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श्री श्यामला पंचाशत्स्वरवर्णमालिका स्तोत्रं

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स्तोत्र
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श्री श्यामला पंचाशत्स्वरवर्णमालिका स्तोत्रं

वंदेऽहं वनजेक्षणां वसुमतीं वाग्देवि तां वैष्णवीं
शब्दब्रह्ममयीं शशांकवदनां शातोदरीं शांकरीं |
षड्बीजां सशिवां समंचितपदामाधारचक्रेस्थितां
चिद्रूपां सकलेप्सितार्थवरदां बालां भजे श्यामलां || 1 ||

बालां भास्करभासमप्रभयुतां भीमेश्वरीं भारतीं
माणिक्यांचितहारिणीमभयदां योनिस्थितेयं पदां |
ह्रां ह्रां ह्रीं कमयीं रजस्तमहरीं लंबीजमोंकारिणीं
चिद्रूपां सकलेप्सितार्थवरदां बालां भजे श्यामलां || 2 ||

डं ढं णं त थमक्षरीं तव कळांताद्याकृतीतुर्यगां
दं धं नं नवकोटिमूर्तिसहितां नादं सबिंदूकलां |
पं फं मंत्रफलप्रदां प्रतिपदां नाभौ सचक्रेस्थितां
चिद्रूपां सकलेप्सितार्थवरदां बालां भजे श्यामलां || 3 ||

कं खं गं घ मयीं गजास्यजननीं गानप्रियामागमीं
चं छं जं झं झण क्वणि घणु घिणू झंकारपादां रमां |
ञं टं ठं हृदये स्थितां किणिकिणी नादौ करौ कंकणां
चिद्रूपां सकलेप्सितार्थवरदां बालां भजे श्यामलां || 4 ||

अं आं इं इमयीं इहैव सुखदामीकार उ ऊपमां
ऋं ॠं लुं सहवर्णपीठनिलये लूंकार एं ऐं सदा |
ॐ औं अन्नमये अः स्तवनुतामानंदमानंदिनीं
चिद्रूपां सकलेप्सितार्थवरदां बालां भजे श्यामलां || 5 ||

हं क्षं ब्रह्ममयीं द्विपत्रकमलां भ्रूमध्यपीठेस्थितां
इडापिंगळमध्यदेशगमनामिष्टार्थसंदायिनीं |
आरोहप्रतिरोहयंत्रभरितां साक्षात्सुषुम्ना कलां
चिद्रूपां सकलेप्सितार्थवरदां बालां भजे श्यामलां || 6 ||

ब्रह्मेशादि समस्त मौनिऋषिभिर्देवैः सदा ध्यायिनीं
ब्रह्मस्थाननिवेशिनीं तव कलां तारं सहस्रांशके |
खव्यं खव्यमयीं खगेशविनुतां खं रूपिमोंकारिणीं
चिद्रूपां सकलेप्सितार्थवरदां बालां भजे श्यामलां || 7 ||

चक्राण्ये सतु सप्तमंतरगते वर्णात्मिके तां श्रियं
नादं बिंदुकलामयींश्चरहिते निःशब्द निर्व्यापके |
निर्व्यक्तां च निरंजनीं निरवयां श्रीयंत्रमात्रां परां
चिद्रूपां सकलेप्सितार्थवरदां बालां भजे श्यामलां || 8 ||

बालामालमनोहरां प्रतिदिनं वांछंति वाच्यं पठेत्
वेदे शास्त्र विवादकालसमये स्थित्वा सभामध्यमे |
पंचाशत्स्वरवर्णमालिकमियां जिह्वाग्र संस्था पठे-
-द्धर्मार्थाखिलकामविक्षितकृपाः सिध्यंति मोक्षं तथा || 9 ||

इति श्री श्यामला पंचाशत्स्वरवर्णमालिका स्तोत्रं |

अर्थ

श्री श्यामला पंचाशत्स्वरवर्णमालिका स्तोत्रम, देवी मातंगी के स्वरूप, श्री श्यामला देवी को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और अद्वितीय स्तोत्र है। यह स्तोत्र संस्कृत वर्णमाला के 50 अक्षरों (स्वर और व्यंजन) को देवी के विभिन्न रूपों और शक्तियों के रूप में पूजता है। प्रत्येक अक्षर को एक शक्ति, एक चेतना और एक नाद के रूप में माना गया है, जो सामूहिक रूप से देवी मातंगी की सर्वव्यापकता को दर्शाते हैं। यह स्तोत्र शब्द ब्रह्म के सार को समाहित करता है और वाक् शक्ति, ज्ञान तथा सभी इच्छाओं को प्रदान करने वाली देवी की महिमा का गुणगान करता है।

पहला श्लोक कमल के समान नेत्रों वाली, पृथ्वी की स्वामिनी, वाग्देवी, वैष्णवी, शब्द ब्रह्ममयी, चंद्रमा के समान मुख वाली, पतली कमर वाली, शंकरी (भगवान शंकर की पत्नी) श्यामला देवी को नमन करता है। यह देवी को आधारचक्र में स्थित, छह बीजाक्षरों से युक्त, शिव के साथ शोभित, सुंदर चरणों वाली, चिद्रूपिणी और सभी वांछित फल प्रदान करने वाली बाला श्यामला के रूप में भजने का आह्वान करता है। यह देवी के मूल स्वरूप, उनकी सुंदरता और उनकी अनुग्रह करने की शक्ति का वर्णन करता है। दूसरा श्लोक सूर्य के समान तेजस्वी, भीमेश्वरी स्वरूप वाली, भारती (ज्ञान की अधिष्ठात्री), माणिक्य जटित हारों से सुशोभित, अभय प्रदान करने वाली, योनि स्थान में स्थित देवी का वर्णन करता है। 'ह्रां ह्रां ह्रीं' जैसे बीजाक्षर स्वरूपिणी, रजस और तमस गुणों का हरण करने वाली, 'लं' बीजाक्षर और ॐकार स्वरूपिणी, चिद्रूपिणी और सभी इच्छित फल प्रदान करने वाली बाला श्यामला का भजन करने का उल्लेख करता है। यहाँ देवी की तेजस्विता, उनकी रक्षा शक्ति और बीजाक्षरों के साथ उनके संबंध पर जोर दिया गया है।

तीसरा श्लोक 'डम ढम णम त थ' अक्षरों के रूप में, तुरीय अवस्था में स्थित, 'दम धम नम' नामक नौ करोड़ मूर्तियों से युक्त, नाद, बिंदु और कलाओं से समन्वित देवी का वर्णन करता है। यह 'पं फं' मंत्रों का फल देने वाली, प्रत्येक पद में विद्यमान, नाभिचक्र में चक्र रूप में स्थित, चिद्रूपिणी और सभी इच्छित फल प्रदान करने वाली बाला श्यामला का भजन करने का आह्वान करता है। यह देवी की नाभिचक्र में उपस्थिति, मंत्रों का फल देने की क्षमता और वर्णमाला के साथ उनके अविनाभावी संबंध को दर्शाता है। चौथा श्लोक 'कं खं गं घ' अक्षरों के रूप में, गणेश की जननी, संगीत प्रिय, आगमों के स्वरूपिणी, 'चं छं जं झं' जैसे अक्षरों की झंकार से युक्त चरणों वाली, रमा देवी के समान, हृदय में 'ञं टं ठं' अक्षरों के रूप में स्थित, किणकिणी नाद करने वाले कंकणों से सुशोभित हाथों वाली, चिद्रूपिणी और सभी इच्छित फल प्रदान करने वाली बाला श्यामला का भजन करने का उल्लेख करता है। यहाँ देवी के संगीत प्रेम, गणेश के साथ उनके संबंध और उनके आभूषणों की ध्वनि का वर्णन किया गया है।

यह स्तोत्र 'अ, आ, इ, उ' जैसे स्वराक्षरों के मूल परमात्मा स्वरूपिणी को, अन्नमय कोष में आनंद प्रदान करने वाली देवी को, पूर्ण शब्द रूप चैतन्य को स्तुति करता है। 'हं, क्षं' जैसे परबीजमय शब्दरूपिणी के रूप में, सुषुम्ना नाड़ी में स्थित चैतन्य शक्ति के रूप में, इडा, पिंगला, सुषुम्ना नाड़ियों में संचार करके योगसिद्धि प्रदान करने वाली के रूप में, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रादि देवताओं द्वारा ध्येय के रूप में, ब्रह्मस्थान में निवास करने वाली, आकाशरूपिणी के रूप में, मंत्ररूप ॐकारिणी देवी के रूप में, सप्तचक्रों के भीतर स्थित वर्णात्मक रूपिणी के रूप में, नाद, बिंदु, कलाओं से युक्त परम शक्ति के रूप में, निर्व्यक्त, निरंजन, निरवयव श्रीयंत्रमय चैतन्य स्वरूपिणी के रूप में श्यामला देवी की महिमा करता है। यह स्तोत्र सिखाता है कि प्रत्येक अक्षर, प्रत्येक ध्वनि देवी का ही स्वरूप है।

लाभ (Benefits):

  • वाक् शक्ति में वृद्धि: इस स्तोत्र के पाठ से वाग्देवी की कृपा प्राप्त होती है, वाणी स्पष्ट होती है और सभाओं तथा वाद-विवाद में विजय मिलती है।
  • ज्ञान की प्राप्ति: शब्द ब्रह्म स्वरूपिणी देवी की आराधना से वेद, शास्त्र और अन्य विद्याओं में गहन ज्ञान प्राप्त होता है।
  • इच्छित फल की सिद्धि: श्यामला देवी सभी मनोरथों को पूर्ण करने की शक्ति रखती हैं, अतः भक्त अपने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष संबंधी इच्छाओं को पूरा कर पाते हैं।
  • आध्यात्मिक उन्नति: यह स्तोत्र कुंडलिनी शक्ति जागरण और चक्रों के शुद्धिकरण में सहायक है, जिससे योगसिद्धि और आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता है।
  • संगीत और कला का विकास: देवी संगीत प्रिय हैं, इसलिए संगीतकार, कलाकार और वक्ता इस स्तोत्र के पाठ से विशेष कृपा प्राप्त करते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री श्यामला पंचाशत्स्वरवर्णमालिका स्तोत्रं क्या है?
श्री श्यामला पंचाशत्स्वरवर्णमालिका स्तोत्रं देवी मातंगी को समर्पित एक शक्तिशाली स्तोत्र है। यह संस्कृत वर्णमाला के 50 अक्षरों को देवी के स्वरूप के रूप में पूजता है, जहाँ प्रत्येक अक्षर एक शक्ति और चेतना का प्रतिनिधित्व करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह या शाम स्नान के बाद शुद्ध मन से किया जा सकता है। देवी के चित्र या मूर्ति के सामने बैठकर भक्तिपूर्वक पाठ करना अधिक फलदायी होता है।
इस स्तोत्र के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
इसके नियमित पाठ से वाक् शक्ति में वृद्धि, ज्ञान की प्राप्ति, सभी मनोकामनाओं की सिद्धि, आध्यात्मिक उन्नति और संगीत-कला में प्रगति प्राप्त होती है। यह सभी प्रकार की बाधाओं को दूर करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
वक्ता, छात्र, कलाकार, संगीतकार, आध्यात्मिक साधक और अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करने वाले कोई भी भक्त इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना उचित है?
सर्वोत्तम परिणामों के लिए प्रतिदिन कम से कम एक बार या 11, 21, 108 बार पाठ करना उचित है। शुक्रवार और नवरात्रि के दौरान इसका विशेष रूप से पाठ किया जाता है।
इस स्तोत्र की उत्पत्ति या स्रोत क्या है?
यह स्तोत्र प्रमुख शक्ति उपासना ग्रंथों में से एक है। यह शब्द ब्रह्म के सार को समाहित करता है और वैदिक परंपरा से देवी के वर्णमालिका स्वरूप को प्राप्त करता है।

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