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श्री वेंकटेश स्तोत्रं

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स्तोत्र
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श्री वेंकटेश स्तोत्रं

कौशिकश्रीनिवासार्यतनयं विनयोज्ज्वलं |
वात्सल्यादिगुणावासं वंदे वरददेशिकं ||

पद्मस्थां युवतीं परार्ध्यवृषभाद्रीशायतोरस्स्थली-
मध्यावासमहोत्सवां क्षणसकृद्विश्लेषवाक्यासहां |
मूर्तीभावमुपागतामिव कृपां मुग्धाखिलांगां श्रियं
नित्यानंदविधायिनीं निजपदे न्यस्तात्मनां संश्रये || 1 ||

श्रीमच्छेषमहीधरेशचरणौ प्राप्यौ च यौ प्रापकौ
अस्मद्देशिकपुंगवैः करुणया संदर्शितौ तावकौ |
प्रोक्तौ वाक्ययुगेन भूरिगुणकावार्यैश्च पूर्वैर्मुहुः
श्रेयोभिः शठवैरिमुख्यमुनिभिस्तौ संश्रितौ संश्रये || 2 ||

यस्यैकं गुणमादृताः कवयितुं नित्याः प्रवृत्ता गिरः
तस्याभूमितया स्ववाङ्मनसयोर्वैक्लब्यमासेदिरे |
तत्तादृग्बहुसद्गुणं कवयितुं मोहाद्वृषाद्रीश्वरं
कांक्षे कार्यविवेचनं न हि भवेन्मूढाशयानां नृणां || 3 ||

यत्पादा ॥ योषितं निजसकृत्स्पर्शेन कांचिच्छिला-
मंगार ॥ डिंभतामनुपमौ शांतं कमप्यंचितौ |
यत्पादूरखिलां शशास च महीमाश्चर्यसीमास्थलीं
अद्राक्षं हरिमंजनाचलतटे निर्निद्रपद्मेक्षणं || 4 ||

अत्रस्यन्मणिराजराजिविलसन्मंजीरनिर्यन्महः-
स्तोमप्रास्तसमस्तविस्तृततमश्श्रीमंदिराभ्यंतरं |
व्याकोचांबुजसुंदरं चरणयोर्द्वंद्वं वृषाद्रीशितुः
चक्षुर्भ्यामनुभूय सर्वसुलभं प्राप्स्यामि मोदं कदा || 5 ||

सत्कृत्या समकाललब्धतनुभिर्गोपीभिरत्यादरात्
विन्यस्तौ वदने कुचे च नितरां रोमांचरोहांचिते |
पद्माभूकरपल्लवैः सचकितं संवाह्यमानौ मृदू
मान्यौ वेंकटभूधरेशचरणौ मार्गे दृशोः स्तां मम || 6 ||

प्रातः फुल्लपयोरुहांतरदलस्निग्धारुणांतस्थलौ
निष्पीताखिलनीरनीरधिलसन्नीलांबुदाभौ बहिः |
राकाशीतमरीचिसन्निभनखज्योतिर्वितानांचितौ
पादौ पन्नगपुंगवाचलपतेर्मध्येमनस्स्तां मम || 7 ||

मंदारप्रसवाभिरामशिरसां बृंदारकश्रेयसां
बृंदैरिंदुकलाभृता च विधिना वंद्यौ धृतानंदथू |
बंधच्छेदविधायिनौ विनमतां छंदश्शताभिष्टुतौ
वंदे शेषमहीधरेशचरणौ वंदारुचिंतामणी || 8 ||

चिंचामूलकृतासनेन मुनिना तत्त्वार्थसंदर्शिना
कारुण्येन जगद्धितं कथयता स्वानुष्ठितिख्यापनात् |
निश्चिक्ये शरणं यदेव परमं प्राप्यं च सर्वात्मनां
तत्पादाब्जयुगं भजामि वृषभक्षोणीधराधीशितुः || 9 ||

नंदिष्यामि कदाऽहमेत्य महता घर्मेण तप्तो यथा
मंदोदंचितमारुतं मरुतले मर्त्यो महांतं ह्रदं |
संतप्तो भवतापदावशिखिना सर्वार्तिसंशामकं
पादद्वंद्वमहीशभूधरपतेर्निर्द्वंद्वहृन्मंदिरं || 10 ||

यौ बृंदावनभूतले व्यहरतां दैतेयबृंदावृते
कुप्यत्कालियविस्तृतोच्छ्रितफणारंगेषु चानृत्यतां |
किंचानस्समुदास्थतां किसलयप्रस्पर्धिनावासुरं
तन्वातां मम वेंकटेशचरणौ तावंहसां संहृतिं || 11 ||

शेषित्वप्रमुखान्निपीय तु गुणान्नित्या हरेस्सूरयो
वैकुंठे तत एत्य वेंकटगिरिं सौलभ्यमुख्यानिह |
नित्योदंचितसंनिधेर्निरुपमान्निर्विश्य तस्याद्भुतान्
निर्गंतुं प्रभवंति हंत न ततो वैकुंठकुंठादराः || 12 ||

संफुल्लाद्भुतपुष्पभारविनमच्छाखाशतानां सदा
सौरभ्यानुभवाभियन्मधुलिहां संघैर्वृते भूरुहां |
उद्यद्रश्मिभिरुज्ज्वलैर्मणिगणैरुत्तुंगशृंगैर्वृष-
क्षोणीभर्तरि वर्ततेऽखिलजगत्क्षेमाय लक्ष्मीसखः || 13 ||

नानादिङ्मुखवासिनो नरगणानभ्यागतानादरात्
प्रत्युद्यात इवांतिकस्फुटतरप्रेक्ष्यप्रसन्नाननः |
सानुक्रोशमनास्सडिंभमहिलान् संप्राप्तसर्वेप्सितान्
कुर्वन्नंजनभूधरे कुवलयश्यामो हरिर्भासते || 14 ||

आपादादनवद्यमाच शिरसस्सौंदर्यसीमास्पदं
हस्तोदंचितशंखचक्रमुरसा बिभ्राणमंभोधिजां |
माल्यैरुल्लसितं मनोज्ञमकुटीमुख्यैश्च भूषाशतैः
मध्येतारणमंजनाचलतटे भांतं हरिं भावये || 15 ||

मंजीरांचितपादमद्भुतकटीविभ्राजिपीतांबरं
पद्मालंकृतनाभिमंगमहसा पाथोधरभ्रांतिदं |
पार्श्वालंकृतिशंखचक्रविलसत्पाणिं परं पूरुषं
वंदे मंदहसं विचित्रमकुटीजुष्टं वृषाद्रीश्वरं || 16 ||

नानाभासुररत्नमौक्तिकवरश्रेणीलसत्तोरण-
स्वर्णस्तंभयुगांतरालकभृशप्रद्योतमानाननं |
आनासश्रुतिलोलनीलविशदस्निग्धांतरक्तेक्षणं
नाथं प्रेक्षितुमंजनाचलतटे नालं सहस्रं दृशां || 17 ||

चक्राब्जे करयुग्मकेन सततं बिभ्रत् करेण स्पृशन्
सव्येनोरुमपीतरेण चरणौ संदर्शयन् भूषणैः |
सद्रत्नैः सकला दिशो वितिमिराः कुर्वन् वृषाद्रौ हरिः
शुद्धस्वांतनिषेविते विजयते शुद्धांतबाहांतरः || 18 ||

सुस्निग्धाधरपल्लवं मृदुहसं मीनोल्लसल्लोचनं
गंडप्रस्फुरदंशुकुंडलयुगं विभ्राजिसुभ्रून्नसं |
फालोद्भासिपरार्ध्यरत्नतिलकं वक्त्रं प्रलंबालकं
भव्यं वेंकटनायकस्य पिबतां भाग्यं न वाचां पदं || 19 ||

त्वत्पादांबुजसस्पृहं मम मनः कुर्यास्त्वदन्यस्पृहां
दूरं तोलय दुःखजालजननीं त्वत्पादवांछाद्विषं |
किंच त्वत्परतंत्रभूसुरकृपापात्रं क्रिया मां सदा
सर्पाधीश्वरभूधरेंद्र भगवन् सर्वार्थसंदायक || 20 ||

नाकार्षं श्रुतिचोदितां कृतिमहं किंचिन्न चावेदिषं
जीवेशौ भवभंजनी न च भवत्पादाब्जभक्तिर्मम |
श्रीमत्त्वत्करुणैव देशिकवरोपज्ञं प्रवृत्ता मयि
त्वत्प्राप्तौ शरणं वृषाचलपतेऽभूवं ततस्त्वद्भरः || 21 ||

श्रीमत्कौशिकवंशवारिधिविधोः श्रीवेंकटेशाख्यया
विख्यातस्य गुरोर्विशुद्धमनसो विद्यानिधेः सूनुना |
भक्त्यैतां वरदाभिधेन भणितां श्रीवेंकटेशस्तुतिं
भव्यां यस्तु पठेदमुष्य वितरेच्छ्रेयः परं श्रीसखः ||

इति वेंकटेश स्तोत्रं |

अर्थ

श्री वेंकटेश स्तोत्र भगवान श्रीनिवास की अनंत करुणा, महिमा और भक्तों के प्रति उनके वात्सल्य का गुणगान करने वाला एक पवित्र ग्रंथ है। यह स्तोत्र कौशिका वंश में जन्मे, विनम्र, वात्सल्यमूर्ति और करुणा के सागर श्रीनिवासार्य के पुत्र वरददेशिक को नमस्कार के साथ शुरू होता है। यह स्तोत्र भगवान के दिव्य गुणों और उनके चरण कमलों की महिमा का गहनता से वर्णन करता है, जो भक्तों को मोक्ष और शांति का मार्ग दिखाते हैं।

यह स्तोत्र भगवान वेंकटेश के वक्षस्थल पर श्री महालक्ष्मी की दिव्य उपस्थिति का वर्णन करता है। वे सदैव भगवान की महिमा का अनुभव करती हुई, भक्तों पर दया बरसाती हुई और करुणा के साकार रूप में विराजमान रहती हैं। हमारे आचार्यों द्वारा करुणापूर्वक दिखाए गए श्री वेंकटेश के चरण कमल भक्तों को मोक्ष प्रदान करने की शक्ति रखते हैं। ब्रह्मादि देवताओं, ऋषियों और सभी भक्तों द्वारा स्तुति किए गए उन श्री चरणों का मैं आश्रय लेता हूँ। भगवान के ये चरण केवल दर्शन मात्र से ही सभी पापों का नाश कर परम कल्याण प्रदान करते हैं।

श्री वेंकटेश के महिमामयी गुणों का वर्णन शब्दों से परे है। अत्यंत कुशल कवि भी उनके गुणों की सीमा तक पहुँचने में असमर्थ होते हैं। वृषाद्रिनाथ भगवान की स्तुति करना ही हमारे मन को मोक्ष प्रदान करता है। केवल उनके चरण स्पर्श से एक शिला स्त्री रूप में जीवित हो उठी, और एक राजा ने पृथ्वी पर शासन करने की क्षमता प्राप्त की – यह वेंकटेश की कृपा का अद्भुत चमत्कार है। उनके चरणों से निकलने वाली मणियों की चमक से मंदिर प्रकाशित होता है – मेरी आँखें सदैव उन कमल चरणों को निहारती रहें।

गोपियों द्वारा प्रेम से आलिंगन किए गए और देवी लक्ष्मी के हाथों से सेवा प्राप्त करने वाले वेंकटेश के चरण सदैव मेरे हृदय में निवास करें। नीले बादल के समान श्यामल और कमल के रंग के समान लालिमा लिए हुए वे चरण सभी पापों को भस्म करने वाले हैं। वे मेरे मन में सदा बने रहें। देवताओं द्वारा वंदित, मणि मुकुटों से अलंकृत श्री वेंकटेश के चरणों को मैं वंदन करता हूँ। वे वंदन करने वालों के लिए चिंतामणि के समान हैं, जो सभी इच्छाओं को पूरा करते हैं। तत्वज्ञान को प्रेरित करने वाले मुनिवरों द्वारा वर्णित श्री वेंकटेश के चरण – मैं उन्हें पूरे हृदय से स्मरण करता हूँ। वे ही परम गंतव्य हैं। लौकिक ताप से मुक्ति पाने के लिए, सूर्य के प्रकाश में छाया की तरह, उन चरण युगल का आश्रय लेना चाहिए। वे ही शांति हैं, वे ही मोक्ष हैं।

गोपियों के साथ रासलीला करने वाले कृष्ण ही वेंकटेश बन गए हैं। कालिया नाग के फनों पर नृत्य करने वाले वे हरि – पाप राशि का नाश करते हैं। वैकुंठ में देवताओं को भी जो कृपा दुर्लभ है, वह वेंकटगिरि में आसानी से उपलब्ध है। वह श्रीनिवास की कृपा वैकुंठ से भी बढ़कर है। फूलों और मणियों से जगमगाता तिरुमाला पर्वत लोक कल्याण के लिए नित्य प्रकाशित होता है। अंजनाचल में भक्तों पर करुणा दृष्टि डालते हुए, गोपियों के साथ लीलाएँ करने वाले वह कृष्ण स्वरूपी वेंकटेश करुणा मूर्ति के रूप में विराजमान हैं। सिर से पैर तक दिव्य रूप में, शंखचक्रधारी, पीतांबरधारी, तिरुमाला शिखर पर प्रकाशमान वेंकटेश का रूप ध्यान करने योग्य है। मणियों, पुष्पमालाओं, आभूषणों से अलंकृत, मंद मुस्कान के साथ दिव्य प्रकाश बिखेरने वाले वृषाद्रिनाथ की स्तुति हमारे जीवन को सार्थक बनाती है।

लाभ (Benefits):

  • समस्त पापों का नाश: इस स्तोत्र के पाठ से जाने-अनजाने में किए गए सभी पापों का नाश होता है और आंतरिक शुद्धि प्राप्त होती है।
  • मोक्ष की प्राप्ति: भगवान वेंकटेश के चरण कमलों की महिमा का गुणगान करने से जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • शांति और सुकून: सांसारिक कष्टों से पीड़ित लोगों को यह स्तोत्र मानसिक शांति, सुकून और आंतरिक शक्ति प्रदान करता है।
  • मनोकामना पूर्ति: भगवान के करुणामयी स्वरूप का ध्यान करने से भक्तों की सभी सद्इच्छाएँ और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
  • स्वास्थ्य और धन: श्री महालक्ष्मी सहित वेंकटेश की स्तुति करने से उत्तम स्वास्थ्य, धन और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
  • भक्ति में वृद्धि: इस स्तोत्र का निरंतर पाठ भगवान के प्रति प्रेम, श्रद्धा और भक्ति को बढ़ाता है, जिससे आध्यात्मिक प्रगति होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री वेंकटेश स्तोत्रं क्या है?
श्री वेंकटेश स्तोत्रं भगवान श्रीनिवास या तिरुपति बालाजी की महिमा, करुणा और दिव्य गुणों की स्तुति करने वाला एक भक्तिपूर्ण भजन है। यह भगवान के चरण कमलों की शक्ति और भक्तों को उनके द्वारा प्रदान किए जाने वाले मोक्ष का वर्णन करता है।
श्री वेंकटेश स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद या शाम को दीपक जलाने के बाद करना उत्तम माना जाता है। विशेष रूप से शनिवार को या तिरुपति यात्रा पर जाने से पहले इसका पाठ करना अधिक फलदायी होता है।
श्री वेंकटेश स्तोत्र का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इस स्तोत्र का पाठ करने से सभी पापों का नाश होता है, मानसिक शांति और सुकून मिलता है, मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, मोक्ष की प्राप्ति होती है और व्यक्ति भगवान की कृपा का पात्र बनता है।
श्री वेंकटेश स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
भगवान वेंकटेश के भक्त, जीवन में कष्टों का सामना कर रहे लोग, आध्यात्मिक प्रगति की इच्छा रखने वाले और मोक्ष की कामना करने वाले सभी व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।
श्री वेंकटेश स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
सामान्यतः प्रतिदिन एक या तीन बार पाठ करना उचित है। अपनी श्रद्धा और समय के अनुसार आप इसे कितनी भी बार पढ़ सकते हैं। संकल्प के साथ पाठ करते समय 11, 21 या 108 बार पाठ कर सकते हैं।
इस स्तोत्र का मूल या उद्भव क्या है?
श्री वेंकटेश स्तोत्र हिंदू धर्म की प्राचीन भक्ति परंपरा का हिस्सा है, जो वरददेशिक जैसे महान आचार्यों और भक्तों के अनुभवों पर आधारित है। यह श्री वेंकटेश की महिमा का गुणगान करता है।

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