श्री वामन स्तोत्रं (वामनपुराणे)
लोमहर्षण उवाच |
देवदेवो जगद्योनिरयोनिर्जगदादिजः |
अनादिरादिर्विश्वस्य वरेण्यो वरदो हरिः || 1 ||
परावराणां परमः परापरसतां गतिः |
प्रभुः प्रमाणं मानानां सप्तलोकगुरोर्गुरुः |
स्थितिं कर्तुं जगन्नाथं सोऽचिंत्यो गर्भतां गतः || 2 ||
प्रभुः प्रभूणां परमः पराणा-
-मनादिमध्यो भगवाननंतः |
त्रैलोक्यमंशेन सनाथमेकः
कर्तुं महात्माऽदितिजोऽवतीर्णः || 3 ||
न यस्य रुद्रा न च पद्मयोनि-
-र्नेंद्रो न सूर्येंदुमरीचिमिश्राः |
जानंति दैत्याधिप यत्स्वरूपं
स वासुदेवः कलयावतीर्णः || 4 ||
यमक्षरं वेदविदो वदंति
विशंति यं ज्ञानविधूतपापाः |
यस्मिन् प्रविष्टा न पुनर्भवंति
तं वासुदेवं प्रणमामि देवं || 5 ||
भूतान्यशेषाणि यतो भवंति
यथोर्मयस्तोयनिधेरजस्रं |
लयं च यस्मिन् प्रलये प्रयांति
तं वासुदेवं प्रणतोऽस्म्यचिंत्यं || 6 ||
न यस्य रूपं न बलं प्रभावो
न च प्रतापः परमस्य पुंसः |
विज्ञायते सर्वपितामहाद्यै-
-स्तं वासुदेवं प्रणमामि नित्यं || 7 ||
रूपस्य चक्षुर्ग्रहणे त्वगेषा
स्पर्शग्रहित्री रसना रसस्य |
घ्राणं च गंधग्रहणे नियुक्तं
न घ्राणचक्षुः श्रवणादि तस्य || 8 ||
स्वयंप्रकाशः परमार्थतो यः
सर्वेश्वरो वेदितव्यः स युक्त्या |
शक्यं तमीड्यमनघं च देवं
ग्राह्यं नतोऽहं हरिमीशितारं || 9 ||
येनैकदंष्ट्रेण समुद्धृतेयं
धरा चला धारयतीह सर्वं |
शेते ग्रसित्वा सकलं जगद्य-
-स्तमीड्यमीशं प्रणतोऽस्मि विष्णुं || 10 ||
अंशावतीर्णेन च येन गर्भे
हृतानि तेजांसि महासुराणां |
नमामि तं देवमनंतमीश-
-मशेषसंसारतरोः कुठारं || 11 ||
देवो जगद्योनिरयं महात्मा
स षोडशांशेन महाऽसुरेंद्राः |
सुरेंद्रमातुर्जठरं प्रविष्टो
हृतानि वस्तेन बलं वपूंषि || 12 ||
इति श्रीवामनपुराणे नवविंशतितमोऽध्याये श्री वामन स्तोत्रं |
अर्थ
श्री वामन स्तोत्रं वामन पुराण से उद्भुत भगवान विष्णु के पंचम अवतार, श्री वामन देव की महिमा का गुणगान करने वाला एक अत्यंत पवित्र स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान के अनंत गुणों, उनकी शक्ति और सृष्टि, स्थिति, लय के मूल कारण के रूप में उनकी सर्वोच्चता का वर्णन करता है। लोमहर्षण महर्षि इस स्तोत्र के माध्यम से भगवान वामन की सार्वभौमिकता, अनादिता और लोक कल्याण हेतु उनके अवतारों के महत्व को समझाते हैं।
भगवान वामन केवल एक अवतार नहीं, अपितु परब्रह्म का साक्षात् स्वरूप हैं। वे अचिन्त्य शक्ति, अनादि और अनंत हैं। इस स्तोत्र का पाठ भक्तों को भगवान की पराकाष्ठा को समझने में सहायता करता है। प्रथम श्लोक में, लोमहर्षण महर्षि भगवान को 'देवों के देव, जगत के योनि (उत्पत्ति), अयोनि (योनि रहित), जगत के आदि, अनादि होकर भी सभी के आदिकारण, वर प्रदान करने वाले हरि' कहकर संबोधित करते हैं। दूसरे श्लोक में, उन्हें 'सभी प्रभुओं के प्रभु, लोकगुरुओं के गुरु, सृष्टि, स्थिति, लय के कर्ता' के रूप में वर्णित करते हुए, जगत की स्थिति के लिए अचिन्त्य शक्ति से अदिति के गर्भ में प्रवेश करने की उनकी विलक्षणता का उल्लेख करते हैं।
आगे बढ़ते हुए, तीसरे श्लोक में यह बताया गया है कि 'अनादि, अमध्य, अनंत परमात्मा' कहे जाने वाले भगवान ने तीनों लोकों की रक्षा हेतु अदिति पुत्र के रूप में वामन मूर्ति धारण की। चौथे श्लोक में, यह उजागर किया गया है कि न रुद्र, न ब्रह्मा, न इंद्र, न सूर्य-चंद्रमा आदि देवगण आपके स्वरूप को जान सकते हैं, वे वासुदेव ही वामन रूप में अवतरित हुए हैं, जिससे भगवान के अज्ञेय स्वरूप पर प्रकाश पड़ता है। वेदज्ञ जिन्हें 'अक्षर ब्रह्म' कहते हैं, जिनमें ज्ञान से पापों को धोकर प्रवेश करने वाले पुनर्जन्म से मुक्त हो जाते हैं, उन वासुदेव को मैं प्रणाम करता हूँ, ऐसा पाँचवें श्लोक में उद्घोष किया गया है। छठे श्लोक में, यह वर्णित है कि जिनसे समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं और जैसे लहरें समुद्र में विलीन होती हैं, वैसे ही प्रलय में आपमें विलीन हो जाते हैं, जो भगवान की सृष्टि और लय शक्ति को दर्शाता है।
सातवें श्लोक में, यह स्पष्ट किया गया है कि भगवान का रूप, बल और प्रभाव ब्रह्मादि देवताओं के लिए भी अज्ञात है। आठवें श्लोक में, यह बताया गया है कि दृष्टि, घ्राण, रसना जैसे इंद्रिय आपको ग्रहण नहीं कर सकते, क्योंकि आप इंद्रियातीत और स्वयं प्रकाशित हैं, जो भगवान के दिव्य स्वरूप को दर्शाता है। नौवें श्लोक में, भगवान को ही परमार्थ सत्य, स्वयं प्रकाशित और सर्वेश्वर बताया गया है। दसवें श्लोक में, उन्हें एक दंत से पृथ्वी का उद्धार करने वाले (वराह रूप का स्मरण), समस्त जगत को ग्रस कर अपने में धारण करने वाले महाविष्णु कहकर भगवान की महिमा का गुणगान किया गया है। ग्यारहवें श्लोक में, महासुरों के तेज का संहार करने वाले, संसार रूपी वृक्ष को नष्ट करने वाले दिव्य कुठार स्वरूप वामन को नमस्कार कहकर भगवान की भक्तों को संसार बंधन से मुक्त करने की शक्ति को रेखांकित किया गया है।
लाभ (Benefits):
- पापों का नाश: इस स्तोत्र का भक्ति और श्रद्धा से पाठ करने से सभी पाप नष्ट होते हैं और मन शुद्ध होता है।
- पुनर्जन्म से मुक्ति: भगवान वामन को परब्रह्म स्वरूप मानकर इस स्तोत्र का पाठ करने वालों को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिलती है।
- मानसिक शांति और सुरक्षा: भगवान की महिमा का स्मरण करने से मन को शांति मिलती है और सभी प्रकार के भय तथा बाधाओं से सुरक्षा प्राप्त होती है।
- ज्ञान की वृद्धि: परमात्मा के अचिन्त्य स्वरूप, सृष्टि-स्थिति-लय कर्तृत्व को समझने से ज्ञान में वृद्धि होती है और आध्यात्मिक प्रगति संभव होती है।
- इच्छित फल की प्राप्ति: भगवान वामन वरप्रदाता हैं, अतः भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में समृद्धि आती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री वामन स्तोत्रं क्या है?
श्री वामन स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री वामन स्तोत्र के पाठ के प्रमुख लाभ क्या हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री वामन स्तोत्र का उद्गम क्या है?
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