श्री परशुरामाष्टाविंशतिनाम स्तोत्रं
ऋषिरुवाच |
यमाहुर्वासुदेवांशं हैहयानां कुलांतकं |
त्रिःसप्तकृत्वो य इमां चक्रे निःक्षत्रियां महीं || 1 ||
दुष्टं क्षत्रं भुवो भारमब्रह्मण्यमनीनशत् |
तस्य नामानि पुण्यानि वच्मि ते पुरुषर्षभ || 2 ||
भूभारहरणार्थाय मायामानुषविग्रहः |
जनार्दनांशसंभूतः स्थित्युत्पत्त्यप्ययेश्वरः || 3 ||
भार्गवो जामदग्न्यश्च पित्राज्ञापरिपालकः |
मातृप्राणप्रदो धीमान् क्षत्रियांतकरः प्रभुः || 4 ||
रामः परशुहस्तश्च कार्तवीर्यमदापहः |
रेणुकादुःखशोकघ्नो विशोकः शोकनाशनः || 5 ||
नवीननीरदश्यामो रक्तोत्पलविलोचनः |
घोरो दंडधरो धीरो ब्रह्मण्यो ब्राह्मणप्रियः || 6 ||
तपोधनो महेंद्रादौ न्यस्तदंडः प्रशांतधीः |
उपगीयमानचरितः सिद्धगंधर्वचारणैः || 7 ||
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखशोकभयातिगः |
इत्यष्टाविंशतिर्नाम्नामुक्ता स्तोत्रात्मिका शुभा || 8 ||
अनया प्रीयतां देवो जामदग्न्यो महेश्वरः |
नेदं स्तोत्रमशांताय नादांतायातपस्विने || 9 ||
नावेदविदुषे वाच्यमशिष्याय खलाय च |
नासूयकायानृजवे न चानिर्दिष्टकारिणे || 10 ||
इदं प्रियाय पुत्राय शिष्यायानुगताय च |
रहस्यधर्मो वक्तव्यो नान्यस्मै तु कदाचन || 11 ||
इति श्री परशुराम अष्टाविंशतिनाम स्तोत्रं |
अर्थ
श्री परशुरामाष्टाविंशतिनाम स्तोत्रं भगवान विष्णु के छठे अवतार, श्री परशुराम जी के अट्ठाईस दिव्य नामों का गुणगान करने वाला एक अत्यंत पवित्र स्तोत्र है। यह स्तोत्र ऋषि वचनों से आरंभ होता है, जो परशुराम जी के उस महान कार्य का वर्णन करते हैं जब उन्होंने लोक कल्याण हेतु दुष्ट हैहय वंश का अंत कर पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियविहीन किया था। यह हमें स्मरण कराता है कि वे पृथ्वी के भार को हरने और ब्राह्मणों के सम्मान की रक्षा के लिए जनार्दन के अंश रूप में मानव रूप में अवतरित हुए थे। दुष्ट क्षत्रिय जब पृथ्वी पर भार बन गए और ब्राह्मणों का अनादर करने लगे, तब उन्हें नष्ट करने के लिए परशुराम जी का अवतार हुआ, जिनके पवित्र नाम इस स्तोत्र में वर्णित हैं।
भगवान परशुराम केवल क्षत्रिय संहारक ही नहीं थे, बल्कि वे अपने पिता जमदग्नि ऋषि की आज्ञा का अक्षरशः पालन करने वाले एक आदर्श पुत्र भी थे। उन्होंने अपनी माता रेणुका देवी के प्राणों की रक्षा की और उन्हें पुनर्जीवित किया, जिससे उनकी ज्ञान और पितृभक्ति का प्रमाण मिलता है। उनके हाथ में धारण किया हुआ परशु (कुल्हाड़ी) दुष्टों के विनाश का प्रतीक है, जबकि उनका शांत और स्थिर स्वभाव उनकी गहन तपस्या और आत्मसंयम को दर्शाता है। उन्होंने कार्तवीर्य अर्जुन के मद का दमन किया, माता रेणुका के दुःख और शोक को दूर किया, और स्वयं भी सदा विशोक और शोकनाशक स्वरूप में स्थित रहे। वे केवल संहारक नहीं, बल्कि सृष्टि, स्थिति और लय के अधिपति, परमेश्वर के अंश हैं।
उनका दिव्य स्वरूप नवीन मेघ के समान श्याम वर्ण का है, और उनकी आँखें रक्त कमल के समान सुंदर हैं। वे दंड धारण करने वाले, धीर, ब्राह्मणों के प्रिय और धर्म के प्रति अत्यंत निष्ठावान हैं। अपनी तपस्या से समृद्ध, वे इतने शक्तिशाली हैं कि इंद्र आदि देवताओं को भी दंड दे सकते हैं। सिद्ध, गंधर्व और चारणगण सदा उनके दिव्य चरित्र का गान करते हैं। वे जन्म, मृत्यु, जरा (बुढ़ापा), व्याधि (रोग), दुःख, शोक और भय से परे हैं, और नित्य शुद्ध एवं मुक्त स्वरूप में विद्यमान हैं। ये नाम भगवान के गुणों और उनकी अनंत शक्ति को दर्शाते हैं।
यह अष्टाविंशतिनाम स्तोत्र भगवान परशुराम महेश्वर को अत्यंत प्रिय है। जो व्यक्ति इस स्तोत्र का निष्ठा और श्रद्धा के साथ पाठ करता है, उसे महान शुभ फल प्राप्त होते हैं। ऋषिगण चेतावनी देते हैं कि इसे अशांत, निष्ठाहीन, तपस्यारहित, वेद ज्ञानहीन, दुराचारी, ईर्ष्यालु और अप्रमाणिक व्यक्तियों को नहीं बताना चाहिए। इस स्तोत्र का पाठ केवल भौतिक लाभ ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष के मार्ग को भी सुगम बनाता है। इसे केवल प्रिय पुत्रों, सच्चे शिष्यों और आचार मार्ग पर चलने वाले व्यक्तियों को ही गुप्त धर्म के रूप में सिखाना चाहिए, जो इसकी पवित्रता और महत्व को बनाए रखता है।
लाभ (Benefits):
- समस्त दुःखों का निवारण: इस स्तोत्र के नियमित पाठ से जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, रोग, दुःख, शोक और भय से मुक्ति मिलती है तथा मानसिक शांति प्राप्त होती है, जिससे जीवन में स्थिरता और संतोष आता है।
- शत्रुओं पर विजय और सुरक्षा: जिस प्रकार परशुराम जी ने दुष्टों का संहार किया, उसी प्रकार यह स्तोत्र शत्रुओं और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे जीवन में निर्भयता और आत्मविश्वास बढ़ता है।
- धर्म की रक्षा और ज्ञान की प्राप्ति: यह स्तोत्र धर्म के मार्ग पर चलने वालों को प्रेरणा देता है और ज्ञान तथा विवेक में वृद्धि करता है, जिससे सही निर्णय लेने और जीवन के उद्देश्य को समझने में मदद मिलती है।
- इच्छित फल की प्राप्ति: भक्तिपूर्वक पाठ करने वाले भक्तों के सभी सद्गुण बढ़ते हैं और उनकी न्यायोचित इच्छाएं पूर्ण होती हैं। यह शुभ कार्यों में सफलता और समृद्धि लाता है।
- मोक्ष मार्ग प्रशस्त: भगवान परशुराम की कृपा से जीवन के अंतिम लक्ष्य मोक्ष की दिशा में मार्ग सुगम होता है, जिससे आध्यात्मिक उन्नति और परमात्मा के साथ एकात्मता की अनुभूति होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री परशुरामाष्टाविंशतिनाम स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री परशुरामाष्टाविंशतिनाम स्तोत्रं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का उद्भव या रचना कैसे हुई?
टिप्पणियाँ
टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...
