श्री गोविंदराज स्तोत्रं
श्रीवेंकटाचलविभोपरावतार
गोविंदराज गुरुगोपकुलावतार |
श्रीपूरधीश्वर जयादिम देवदेव
नाथ प्रसीद नत कल्पतरो नमस्ते || 1 ||
लीलाविभूतिजनतापरिरक्षणार्थं
दिव्यप्रबोधशुकयोगिसमप्रभाव |
स्वामिन् भवत्पदसरोरुहसात्कृतं तं
योगीश्वरं शठरिपुं कृपया प्रदेहि || 2 ||
श्रीभूमिनायकदयाकरदिव्यमूर्ते
देवाधिदेवजगदेक शरण्य विष्णो |
गोपांगनाकुचसरोरुहभृंगराज
गोविंदराज विजयी भव कोमलांग || 3 ||
देवाधिदेव फणिराज विहंगराज
राजत्किरीट मणिराजिविराजितांघ्रे |
राजाधिराज यदुराजकुलाधिराज
गोविंदराज विजयी भव गोपचंद्र || 4 ||
कासारयोगि परमाद्भुत भक्तिबद्ध
वाङ्माल्यभूषि तमहोत्पलरम्यपाद |
गोपाधिनाथ वसुदेवकुमार कृष्ण
गोविंदराज विजयी भव गोकुलेंद्र || 5 ||
श्रीभूतयोगि परिकल्पित दिव्यमान
ज्ञानप्रदीपपरिदृष्ट गुणामृताब्धे |
गोगोपजालपरिरक्षणबद्धदीक्ष
गोविंदराज विजयी भव गोपवंद्य || 6 ||
मान्यानुभाव महदाह्वययोगिदृष्ट
श्रीशंखचक्र कमलासहितामलांग |
गोपीजनप्रियचरित्रविचित्रवेष
गोविंदराज विजयी भव गोपनाथ || 7 ||
श्रीमत्वदीयपदपंकज भक्तिनिष्ठ
श्रीभक्तिसार मुनिनिश्चितमुख्यतत्त्व |
गोपीजनार्तिहर गोपजनांतरंग
गोविंदराज विजयी भव गोपरत्न || 8 ||
श्रीमत्परांकुशमुनींद्र सहस्रगाथा
संस्तूयमान चरणांबुज सर्वशेषिन् |
गोपालवंशतिलकाच्युत पद्मनाभ
गोविंदराज विजयी भव गोपवेष || 9 ||
शेषाचले महति पादपपक्षिजन्म
त्वद्भक्तितः स्पृहयताकुलशेखरेण |
राज्ञा पुनःपुनरुपासित पादपद्म
गोविंदराज विजयी भव गोरसज्ञ || 10 ||
श्रीविष्णुचित्तकृतमंगळ दिव्यसूक्ते
तन्मानसांबुरुहकल्पित नित्यवास |
गोपालबालयुवतीविटसार्वभौम
गोविंदराज विजयी भव गोवृषेंद्र || 11 ||
श्रीविष्णुचित्तकुलनंदनकल्पवल्ली
गोपालकांत विनिवेशितमाल्यलोल |
गोपांगनाकुचकुलाचलमध्यसुप्त
गोविंदराज विजयी भव गोधनाढ्य || 12 ||
भक्तांघ्रिरेणुमुनिना परमं तदीय
शेषत्व माश्रितवता विमलेन नित्यं |
प्राबोधिकस्तुतिकृता ह्यवबोधित
श्रीगोविंदराज विजयी भव गोपबंधो || 13 ||
श्रीपाणिनामकमहामुनि गीयमान
दिव्यानुभावदयमान दृगंचलाढ्य |
सर्वात्मरक्षणविचक्षण चक्रपाणे
गोविंदराज विजयी भव गोपिकेंद्र || 14 ||
भक्तोत्तमाय परकालमुनींद्रनाम्ने
विश्राणितातुल महाधन मूलमंत्र |
पूर्णानुकंपपुरुषोत्तम पुष्कराक्ष
गोविंदराज विजयी भव गोसनाथ || 15 ||
सत्त्वोत्तरे चरमपर्वणि सक्तचित्ते
शांते सदा मधुरपूर्वकवाङ्मुनींद्रे |
नाथप्रसन्नहृदयांबुजनंदसूनो
गोविंदराज विजयी भव कुंददंत || 16 ||
भक्तप्रपन्नकुलनायकभाष्यकार
संकल्पकल्पतरु दिव्यफलामलात्मन् |
श्रीशेषशैलकटकाश्रित शेषशायिन्
गोविंदराज विजयी भव विश्वमूर्ते || 17 ||
देव प्रसीद करुणाकर भक्तवर्गे
सेनापति प्रणिहिताखिललोकभार |
श्रीवासदिव्यनगराधिपराजराज
गोविंदराज विजयी भव वेदवेद्य || 18 ||
श्रीमच्छठारि करुणाश्रितदेवगान
पारज्ञनाथमुनिसन्नुत पुण्यकीर्ते |
गोब्राह्मणप्रियगुरो श्रितपारिजात
गोविंदराज जगतां कुरु मंगळानि || 19 ||
इति श्री गोविंदराज स्तोत्रं |
अर्थ
श्री गोविंदराज स्तोत्रम भगवान श्री गोविंदराज को समर्पित एक अत्यंत पवित्र और भक्तिमय स्तोत्र है। तिरुपति में प्रतिष्ठित श्री गोविंदराज को भगवान वेंकटेश्वर का ही एक रूप माना जाता है, जो भक्तों को करुणा और आशीर्वाद प्रदान करते हैं। यह स्तोत्र उनके दिव्य गुणों, लीलाओं और भक्तों के प्रति उनके असीम प्रेम का वर्णन करता है। वेंकटाचल पर्वत पर अवतरित श्री गोविंदराज, गुरुओं और गोपकुलों के रक्षक, श्रीपुर के स्वामी और देवों के देव के रूप में सभी को शरण देने वाले करुणामय हैं। उनका लीलामय अवतार जगत की रक्षा के लिए प्रकट हुआ है।
यह स्तोत्र गोविंदराज को योगेश्वर, दुष्ट शत्रुओं का संहार करने वाले और भक्तों के लिए कृपा स्वरूप के रूप में वर्णित करता है। वे भूमि देवी सहित, गोपिकाओं के हृदय-कमल में भ्रमर के समान विचरण करने वाले, और संपूर्ण जगत के एकमात्र आश्रय हैं। उनका कोमल और मनमोहक रूप सदा विजयी रहे, ऐसी स्तोत्र में प्रार्थना की जाती है। फणिराज (आदिशेष) पर शयन करने वाले, गरुड़ को वाहन बनाने वाले, मणियों से जड़े मुकुट से सुशोभित, देवों के राजा और यदुवंश के शिरोमणि श्री गोविंदराज की सदा जय हो, भक्तजन ऐसा गाकर उनकी स्तुति करते हैं।
कासार योगी (पोयगई आलवार) और भूत योगी (भूतत्तालवार) जैसे महान भक्तों द्वारा पूजित गोविंदराज, वसुदेव कुमार श्री कृष्ण का ही रूप हैं। वे गोकुल के स्वामी, भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करने वाले कल्पवृक्ष हैं। उनके ज्ञान का दीपक संपूर्ण विश्व को प्रकाशित करता है और वे गो-गोप जनों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। शंख और चक्र धारण करने वाले, कमला (लक्ष्मी) सहित, और गोपिकाओं के मन को मोहने वाले उनका स्वरूप दिव्य सौंदर्य से परिपूर्ण है। परांकुश मुनि (नम्माल्वार) ने उनके चरण-कमलों की स्तुति की है। वे सर्वेश्वर, गोपवंश के तिलक और पद्मनाभ हैं।
विष्णुचित्त महर्षि (पेरियालवार) और अन्य आलवारों की भक्ति और स्तोत्रों के प्रेरणास्रोत श्री गोविंदराज हैं। वे गोपाल बालक के रूप में भक्तों के हृदयों को आकर्षित करते हैं। गोपिकाओं के आलिंगन के मध्य शयन करने वाले रमणीय रूप वाले, भक्त मुनियों द्वारा नित्य स्तुति किए जाने वाले, गोपिकाओं के हृदय के बंधु हैं। वे भक्तों के पापों को दूर करने वाले, महामुनियों द्वारा गाए जाने वाले, सर्वात्मरक्षक और चक्रपाणि हैं। उनकी दया का अनुभव भक्त निरंतर करते हैं। शेषशैल पर निवास करने वाले शेषशायी वे भक्तों के आश्रय, पापनाशक और विश्वमूर्ति हैं। उनकी करुणा से लोक का भार हल्का हो जाता है। वे श्रीवास नगर के अधिपति और वेद स्वरूप हैं। करुणामय श्री गोविंदराज की पुण्य कीर्ति देवताओं द्वारा भी स्तुति की जाती है। इस स्तोत्र का पाठ भक्तों को मानसिक शांति, इष्टार्थ सिद्धि और अंततः मोक्ष प्रदान करता है।
लाभ (Benefits):
- मानसिक शांति: श्री गोविंदराज स्तोत्र के नियमित पाठ से मन को अपार शांति और सुकून मिलता है, चिंताएं और तनाव दूर होते हैं।
- इष्टार्थ सिद्धि: भक्तों की सभी शुभ इच्छाएं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, जीवन में सफलता और समृद्धि प्राप्त होती है।
- पाप निवारण: भगवान के दिव्य नाम-स्मरण और स्तोत्र पाठ से पूर्वजन्म और इस जन्म के पापों का निवारण होता है, जिससे आत्मशुद्धि होती है।
- ज्ञान वृद्धि: इस स्तोत्र के माध्यम से भगवान के गुणों का ध्यान करने से आध्यात्मिक ज्ञान और विवेक में वृद्धि होती है।
- रक्षा और आश्रय: श्री गोविंदराज अपने भक्तों को सभी दुष्ट शक्तियों, कठिनाइयों और विपत्तियों से बचाते हैं और उन्हें सदैव आश्रय प्रदान करते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री गोविंदराज स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री गोविंदराज स्तोत्रं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का उद्गम या स्रोत क्या है?
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