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श्री वामन स्तोत्रं

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स्तोत्र
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श्री वामन स्तोत्रं

अदितिरुवाच |
यज्ञेश यज्ञपुरुषाच्युत तीर्थपाद
तीर्थश्रवः श्रवण मंगळनामधेय |
आपन्नलोकवृजिनोपशमोदयाद्य
शं नः कृधीश भगवन्नसि दीननाथः || 1 ||

विश्वाय विश्वभवनस्थितिसंयमाय
स्वैरं गृहीतपुरुशक्तिगुणाय भूम्ने |
स्वस्थाय शश्वदुपबृंहितवूर्णबोध-
-व्यापादितात्मतमसे हरये नमस्ते || 2 ||

आयुः परं वपुरभीष्टमतुल्यलक्ष्मी-
-र्द्यौभूरसाः सकलयोगगुणास्त्रिवर्गः |
ज्ञानं च केवलमनंत भवंति तुष्टात्
त्वत्तो नृणां किमु सपत्नजयादिराशीः || 3 ||

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे अष्टमस्कंधे सप्तदशोऽध्याये श्री वामन स्तोत्रं |

अर्थ

श्री वामन स्तोत्रं देवी अदिति द्वारा अपने पुत्र, भगवान वामन को समर्पित एक हृदयस्पर्शी प्रार्थना है। भगवान विष्णु के पांचवें अवतार वामन, विनय और धर्म की स्थापना के प्रतीक हैं। यह स्तोत्र भगवान वामन की महिमा, उनकी सर्वव्यापकता और भक्तों पर उनकी कृपा का वर्णन करता है। यह श्री मद भागवत महापुराण के आठवें स्कंध में पाया जाता है, जहाँ अदिति अपने पुत्रों पर आए संकट से मुक्ति के लिए भगवान से प्रार्थना करती हैं।

पहले श्लोक में, अदिति देवी भगवान वामन को 'यज्ञेश' और 'यज्ञपुरुष' के रूप में संबोधित करती हैं। वे कहती हैं कि उनके चरणतीर्थ सभी पापों को शुद्ध करते हैं और उनके नाम का स्मरण मन को पवित्र करता है। वे भगवान से दुःखी संसार को शांति प्रदान करने, दीन-दुखियों के रक्षक बनने और दयालु होने की प्रार्थना करती हैं। यह श्लोक भगवान के नाम-स्मरण और उनके चरणों में शरणागति के महत्व पर जोर देता है, यह दर्शाता है कि भगवान ही संकटग्रस्त लोगों के एकमात्र आश्रय हैं।

दूसरे श्लोक में, अदिति देवी भगवान वामन को 'विश्वस्वरूप' के रूप में वर्णित करती हैं, जो सृष्टि, स्थिति और संहार के स्वामी हैं। वे स्वतंत्र हैं, असीमित शक्ति और गुणों से युक्त हैं। वे अज्ञान के अंधकार को दूर करके शुद्ध ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाले हैं। वे सर्वव्यापी हरि को नमन करती हैं, इस प्रकार भगवान के विश्वव्यापी स्वरूप, उनके अखंड ज्ञान और समस्त ब्रह्मांड के नियंत्रक होने की स्तुति करती हैं।

तीसरे श्लोक में, अदिति देवी भगवान की कृपा से मनुष्यों को प्राप्त होने वाले फलों का विस्तार से वर्णन करती हैं। वे कहती हैं कि दीर्घायु, सौंदर्य, अतुल्य लक्ष्मी, स्वर्ग, पृथ्वी, जल, सभी योग-सिद्धियाँ, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष (त्रिवर्ग), और शुद्ध ज्ञान – ये सब भगवान की संतुष्टि से प्राप्त होते हैं। वे प्रश्न करती हैं कि भगवान की संतुष्टि से बढ़कर मनुष्यों को और कौन सा बड़ा खजाना चाहिए, इस प्रकार यह प्रतिपादित करती हैं कि भगवत्कृपा ही अंतिम आशीर्वाद और सर्वोच्च फल है।

यह स्तोत्र केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि भगवान के अनंत गुणों को समझने और अनुभव करने का एक माध्यम है। वामन अवतार यह दर्शाता है कि कैसे विनम्रता के माध्यम से महान कार्य सिद्ध किए जा सकते हैं। इस स्तोत्र का पाठ भक्तों में भक्ति, विनम्रता और ज्ञान को बढ़ाता है। भगवान वामन के प्रति समर्पण भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है, और यह जीवन के अंतिम लक्ष्य मोक्ष की ओर ले जाता है।

लाभ (Benefits):

  • पाप मुक्ति: स्तोत्र के नियमित पाठ से पापों का शमन होता है और मन तथा आत्मा शुद्ध होती है।
  • दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य: भगवान की कृपा से उत्तम स्वास्थ्य, शारीरिक बल और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।
  • धन और समृद्धि: अतुल्य धन, भौतिक समृद्धि और जीवन में स्थिरता भगवान की प्रसन्नता से प्राप्त होती है।
  • ज्ञान और विवेक: अज्ञान का नाश होता है और शुद्ध ज्ञान, आंतरिक विवेक तथा आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि की प्राप्ति होती है।
  • धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति: जीवन के चारों पुरुषार्थ – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – भगवान वामन के आशीर्वाद से सिद्ध होते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री वामन स्तोत्रं क्या है?
श्री वामन स्तोत्रं भगवान विष्णु के वामन अवतार की स्तुति में एक पवित्र प्रार्थना है। यह श्री मद भागवत महापुराण में देवी अदिति द्वारा अपने पुत्र वामन को समर्पित स्तोत्र है। यह भगवान की महिमा, कृपा और सर्वव्यापकता का वर्णन करता है।
श्री वामन स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद शुद्ध मन से किया जा सकता है। एकादशी, पूर्णिमा और विष्णु से संबंधित त्योहारों पर इसका पाठ करना विशेष फलदायी होता है। भगवान वामन के चित्र के सामने बैठकर भक्तिपूर्वक जप करना उत्तम है।
श्री वामन स्तोत्र के पाठ के क्या लाभ हैं?
इस स्तोत्र के पाठ से पापों से मुक्ति, दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, धन, समृद्धि, ज्ञान और विवेक की प्राप्ति होती है। यह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष नामक चारों पुरुषार्थों की सिद्धि में सहायक होता है।
श्री वामन स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
भगवान विष्णु में श्रद्धा और भक्ति रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से संतान प्राप्ति, धन और बाधाओं के निवारण की इच्छा रखने वाले इसका पाठ कर सकते हैं।
श्री वामन स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
प्रतिदिन कम से कम 11 या 21 बार पाठ करना एक सामान्य अभ्यास है। विशिष्ट परिणामों के लिए, 108 बार या संकल्प के साथ निश्चित दिनों तक पाठ किया जा सकता है। निरंतरता और भक्ति महत्वपूर्ण हैं।
श्री वामन स्तोत्र का मूल स्रोत क्या है?
यह स्तोत्र श्री मद भागवत महापुराण के आठवें स्कंध के सत्रहवें अध्याय में देवी अदिति द्वारा अपने पुत्र वामन की स्तुति के रूप में वर्णित है।

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