वृषगिरिशिखरे सार्थयन् रंगनाथ
श्रीवत्सं वा विभूषां व्रणकिणमहिराट्सूरिक्लुप्तापराधं |
धृत्वा वात्सल्यमत्युज्ज्वलयितुमवने सत्क्रतौ बद्धदीक्षो
बध्नन्स्वीयांघ्रियूपे निखिलनरपशून् गौणरज्ज्वाऽसि यज्वा || 2 ||
ज्वालारावप्रनष्टासुरनिवहमहाश्रीरथांगाब्जहस्तं
श्रीरंगे चिंतितार्थान्निजजनविषये योक्तुकामं तदर्हान् |
द्रष्टुं दृष्ट्या समंताज्जगति वृषगिरेस्तुंगशृंगाधिरूढं
दुष्टादुष्टानवंतं निरुपधिकृपया श्रीनिवासं भजेऽन्तः || 3 ||
अंतः कांतश्श्रियो नस्सकरुणविलसद्दृक्तरंगैरपांगैः
सिंचन्मुंचन्कृपांभःकणगणभरितान्प्रेमपूरानपारान् |
रूपं चापादचूडं विशदमुपनयन् पंकजाक्षं समक्षं
धत्तां हृत्तापशांत्यै शिशिरमृदुलतानिर्जिताब्जे पदाब्जे || 4 ||
अब्जेन सदृशि संततमिंधे हृत्पुंडरीककुंडे यः |
जडिमार्त आश्रयेऽद्भुतपावकमेतं निरिंधनं ज्वलितं || 5 ||
ज्वलितनानानागशृंगगमणिगणोदितसुपरभागक
घननिभाभाभासुरांगक वृषगिरीश्वर वितर शं मम
सुजनतातातायिताखिलहितसुशीतलगुणगणालय
विसृमरारारादुदित्वररिपुभयंकरकरसुदर्शन |
सकलपापापारभीकरघनरवाकरसुदर सादरं
अवतु मामामाघसंभृतमगणनोचितगुण रमेश्वर
तव कृपा पापाटवीहतिदवहुताशनसमहिमा ध्रुवं
इतरथाथाथारमस्त्यघगणविमोचनमिह न किंचन || 6 ||
नगधराराराधने तव वृषगिरीश्वर य इह सादर-
रचितनानानामकौसुमतरुलसन्निजवनविभागज-
सुमकृतां तां तां शुभस्रजमुपहरन् सुखमहिपतिर्गुरुः
अतिरयायायासदायकभवभयानकशठरिपोः किल |
निगमगा गा गायता यतिपरिबृढेन तु रचय पूरुष
जितसभो भो भोगिरांगिरिपतिपदार्चनमिति नियोजितः
इह परं रंरम्यते स्म च तदुदितव्रणचुबुकभूषणे
इह रमे मे मेघरोचिषि भवति हारिणि हृदयरंगग || 7 ||
गतभये ये ये पदे तव रुचियुता भुवि वृषगिरीश्वर
विदधते ते ते पदार्चनमितरथा गतिविरहिता इति
मतिमता तातायिते त्वयि शरणतां हृदि कलयता परि-
चरणया यायाऽऽयता तव फणिगणाधिपगुरुवरेण तु |
विरचितां तांतां वनावलिमुपगते त्वयि विहरति द्रुम-
नहनगांगां गामिव श्रियमरचयत्तव स गुरुरस्य च
तदनु तांतां तां रमां परिजनगिरा द्रुतमवयतो निज-
शिशुदशाशाशालिनीमपि वितरतो वर वितर शं मम || 8 ||
ममतया यायाऽऽविला मतिरुदयते मम सपदि तां हर
करुणया याया शुभा मम वितर तामयि वृषगिरीश्वर
सदुदयायायासमृच्छसि न दरमप्यरिविदलनादिषु
मदुदयायायासमीप्ससि न तु कथं मम रिपुजयाय च |
मयि दयाया यासि केन तु न पदतां ननु निगद तन्मम
मम विभो भो भोगिनायकशयन मे मतमरिजयं दिश
परम याया या दया तव निरवधिं मयि झटिति तामयि
सुमहिमा मा माधव क्षतिमुपगमत्तव मम कृतेऽनघ || 9 ||
घटितपापापारदुर्भटपटलदुर्घटनिधनकारण
रणधरारारात्पलायननिजनिदर्शितबहुबलायन
दरवरारारावनाशन मधुविनाशन मम मनोधन
रिपुलयायायाहि पाहि न इदमरं मम कलय पावन |
सुतरसासासारदृक्ततिरतिशुभा तव निपततान्मयि
सहरमो मोमोत्तु संततमयि भवान्मयि वृषगिरावपि
प्रतिदिनं नंनम्यते मम मन उपेक्षिततदपरं त्वयि
तदरिपापापासनं कुरु वृषगिरीश्वर सततमुज्ज्वल || 10 ||
उज्ज्वलवेंकटनाथस्तोत्रं पठतां ध्रुवाऽरिविजयश्रीः |
श्रीरंगोक्तं लसति यदमृतं सारज्ञहृदयसारंगे || 11 ||
इति उज्ज्वलवेंकटनाथस्तोत्रं |
गमनिक: पैन इव्वबडिन स्तोत्रमु, ई
अर्थ
उज्ज्वलवेंकटनाथ स्तोत्रं भगवान श्रीनिवास की दिव्य महिमा, उनकी करुणा और ब्रह्मांड के संरक्षण में उनकी भूमिका का मनोहारी वर्णन करने वाला एक पवित्र स्तोत्र है। यह इस परम सत्य को उजागर करता है कि कावेरी नदी के तट पर, तुंगभद्रा की लहरों के बीच, आदि शेषनाग पर शयन करते हुए भी, श्रीनिवास सदैव लोक कल्याण का चिंतन करते हैं। यह भक्तों के मन को शांति और पापों से मुक्ति दिलाने वाला एक दिव्य काव्य है।
भगवान वेंकटेश केवल एक पर्वत पर विराजित देवता नहीं हैं, बल्कि वे समस्त जीवों के रक्षक, पापों का नाश करने वाले और मोक्ष प्रदाता हैं। यह स्तोत्र उनकी अनंत करुणा, वात्सल्य और दिव्य शक्ति की स्तुति करता है। वे अपने भक्तों के हृदय कमल में निवास करते हैं, उनके अज्ञान और पापों को भस्म कर ज्ञान का प्रकाश प्रदान करते हैं। उनकी दृष्टि, उनके चरण कमल भक्तों को परम शांति और प्रेम प्रदान करते हैं।
श्री वेंकटेश एक महान यज्ञ का अनुष्ठान करने वाले यज्ञकर्ता की भांति हैं, जो अपने चरणों को यज्ञीय स्तंभ (यूप) बनाकर, मनुष्य रूपी पशुओं (भक्तों) को बांधकर, उनके पापों के ढेर को अपनी वात्सल्य अग्नि में दहन कर जगत की रक्षा करते हैं। सुदर्शन चक्र धारण कर दुष्टों का संहार करने वाले और भक्तों की इच्छित मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले वे वृषाद्रि पर्वत के शिखर पर करुणा से विराजमान हैं। उन रमाकांत श्रीनिवास के करुणापूर्ण कटाक्ष भक्तों के हृदयों को प्रेम सागर से सिक्त करते हैं और उनके मन को शांति प्रदान करते हैं। कमल के समान उनका हृदय भक्तों के हृदय कमल में निवास करता है और पापों को नष्ट करने वाली दिव्य अग्नि के समान प्रकाशित होता है। उनकी शुद्ध कांति पापों के अंधकार को दूर करती है, सज्जनों की रक्षा करती है और दुष्टों को दंडित करती है।
पर्वतों पर पुष्पमालाओं से पूजे जाने वाले राजाओं, भक्तों और गुरुओं - सभी के भव भय को वे दूर करते हैं और मन की मलिनताओं को शांत करते हैं। भगवान वेंकटेश का करुणामय स्वभाव अपरंपार है। उनकी दया की एक छोटी सी चिंगारी भी भक्त के पापों के सूखे जंगल को पूरी तरह जला सकती है। पापों के पर्वतों को पिघलाने वाली दिव्य ज्योति केवल उनकी कृपा ही है। प्रतिदिन उनका स्मरण करने से दुष्टता और पाप जड़ से समाप्त हो जाते हैं। यह स्तोत्र बताता है कि योगेंद्रों द्वारा सृजित भक्ति मार्ग ही मोक्ष का मार्ग है।
लाभ (Benefits):
- **पाप नाश:** इस स्तोत्र के नियमित पाठ से संचित पाप नष्ट होते हैं और मन शुद्ध होता है। भगवान की कृपा से समस्त पापों का समूह भस्म हो जाता है।
- **शत्रु विजय:** शत्रु भय से मुक्ति मिलती है, जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और विजय प्राप्त होती है।
- **ऐश्वर्य वृद्धि:** लक्ष्मीपति वेंकटेश के आशीर्वाद से धन, समृद्धि और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है।
- **मानसिक शांति:** भगवान की करुणामयी दृष्टि से मन को शांति और स्थिरता मिलती है, जिससे आंतरिक आनंद बढ़ता है।
- **मोक्ष प्राप्ति:** निष्कपट भक्ति के साथ इस स्तोत्र का पाठ करने से अंततः मोक्ष का मार्ग सुगम होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
उज्ज्वलवेंकटनाथ स्तोत्रं क्या है?
उज्ज्वलवेंकटनाथ स्तोत्रं का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
उज्ज्वलवेंकटनाथ स्तोत्रं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
उज्ज्वलवेंकटनाथ स्तोत्रं का पाठ किसे करना चाहिए?
उज्ज्वलवेंकटनाथ स्तोत्रं का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
उज्ज्वलवेंकटनाथ स्तोत्रं का उद्गम या स्रोत क्या है?
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