श्री वेंकटेश द्वादशनाम स्तोत्रं
अस्य श्री वेंकटेश द्वादशनाम स्तोत्र महामंत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः अनुष्टुप् छंदः श्री वेंकटेश्वरो देवता इष्टार्थे विनियोगः |
नारायणो जगन्नाथो वारिजासनवंदितः |
स्वामिपुष्करिणीवासी शंखचक्रगदाधरः || 1 ||
पीतांबरधरो देवो गरुडासनशोभितः |
कंदर्पकोटिलावण्यः कमलायतलोचनः || 2 ||
इंदिरापतिगोविंदः चंद्रसूर्यप्रभाकरः |
विश्वात्मा विश्वलोकेशो जय श्रीवेंकटेश्वरः || 3 ||
एतद्द्वादशनामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः |
दारिद्र्यदुःखनिर्मुक्तो धनधान्यसमृद्धिमान् || 4 ||
जनवश्यं राजवश्यं सर्वकामार्थसिद्धिदं |
दिव्यतेजः समाप्नोति दीर्घमायुश्च विंदति || 5 ||
ग्रहरोगादिनाशं च कामितार्थफलप्रदं |
इह जन्मनि सौख्यं च विष्णुसायुज्यमाप्नुयात् || 6 ||
इति ब्रह्मांडपुराणे ब्रह्मनारदसंवादे श्री वेंकटेशद्वादशनामस्तोत्रं |
अर्थ
श्री वेंकटेश द्वादशनाम स्तोत्रम्, ब्रह्मांड पुराण में ब्रह्मा और नारद के संवाद में वर्णित एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है। इस महामंत्र के ऋषि ब्रह्मा, छंद अनुष्टुप और देवता स्वयं श्री वेंकटेश्वर स्वामी हैं। इस स्तोत्र का मुख्य उद्देश्य भक्तों की मनोकामनाओं की पूर्ति और उन्हें इष्टार्थ सिद्धि प्रदान करना है। तिरुमाला के अधिपति श्री वेंकटेश्वर के बारह दिव्य नामों का स्मरण कर भक्त सभी प्रकार के शुभ फल प्राप्त करते हैं।
यह स्तोत्र भगवान नारायण को जगन्नाथ, यानी समस्त लोकों के स्वामी के रूप में महिमामंडित करता है, जिनकी वंदना स्वयं ब्रह्मा जी करते हैं। पहला श्लोक वर्णन करता है कि वे स्वामी पुष्करिणी के तट पर निवास करने वाले, शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले श्री वेंकटेश हैं। वे केवल तिरुमाला के देवता नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड के पालक और भक्तों के शाश्वत रक्षक हैं। शंख दिव्य ध्वनि का, चक्र दुष्टों के संहार का और गदा शक्ति का प्रतीक है, जो उनकी सर्वोच्च सत्ता को दर्शाते हैं।
दूसरे श्लोक में भगवान के दिव्य सौंदर्य का मनमोहक चित्रण किया गया है। वे पीतांबर धारण किए हुए, गरुड़ पर विराजमान होकर सुशोभित होते हैं। उनका सौंदर्य करोड़ों कामदेवों को लज्जित करने वाला है और उनके नेत्र कमल के समान विशाल और सुंदर हैं। भगवान का यह रूप भक्तों के मन को मोह लेता है और उनके समस्त पापों का नाश करने की शक्ति रखता है। उनके नेत्रों में करुणा और प्रेम भरा है, जो संपूर्ण जगत को आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
तीसरा श्लोक श्री वेंकटेश की परम सत्ता और व्यापकता को उद्घाटित करता है। वे इंदिरापति (लक्ष्मीपति) गोविंद हैं, जो चंद्रमा और सूर्य के समान तेजस्वी हैं। वे समस्त विश्व की आत्मा और सभी लोकों के ईश्वर हैं। 'जय श्री वेंकटेश्वरः' के उद्घोष के साथ उनकी महिमा का गुणगान किया जाता है। वे सभी चर-अचर में व्याप्त परमात्मा हैं, जो सृष्टि, स्थिति और संहार के मूल कारण हैं।
लाभ (Benefits):
- दरिद्रता और दुःख से मुक्ति: जो व्यक्ति इन द्वादश नामों का तीनों संध्याकालों (सुबह, दोपहर, शाम) में भक्तिपूर्वक पाठ करता है, वह दरिद्रता और दुःखों से मुक्त होकर धन-धान्य से समृद्ध होता है।
- सभी मनोकामनाओं की पूर्ति: इस स्तोत्र के पाठ से जन-वश्य और राज-वश्य प्राप्त होता है, जिससे सभी प्रकार की इच्छाएँ और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। यह सामाजिक और व्यावसायिक सफलता भी दिलाता है।
- दिव्य तेज और दीर्घायु: स्तोत्र के नियमित पाठ से व्यक्ति को दिव्य तेज प्राप्त होता है और वह दीर्घायु प्राप्त करता है। यह व्यक्तित्व में आकर्षण बढ़ाता है और उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करता है।
- ग्रहदोष और रोग नाश: यह स्तोत्र ग्रहदोषों और रोगों का नाश करता है, तथा सभी अभीष्ट फल प्रदान करता है। इससे मानसिक शांति और शारीरिक आरोग्य प्राप्त होता है।
- इहलोक और परलोक सुख: इस जन्म में सुख का अनुभव होता है और अंत में विष्णु सायुज्य, यानी भगवान के साथ एकात्मता प्राप्त होती है, जो मोक्ष का मार्ग है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री वेंकटेश द्वादशनाम स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री वेंकटेश द्वादशनाम स्तोत्रं का पाठ करने के प्रमुख लाभ क्या हैं?
यह स्तोत्र कौन पाठ कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल या उद्गम क्या है?
टिप्पणियाँ
टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...
