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शास्त्रा भुजंग स्तोत्रं

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स्तोत्र
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श्रितानंदचिंतामणिश्रीनिवासं
सदा सच्चिदानंदपूर्णप्रकाशं ।
उदारं सदारं सुराधारमीशं
परं ज्योतिरूपं भजे भूतनाथं ॥1॥

विभुं वेदवेदांतवेद्यं वरिष्ठं
विभूतिप्रदं विश्रुतं ब्रह्मनिष्ठं ।
विभास्वत्प्रभावप्रभं पुष्कलेषुं
परं ज्योतिरूपं भजे भूतनाथं ॥2॥

परित्राणदक्षं परब्रह्मसूत्रं
स्फुरच्चारुगात्रं भवध्वांतमित्रं ।
परं प्रेमपात्रं पवित्रं विचित्रं
परं ज्योतिरूपं भजे भूतनाथं ॥3॥

परेशं प्रभुं पूर्णकारुण्यरूपं
गिरीशाधिपीठोज्ज्वलच्चारुदीपं ।
सुरेशादि संसेवितं सुप्रतापं
परं ज्योतिरूपं भजे भूतनाथं ॥4॥

गुरुं पूर्णलावण्यपादादिकेशं
गरिष्ठं महाकोटिसूर्यप्रकाशं ।
करांभोरुहन्यस्तवेत्रं सुरेशं
परं ज्योतिरूपं भजे भूतनाथं ॥5॥

हरीशानसंयुक्तशक्त्येकवीरं
किरातावतारं कृपापांगपूरं ।
किरीटावतंसोज्ज्वलत्पिंछभारं
परं ज्योतिरूपं भजे भूतनाथं ॥6॥

महायोगपीठे ज्वलंतं महांतं
महावाक्यसारोपदेशं सुशांतं ।
महर्षिप्रहर्षप्रदं ज्ञानकंदं
परं ज्योतिरूपं भजे भूतनाथं ॥7॥

महारण्यमन्मानसांतर्निवासा-
नहंकार दुर्वारहिंस्रान्मृगादीन् ।
निहंतुं किरातावतारं चरंतं
परं ज्योतिरूपं भजे भूतनाथं ॥8॥

पृथिव्यादि भूतप्रपंचांतरस्थं
पृथग्भूतचैतन्यजन्यं प्रशस्तं ।
प्रधानं प्रमाणं पुराणं प्रसिद्धं
परं ज्योतिरूपं भजे भूतनाथं ॥9॥

जगज्जीवनं पावनं भावनीयं
जगद्व्यापकं दीपकं मोहनीयं ।
सुखाधारमाधारभूतं तुरीयं
परं ज्योतिरूपं भजे भूतनाथं ॥10॥

इहामुत्रसत्सौख्यसंपन्निधानं
महद्योनिमव्याहृतात्माभिधानं ।
अहः पुंडरीकाननं दीप्यमानं
परं ज्योतिरूपं भजे भूतनाथं ॥11॥

त्रिकालस्थितं सुस्थिरं ज्ञानसंस्थं
त्रिधामत्रिमूर्त्यात्मकं ब्रह्मसंस्थं ।
त्रयीमूर्तिमार्तिछिदं शक्तियुक्तं
परं ज्योतिरूपं भजे भूतनाथं ॥12॥

इडां पिंगळां सत्सुषुम्नां विशंतं
स्फुटं ब्रह्मरंध्रस्वतंत्रं सुशांतं ।
दृढं नित्य निर्वाणमुद्भासयंतं
परं ज्योतिरूपं भजे भूतनाथं ॥13॥

अनुब्रह्मपर्यंतजीवैक्यबिंबं
गुणाकारमत्यंतभक्तानुकंपं ।
अनर्घं शुभोदर्कमात्मावलंबं
परं ज्योतिरूपं भजे भूतनाथं ॥14॥

इति शास्त्रा भुजंग स्तोत्रं संपूर्णं ॥

अर्थ

श्री शास्त्रा भुजंग स्तोत्रम भगवान श्री शास्ता (अय्यप्पा) की स्तुति में एक अत्यंत शक्तिशाली और भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। 'भुजंग' का अर्थ सर्प होता है, और यह स्तोत्र सर्प की तरह प्रवाहमान, लयबद्ध शैली में है, जो पढ़ने या सुनने पर मन को शांति प्रदान करता है। यह स्तोत्र भगवान अय्यप्पा के विभिन्न दिव्य गुणों, रूपों और महिमाओं का वर्णन करता है। भगवान अय्यप्पा को हरि (विष्णु) और हर (शिव) दोनों की शक्तियों का संयोजन माना जाता है, जिन्होंने धर्म की रक्षा और भक्तों को दुष्ट शक्तियों से बचाने के लिए अवतार लिया।

इस स्तोत्र का प्रत्येक श्लोक भगवान के अनंत गुणों का गहराई से वर्णन करता है। पहला श्लोक भगवान भूतनाथ को आनंदमय, चिंतामणि के समान आशीर्वाद का स्रोत, सच्चिदानंदपूर्ण और परब्रह्म ज्योतिरूप के रूप में स्तुति करता है। दूसरा श्लोक उन्हें वेदों और वेदांतों द्वारा जानने योग्य परमात्मा, ब्रह्मनिष्ठ और करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी बताता है। तीसरे श्लोक में, उन्हें भक्तों के रक्षक, संसार के अंधकार को दूर करने वाले, प्रेमस्वरूप और पवित्र बताया गया है। चौथा श्लोक कहता है कि भगवान करुणा से परिपूर्ण हैं, कैलाश के शिखर पर विराजमान हैं, और देवताओं द्वारा पूजे जाने वाले परम तेजस्वी प्रभु हैं।

आगे के श्लोकों में, भगवान अय्यप्पा की सुंदरता, शक्ति और ज्ञान का विस्तृत विवरण दिया गया है। पाँचवाँ श्लोक उन्हें पैर से सिर तक सुंदर, करोड़ों सूर्यों की चमक से प्रकाशित और धर्म का पवित्र दंड धारण करने वाले के रूप में स्तुति करता है। छठा श्लोक हरि और शिव की संयुक्त शक्ति से युक्त वीर, किरात रूप में अवतरित, करुणा से ओतप्रोत और मोर पंखों से सुशोभित मुकुट धारण करने वाले के रूप में उनका वर्णन करता है। सातवाँ श्लोक उन्हें महायोगपीठ पर विराजमान, ज्ञान के मूल और महर्षियों को आनंद प्रदान करने वाले महाशांत मूर्ति के रूप में स्मरण करता है। इसके अलावा, स्तोत्र भगवान को अहंकार रूपी मृग का संहार करने के लिए किरात अवतार धारण करने वाले, भूत-प्रेत जगत में व्याप्त चैतन्य स्वरूप, जगत के कारण और मोह को दूर करने वाले के रूप में वर्णित करता है, जो उनकी सर्वव्यापकता और सर्वशक्तिमानता को दर्शाता है। यह स्तोत्र इहलोक और परलोक में सुख-संपदा प्रदान करने वाले, त्रिमूर्तियों के रूप में पूजनीय परमात्मा की प्रशंसा करता है।

इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से भक्तों को मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति और लौकिक लाभ प्राप्त होते हैं। यह भगवान अय्यप्पा की पूर्ण कृपा प्राप्त करने में मदद करता है, जीवन की सभी बाधाओं को दूर करता है और धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरणा देता है। भगवान का यह भुजंग स्तोत्र केवल श्लोकों का संग्रह नहीं है, बल्कि भक्ति के गहरे अनुभव और दिव्य संबंध का एक साधन है।

लाभ (Benefits):

  • मानसिक शांति और आध्यात्मिक विकास: इस स्तोत्र के नियमित पाठ से मन को शांति मिलती है और आध्यात्मिक ज्ञान में वृद्धि होती है।
  • संकट निवारण: भगवान अय्यप्पा भक्तों के संकटों को दूर करने वाले हैं, इसलिए यह स्तोत्र सभी परेशानियों और चुनौतियों से मुक्ति दिलाता है।
  • सुरक्षा और निर्भयता: भूतनाथ भगवान अय्यप्पा अपने भक्तों को सभी बुरी शक्तियों और भय से बचाते हैं।
  • स्वास्थ्य और समृद्धि: इस स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करने से उत्तम स्वास्थ्य, धन और समृद्धि प्राप्त होती है।
  • मनोकामना पूर्ति: भगवान की पूर्ण कृपा से भक्तों की सभी नेक इच्छाएँ और मनोकामनाएँ पूरी होती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री शास्त्रा भुजंग स्तोत्रं क्या है?
यह भगवान अय्यप्पा स्वामी की स्तुति में एक भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। 'भुजंग' शैली में रचित यह भगवान के दिव्य गुणों, रूपों और महिमाओं का वर्णन करता है।
श्री शास्त्रा भुजंग स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद शुद्ध होकर कर सकते हैं। विशेषकर शनिवार, मंडलकाल के दौरान या अय्यप्पा को समर्पित दिनों में पाठ करना अधिक शुभ होता है।
इस स्तोत्र का पाठ करने के क्या लाभ हैं?
इसे पढ़ने से मानसिक शांति, आध्यात्मिक विकास, संकटों से मुक्ति, सुरक्षा, उत्तम स्वास्थ्य और समृद्धि प्राप्त होती है। यह मनोकामना पूर्ति में भी सहायक है।
श्री शास्त्रा भुजंग स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
भगवान अय्यप्पा में श्रद्धा रखने वाला कोई भी व्यक्ति, लिंग भेद के बिना, इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से अय्यप्पा व्रत करने वाले इसे पढ़ना श्रेष्ठ मानते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
कम से कम एक बार या 3, 5, 9, 11, 108 बार पाठ किया जा सकता है। संख्या से अधिक भक्ति और एकाग्रता महत्वपूर्ण है। नियमित पाठ बेहतर परिणाम देता है।
श्री शास्त्रा भुजंग स्तोत्र का मूल क्या है?
यह प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों का एक हिस्सा है और भगवान अय्यप्पा की महिमा का बखान करने वाली दक्षिण भारतीय भक्ति परंपरा का एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है। इसका विशिष्ट रचनाकार समय के साथ स्पष्ट नहीं है।

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