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श्री देवानां स्तुत्यष्टकं

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स्तोत्र
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ॐ नमस्ते भगवते नमो नारायणाय ते ।
ॐ नमस्ते भगवते सर्वज्ञाय नमो नमः ॥1॥

घोर संसारार्णवस्य तारकाय नमो नमः ।
तारक ब्रह्मरूपाय भूतनाथाय ते नमः ॥2॥

बोधरूपाय पूताय पुण्यपूर्णाय ते नमः ।
मर्त्रंगुतेकाय ओंकाराय नमो नमः ॥3॥

भकाराय नमस्तुभ्यं रेफांताय नमो नमः ।
यकाराय नमस्तुभ्यं गोकाराय नमो नमः ॥4॥

भकाराय तकाराय रेफांताय नमो नमः ।
नकाराय नमस्तुभ्यं मकाराय नमो नमः ॥5॥

श्रीश शंकरपुत्राय सर्वदा ते नमो नमः ।
हर भो संकटं देव सकलं सकलेश्वर ॥6॥

देवेश विश्वकर्ता त्वं परिपाहि जगत्पते ।
विश्वभर्ता जय सदा विश्वहर्ता जय प्रभो ॥7॥

सर्वेषां जीवलोकानामेक जीवस्वरूपक ।
देवदेव जय त्वं भो सर्वदा सर्वनायक ।
धर्मशास्ता जयभवन् जन्मदुःख विनाशन ॥8॥

इति श्रीदेवानां स्तुत्यष्टकं संपूर्णं ।

अर्थ

श्री देवानां स्तुत्यष्टकं भगवान नारायण को समर्पित एक अत्यंत पवित्र स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान की सर्वज्ञता, सर्वव्यापकता और सभी दुखों को हरने वाली शक्ति का गुणगान करता है। यह अष्टक भक्तों को संसार सागर से पार उतारने वाले तारक स्वरूप परमात्मा की स्तुति करता है और उनके महिमा का विभिन्न आयामों से वर्णन करता है। ऐसा माना जाता है कि इस स्तोत्र का पाठ मन को शांति, आंतरिक शुद्धि और आध्यात्मिक उत्थान प्रदान करता है।

इस स्तोत्र का प्रत्येक श्लोक भगवान के किसी न किसी विशेष गुण को उजागर करता है। प्रारंभ में, यह सर्वज्ञ, सर्वव्यापी भगवान नारायण को प्रणाम करता है। तत्पश्चात, भयानक संसार सागर को पार कराने वाले, मोक्ष प्रदान करने वाले, और सभी भूतों के स्वामी तारकब्रह्म स्वरूप को नमन किया जाता है। भगवान को ज्ञान का रूप, पवित्रता का प्रतीक, पुण्य से परिपूर्ण और सभी मंत्रों के मूल ॐकार स्वरूप के रूप में वर्णित किया गया है। ये विवरण भगवान के सच्चिदानंद स्वरूप को दर्शाते हैं।

स्तोत्र के मध्य भाग में, यह बताया गया है कि भगवान 'भ, र, य, ग' और 'भ, त, र, न, म' अक्षरों के रूप में समस्त जगत में व्याप्त हैं। ये अक्षर भगवान के मंत्र स्वरूप को, बीजाक्षरों के रूप में उनकी शक्ति को इंगित करते हैं। यहां शंकरपुत्र श्रीश की भी स्तुति की गई है। उनसे प्रार्थना की जाती है कि वे सभी संकटों को दूर करें, क्योंकि वे सभी के ईश्वर हैं। यह धर्मशास्ता या अय्यप्पा स्वामी को नारायण के साथ एकाकार करने का एक अनूठा दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

अंतिम श्लोकों में, भगवान को विश्वकर्मा (सृष्टिकर्ता), जगत्पति (जगत के स्वामी), विश्वभर्ता (जगत के पालक) और विश्वहर्ता (जगत के संहारक) के रूप में महिमामंडित किया गया है। यह घोषणा की जाती है कि सभी जीवलोकों में एक ही जीव स्वरूप, देवों के देव, सभी के नायक को सदा विजय प्राप्त हो। धर्मशास्ता स्वरूप भगवान को जन्म-मृत्यु के दुखों का विनाशक बताया गया है, और उनकी सदा विजय की कामना की जाती है। यह स्तोत्र भगवान की सर्वोच्चता, उनकी करुणा और भक्तों के प्रति उनके असीम प्रेम को व्यक्त करता है।

लाभ (Benefits):

  • संकट निवारण: इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से सभी प्रकार के संकट, भौतिक और मानसिक कष्ट दूर होते हैं।
  • ज्ञान प्राप्ति: भगवान को ज्ञान स्वरूप के रूप में स्तुति करने से पाठकों को आध्यात्मिक ज्ञान और विवेक की वृद्धि होती है।
  • संसार बंधन से मुक्ति: संसार सागर से पार कराने वाले तारक स्वरूप की स्तुति मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ने में सहायता करती है।
  • स्वास्थ्य और समृद्धि: भगवान के आशीर्वाद से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है, जीवन में समृद्धि और शांति प्राप्त होती है।
  • धर्म निष्ठा: धर्मशास्ता स्वरूप की स्तुति धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है और धार्मिक मूल्यों को मजबूत करती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री देवानां स्तुत्यष्टकं क्या है?
यह भगवान नारायण और धर्मशास्ता को समर्पित आठ श्लोकों का एक पवित्र स्तोत्र है, जो उनकी सर्वव्यापकता, ज्ञान और संकट निवारण शक्ति का गुणगान करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन, विशेषकर सुबह स्नान के बाद या शाम को पूजा के समय भक्ति और श्रद्धा के साथ किया जा सकता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले इसका पाठ करना शुभ माना जाता है।
श्री देवानां स्तुत्यष्टकं का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इसके पाठ से संकट दूर होते हैं, ज्ञान बढ़ता है, संसार बंधन से मुक्ति मिलती है, स्वास्थ्य और समृद्धि प्राप्त होती है, तथा धर्म के प्रति निष्ठा बढ़ती है।
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
कोई भी व्यक्ति, लिंग या आयु के भेद के बिना, जो भगवान में श्रद्धा और भक्ति रखता है, इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है।
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
सामान्यतः, एक दिन में कम से कम एक बार या अपनी सुविधानुसार 3, 5, 11, 21, 108 बार पाठ कर सकते हैं। नियमित पाठ अधिक फलदायी होता है।
इस स्तोत्र का उद्गम क्या है?
यह स्तोत्र हिंदू धर्म के प्राचीन ग्रंथों में उल्लिखित है और भगवान की महिमा का गुणगान करने वाले एक भाग के रूप में जाना जाता है। इसे अक्सर आचार्यों और संतों द्वारा प्रचारित किया गया है।

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