श्री श्यामला कवचं
श्री देव्युवाच |
साधुसाधु महादेव कथयस्व महेश्वर |
येन संपद्विधानेन साधकानां जयप्रदं || 1 ||
विना जपं विना होमं विना मंत्रं विना नुतिं |
यस्य स्मरणमात्रेण साधको धरणीपतिः || 2 ||
श्री भैरव उवाच |
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि मातंगीकवचं परं |
गोपनीयं प्रयत्नेन मौनेन जपमाचरेत् || 3 ||
मातंगीकवचं दिव्यं सर्वरक्षाकरं नृणां |
कवित्वं च महत्वं च गजावाजिसुतादयः || 4 ||
शुभदं सुखदं नित्यमणिमादिप्रदायकं |
ब्रह्मविष्णुमहेशानां तेषामाद्या महेश्वरी || 5 ||
श्लोकार्धं श्लोकमेकं वा यस्तु सम्यक्पठेन्नरः |
तस्य हस्ते सदैवास्ते राज्यलक्ष्मीर्न संशयः || 6 ||
साधकः श्यामलां ध्यायन् कमलासनसंस्थितः |
योनिमुद्रां करे बध्वा शक्तिध्यानपरायणः || 7 ||
कवचं तु पठेद्यस्तु तस्य स्युः सर्वसंपदः |
पुत्रपौत्रादिसंपत्तिरंते मुक्तिश्च शाश्वती || 8 ||
ब्रह्मरंध्रं सदा पायाच्छ्यामला मंत्रनायिका |
ललाटं रक्षतां नित्यं कदंबेशी सदा मम || 9 ||
भ्रुवौ पायच्च सुमुखी अव्यान्नेत्रे च वैणिकी |
वीणावती नासिकां च मुखं रक्षतु मंत्रिणी || 10 ||
संगीतयोगिनी दंतान् अव्यादोष्ठौ शुकप्रिया |
चुबुकं पातु मे श्यामा जिह्वां पायान्महेश्वरी || 11 ||
कर्णौ देवी स्तनौ काळी पातु कात्यायनी मुखं |
नीपप्रिया सदा रक्षेदुदरं मम सर्वदा || 12 ||
प्रियंकरी प्रियव्यापी नाभिं रक्षतु मुद्रिणी |
स्कंधौ रक्षतु शर्वाणी भुजौ मे पातु मोहिनी || 13 ||
कटिं पातु प्रधानेशी पातु पादौ च पुष्पिणी |
आपादमस्तकं श्यामा पूर्वे रक्षतु पुष्टिदा || 14 ||
उत्तरे त्रिपुरा रक्षेद्विद्या रक्षतु पश्चिमे |
विजया दक्षिणे पातु मेधा रक्षतु चानले || 15 ||
प्राज्ञा रक्षतु नैरृत्यां वायव्यां शुभलक्षणा |
ईशान्यां रक्षताद्देवी मातंगी शुभकारिणी || 16 ||
ऊर्ध्वं पातु सदा देवी देवानां हितकारिणी |
पातळे पातु मां नित्या वासुकी विश्वरूपिणी || 17 ||
अकारादिक्षकारांतमातृकारूपधारिणी |
आपादमस्तकं पायादष्टमातृस्वरूपिणी || 18 ||
अवर्गसंभवा ब्राह्मी मुखं रक्षतु सर्वदा |
कवर्गस्था तु माहेशी पातु दक्षभुजं तथा || 19 ||
चवर्गस्था तु कौमारी पायान्मे वामकं भुजं |
दक्षपादं समाश्रित्य टवर्गं पातु वैष्णवी || 20 ||
तवर्गजन्मा वाराही पायान्मे वामपादकं |
तथा पवर्गजेंद्राणी पार्श्वादीन् पातु सर्वदा || 21 ||
यवर्गस्था तु चामुंडा हृद्दोर्मूले च मे तथा |
हृदादिपाणिपादांतजठराननसंज्ञिकं || 22 ||
चंडिका च शवर्गस्था रक्षतां मम सर्वदा |
विशुद्धं कंठमूलं तु रक्षतात्षोडशस्वराः || 23 ||
ककारादि ठकारांत द्वादशार्णं हृदंबुजं |
मणिपूरं डाधिफांत दशवर्णस्वरूपिणी || 24 ||
स्वाधिष्ठानं तु षट्पत्रं बादिलांतस्वरूपिणी |
वादिसांतस्वरूपाऽव्यान्मूलाधारं चतुर्दळं || 25 ||
हंक्षार्णमाज्ञा द्विदळं भ्रुवोर्मध्यं सदावतु |
अकारादिक्षकारांतमातृकाबीजरूपिणि || 26 ||
मातंगी मां सदा रक्षेदापादतलमस्तकं |
इमं मंत्रं समुद्धार्य धारयेद्वामके भुजे || 27 ||
कंठे वा धारयेद्यस्तु स वै देवो महेश्वरः |
तं दृष्ट्वा देवताः सर्वाः प्रणमंति सुदूरतः || 28 ||
तस्य तेजः प्रभावेन सम्यग्गंतुं न शक्यते |
इंद्रादीनां लभेत्सत्यं भूपतिर्वशगो भवेत् || 29 ||
वाक्सिद्धिर्जायते तस्य अणिमाद्यष्टसिद्धयः |
अज्ञात्वा कवचं देव्याः श्यामलां यो जपेन्नरः || 30 ||
तस्यावश्यं तु सा देवी योगिनी भक्षयेत्तनुं |
इह लोके सदा दुःखं अतो दुःखी भविष्यति || 31 ||
जन्मकोटि सदा मूको मंत्रसिद्धिर्न विद्यते |
गुरुपादौ नमस्कृत्य यथामंत्रं भवेत्सुधीः || 32 ||
तथा तु कवचं देव्याः सफलं गुरुसेवया |
इह लोके नृपो भूत्वा पठेन्मुक्तो भविष्यति || 33 ||
बोधयेत्परशिष्याय दुर्जनाय सुरेश्वरि |
निंदकाय कुशीलाय शक्तिहिंसापराय च || 34 ||
यो ददाति न सिध्येत मातंगीकवचं शुभं |
न देयं सर्वदा भद्रे प्राणैः कंठगतैरपि || 35 ||
गोप्याद्गोप्यतरं गोप्यं गुह्याद्गुह्यतमं महत् |
दद्याद्गुरुः सुशिष्याय गुरुभक्तिपराय च |
शिवे नष्टे गुरुस्त्राता गुरौ नष्टे न कश्चन || 36 ||
इति श्रीशक्तितंत्रमहार्णवे श्री श्यामला कवचं |
अर्थ
श्री श्यामला कवचम देवी और भैरव के संवाद से उत्पन्न एक अत्यंत शक्तिशाली और गोपनीय स्तोत्र है। देवी पार्वती ने भगवान शिव (भैरव) से पूछा, "हे महादेव, क्या कोई ऐसा मार्ग है जिससे बिना मंत्र, बिना होम, बिना जप के ही साधकों को विजय, ऐश्वर्य और कीर्ति प्राप्त हो सके?" इस पर श्री भैरव ने उत्तर दिया, "देवी! यह मातंगी कवच है। इसे अत्यंत गोपनीय रूप से और मौन रहकर जपना चाहिए। इसके पाठ से भक्त को सभी प्रकार की संपत्ति, काव्य-प्रतिभा, गजवाहन का प्रताप और राज्य का सौभाग्य प्राप्त होता है।"
मातंगी देवी वाणी, संगीत और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी हैं। उन्हें स्मरण मात्र से ही भक्तों को राजसी वैभव, वाक्-वैभव और कीर्ति प्राप्त होती है। इस कवच का पाठ करने वाले साधक श्रीविद्या साधना में सफल होते हैं। श्यामला कवचम केवल भौतिक सुरक्षा ही नहीं, अपितु आध्यात्मिक उन्नति भी प्रदान करता है। यह अणिमादि अष्ट सिद्धियों को भी प्रदान करने में सक्षम है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश जैसे देवताओं की भी आदि शक्ति स्वरूपा महेश्वरी देवी ही श्यामला रूप में भक्तों की रक्षा करती हैं।
यह कवच शरीर के प्रत्येक अंग और प्रत्येक दिशा को देवी के विभिन्न रूपों से सुरक्षित करता है। सिर की रक्षा श्यामला मंत्रनायिका, माथे की कदम्बेशी, नेत्रों की वीणावती और वैणिकी, पूरे मुख की मंत्रिणी और संगीतयोगिनी, कानों की काली, वक्ष की कादंबरी, उदर की नीपप्रिया, नाभि की मुद्रिणी, भुजाओं की मोहिनी, कमर की प्रधानेशी और पैरों की पुष्पिणी देवी करती हैं। इसके अतिरिक्त, पूर्व दिशा की पुष्टिदा, दक्षिण की विजया, पश्चिम की विद्या, उत्तर की त्रिपुरा और ईशान कोण की स्वयं मातंगी देवी रक्षा करती हैं। यह कवच अक्षरमाला के प्रत्येक वर्ग को भी देवता रूप में संरक्षित करता है, जो संपूर्ण सुरक्षा का प्रतीक है।
इस कवच के आधे श्लोक या एक श्लोक का भी जो व्यक्ति ठीक से पाठ करता है, उसे सदा राज्यलक्ष्मी सहज ही प्राप्त होती है, इसमें कोई संदेह नहीं है। कमलासन पर बैठकर, योनिमुद्रा धारण कर, शक्ति ध्यान में लीन होकर श्यामला देवी का ध्यान करते हुए इस कवच का पाठ करने वाले साधकों को समस्त संपदाएं, पुत्र-पौत्रादि सौभाग्य प्राप्त होते हैं और अंत में शाश्वत मुक्ति भी मिलती है। यह कवच अज्ञान को दूर करता है, नकारात्मक प्रभावों को हटाता है और दिव्य कृपा के माध्यम से मोक्ष की ओर मार्गदर्शन करता है।
लाभ (Benefits):
- वाक्पटुता और काव्य-प्रतिभा: इस कवच के पाठ से भक्त असाधारण वाक्चातुर्य, काव्य रचना की क्षमता और संगीत का ज्ञान प्राप्त करते हैं। मातंगी देवी वाक्सिद्धि प्रदान करती हैं।
- ऐश्वर्य और कीर्ति: देवी की कृपा से भक्तों को राजसी धन-संपत्ति, अपार वैभव और समाज में उच्च स्थान, प्रसिद्धि तथा सम्मान प्राप्त होता है।
- मानसिक स्पष्टता और ज्ञान: यह अज्ञानता को दूर करता है, बुद्धि को तीव्र करता है और दिव्य ज्ञान प्रदान करता है। निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि होती है।
- संपूर्ण सुरक्षा: शरीर के प्रत्येक अंग और सभी दिशाओं को देवी के विभिन्न रूप सुरक्षित करते हैं, जिससे भक्तों को सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों, कठिनाइयों और बाधाओं से पूर्ण सुरक्षा मिलती है।
- मोक्ष और आध्यात्मिक उन्नति: इस कवच का नियमित पाठ भौतिक सुखों के साथ-साथ, अंततः शाश्वत मुक्ति और आध्यात्मिक ज्ञानोदय का मार्ग भी प्रशस्त करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री श्यामला कवचम् क्या है?
श्री श्यामला कवचम् का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री श्यामला कवचम् के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
श्री श्यामला कवचम् का पाठ किसे करना चाहिए?
श्री श्यामला कवचम् का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री श्यामला कवचम् की उत्पत्ति क्या है?
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