श्री श्यामला स्तोत्रं
जय मातर्विशालाक्षि जय संगीतमातृके |
जय मातंगि चंडालि गृहीतमधुपात्रके || 1 ||
नमस्तेऽस्तु महादेवि नमो भगवतीश्वरि |
नमस्तेऽस्तु जगन्मातर्जय शंकरवल्लभे || 2 ||
जय त्वं श्यामले देवि शुकश्यामे नमोऽस्तु ते |
महाश्यामे महारामे जय सर्वमनोहरे || 3 ||
जय नीलोत्पलप्रख्ये जय सर्ववशंकरि |
जय त्वजात्वसंस्तुत्ये लघुश्यामे नमोऽस्तु ते || 4 ||
नमो नमस्ते रक्ताक्षि जय त्वं मदशालिनि |
जय मातर्महालक्ष्मि वागीश्वरि नमोऽस्तु ते || 5 ||
नम इंद्रादिसंस्तुत्ये नमो ब्रह्मादिपूजिते |
नमो मरकतप्रख्ये शंखकुंडलशोभिते || 6 ||
जय त्वं जगदीशानि लोकमोहिनि ते नमः |
नमस्तेऽस्तु महाकृष्णे नमो विश्वेशवल्लभे || 7 ||
महेश्वरि नमस्तेऽस्तु नीलांबरसमन्विते |
नमः कळ्याणि कृष्णांगि नमस्ते परमेश्वरि || 8 ||
महादेवप्रियकरि नमः सर्ववशंकरि |
महासौभाग्यदे नॄणां कदंबवनवासिनि || 9 ||
जय संगीतरसिके वीणाहस्ते नमोऽस्तु ते |
जनमोहिनि वंदे त्वां ब्रह्मविष्णुशिवात्मिके || 10 ||
वाग्वादिनि नमस्तुभ्यं सर्वविद्याप्रदे नमः |
नमस्ते कुलदेवेशि नमो नारीवशंकरि || 11 ||
अणिमादिगुणाधारे जय नीलाद्रिसन्निभे |
शंखपद्मादिसंयुक्ते सिद्धिदे त्वां भजाम्यहं || 12 ||
जय त्वं वरभूषांगि वरांगीं त्वां भजाम्यहं |
देवीं वंदे योगिवंद्ये जय लोकवशंकरि || 13 ||
सर्वालंकारसंयुक्ते नमस्तुभ्यं निधीश्वरि |
सर्गपालनसंहारहेतुभूते सनातनि || 14 ||
जय मातंगतनये जय नीलोत्पलप्रभे |
भजे शक्रादिवंद्ये त्वां जय त्वं भुवनेश्वरि || 15 ||
जय त्वं सर्वभक्तानां सकलाभीष्टदायिनि |
जय त्वं सर्वभद्रांगी भक्ताऽशुभविनाशिनि || 16 ||
महाविद्ये नमस्तुभ्यं सिद्धलक्ष्मि नमोऽस्तु ते |
ब्रह्मविष्णुशिवस्तुत्ये भक्तानां सर्वकामदे || 17 ||
मातंगीश्वरवंद्ये त्वां प्रसीद मम सर्वदा |
इत्येतच्छ्यामलास्तोत्रं सर्वकामसमृद्धिदं || 18 ||
शुद्धात्मा प्रजपेद्यस्तु नित्यमेकाग्रमानसः |
स लभेत्सकलान्कामान् वशीकुर्याज्जगत्त्रयं || 19 ||
शीघ्रं दासा भवंत्यस्य देवा योगीश्वरादयः |
रंभोर्वश्याद्यप्सरसामव्ययो मदनो भवेत् || 20 ||
नृपाश्च मर्त्याः सर्वेऽस्य सदा दासा भवंति हि |
लभेदष्टगुणैश्वर्यं दारिद्र्येण विमुच्यते || 21 ||
शंखादि निधयो द्वार्स्थाः सान्निध्यं पर्युपासते |
व्याचष्टे सर्वशास्त्राणि सर्वविद्यानिधिर्भवेत् || 22 ||
विमुक्तः सकलापद्भिः लभेत्संपत्तिमुत्तमां |
महापापोपपापौघैः सशीघ्रं मुच्यते नरः || 23 ||
जातिस्मरत्वमाप्नोति ब्रह्मज्ञानमनुत्तमं |
सदाशिवत्वमाप्नोति सोंते नात्र विचारणा || 24 ||
इति श्री श्यामला स्तोत्रं |
अर्थ
श्री श्यामला स्तोत्रम् माता मातंगी देवी को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। मातंगी देवी दशमहाविद्याओं में से एक हैं, जो वाणी, संगीत, कला और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी हैं। यह स्तोत्र भक्तों को मधुर वाणी, तीक्ष्ण बुद्धि, समृद्धि और आध्यात्मिक उत्थान प्रदान करता है। श्यामला देवी भगवान शिव की प्रिय पत्नी और समस्त जीवों का कल्याण करने वाली कल्याणी स्वरूप हैं। इस स्तोत्र के निरंतर पाठ से भक्त देवी की कृपा के पात्र बनते हैं और उनका जीवन धन्य होता है।
यह स्तोत्र श्री श्यामला देवी के विभिन्न दिव्य गुणों और रूपों का वर्णन करता है। देवी को विशालाक्षी, संगीतमातृका, महाश्यामा, वागीश्वरी और जगन्माता के रूप में स्तुति की जाती है। यह केवल देवी के रूप का वर्णन नहीं, बल्कि उनकी आंतरिक शक्ति, ज्ञान और करुणा को भी उजागर करता है। देवी का श्यामला वर्ण अनंत आकाश और गहन ज्ञान का प्रतीक है। इस स्तोत्र के माध्यम से भक्त देवी के साथ गहरा आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने का प्रयास करते हैं, जिससे उन्हें आंतरिक शांति और शक्ति मिलती है।
प्रारंभिक श्लोकों (1-5) में, देवी को विशालाक्षी, संगीत की जननी, मदशालिनी, वाणी की देवी और शिव की प्रिय पत्नी के रूप में स्तुति की जाती है। वह जगन्माता और सभी को मोहित करने वाली हैं। बाद के श्लोकों (6-9) में, देवी के दिव्य रूप का वर्णन किया गया है। वह नीले रंग की, मरकत मणि के समान चमकने वाली, और शंखकुंडल से सुशोभित हैं। इंद्र आदि देवताओं द्वारा पूजित, ब्रह्मादि द्वारा स्तुति की गई हैं। वह लोकमोहिनी, नीलाम्बरधारिणी, कल्याणी और कदम्ब वन में निवास करने वाली सौंदर्यमूर्तियों का समूह हैं।
अगले श्लोकों में (10-13), देवी की वाक्शक्ति, योग शक्ति और ऐश्वर्य प्रदान करने की क्षमता का वर्णन किया गया है। वह वीणाधारिणी, संगीतप्रेमी और सभी विद्याओं को प्रदान करने वाली हैं। उनकी कृपा दृष्टि से योगी, राजा और देवता भी भक्त के सेवक बन जाते हैं। अणिमा, लघिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ, ऐश्वर्य और विजय स्वतः ही प्राप्त होते हैं। अंतिम कुछ श्लोकों में (14-17), देवी को सृष्टि, स्थिति, लय की कारणभूता महामाया, जगन्माता कहा गया है। वह मातंगीतनया, भक्तों की सभी इच्छाएँ पूरी करने वाली और महाविद्या, सिद्धलक्ष्मी स्वरूपिणी हैं। वह भक्तों के पापों और अशुभों को नष्ट करके समस्त संपदाएँ प्रदान करती हैं।
स्तोत्र का अंतिम भाग (18-24) फलश्रुति का वर्णन करता है। जो भक्त इस स्तोत्र का नित्य भक्तिपूर्वक पाठ करते हैं, उनकी सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं। देवता, योगेश्वर, राजा और अप्सराएँ उनके वश में हो जाते हैं। दरिद्रता दूर होकर अष्टैश्वर्य प्राप्त होते हैं। पापों का नाश होकर ब्रह्मज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति होती है। अंततः, भक्त शिवत्व को प्राप्त करता है — “सदाशिवत्वमाप्नोति” ऐसा वाग्देवी आशीर्वाद देती हैं। यह स्तोत्र भक्त की वाणी, बुद्धि और जीवन को परिवर्तित करने की शक्ति रखता है, उसे दिव्य अनुग्रह से भर देता है।
लाभ (Benefits):
- वाणी में मधुरता और ओज (Sweetness and Radiance in Speech): इस स्तोत्र के नियमित पाठ से भक्तों की वाणी में अद्भुत शक्ति, स्पष्टता और मधुरता आती है। कवियों, वक्ताओं और कलाकारों के लिए यह विशेष रूप से लाभकारी है।
- ज्ञान और तीक्ष्ण बुद्धि (Knowledge and Sharp Intellect): श्री श्यामला देवी ज्ञान और विद्या की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण, इस स्तोत्र के पाठ से बुद्धि तीव्र होती है, सीखने में एकाग्रता बढ़ती है और गहन ज्ञान की प्राप्ति होती है।
- धन और समृद्धि (Wealth and Prosperity): यह स्तोत्र दरिद्रता को दूर कर अष्टैश्वर्य, धन और समृद्धि प्रदान करने की शक्ति रखता है। आर्थिक समस्याओं से मुक्ति मिलती है और जीवन में सौभाग्य आता है।
- राजवशीकरण और प्रभाव (Royal Influence and Charisma): देवी की कृपा से भक्त समाज में सम्मान, अधिकार और प्रभाव प्राप्त करता है। राजा, अधिकारी और महत्वपूर्ण व्यक्ति भी भक्त की बातों को महत्व देते हैं।
- मोक्ष और आध्यात्मिक उन्नति (Liberation and Spiritual Upliftment): पापों का नाश कर, ब्रह्मज्ञान प्रदान कर, अंततः शिवत्व प्राप्त करने में यह स्तोत्र सहायक है। यह केवल भौतिक लाभ ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक मुक्ति भी प्रदान करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री श्यामला स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री श्यामला स्तोत्रं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
कौन इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री श्यामला स्तोत्र का उद्गम क्या है?
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