- ॐ अनंताय नमः
- ॐ आदि शेषा य नमः
- ॐ अगदाय नमः
- ॐ अखिलोर्वीचाय नमः
- ॐ अमित विक्रमाय नमः
- ॐ अनिमिषार्चिताय नमः
- ॐ आदि वंद्या निवृत्तिये नमः
- ॐ अशेषफणामण्णलमण्णिताय नमः
- ॐ अपात्रतहतौनुग्रहदायिने नमः
- ॐ अनमिताचाराय नमः
- ॐ अखंडैश्वर्यसंपन्नाय नमः
- ॐ अमरादिपस्तुत्याय नमः
- ॐ अघोररूपाय नमः
- ॐ व्याळव्याय नमः
- ॐ वासु कये नमः
- ॐ वर प्रदायकाय नमः
- ॐ वन चराय नमः
- ॐ वंश वर्धनाय नमः
- ॐ वासुदेवशयनाय नमः
- ॐ वटवृक्षा श्रिताय नमः
- ॐ विप्रवेषधारिणे नमः
- ॐ विनायकोदरबद्धाय नमः
- ॐ विष्णुप्रियाय नमः
- ॐ वेदस्तुत्याय नमः
- ॐ विहितधर्माय नमः
- ॐ विषाधराय नमः
- ॐ शेषाय नमः
- ॐ शत्रुसूदनाय नमः
- ॐ शंकराभरणाय नमः
- ॐ शंखपालाय नमः
- ॐ शंभुप्रियाय नमः
- ॐ षडाननाय नमः
- ॐ पंचशिर से नमः
- ॐ पाप नाशनाय नमः
- ॐ प्रमधाय नमः
- ॐ प्रचंडाय नमः
- ॐ भक्तवश्याय नमः
- ॐ भक्त रक्षकाय नमः
- ॐ बहु शिरसे नमः
- ॐ भाग्य वर्धनाय नमः
- ॐ भवभीति हराय नमः
- ॐ तक्षकाय नमः
- ॐ त्वरित गम्याय नमः
- ॐ तमोरूपाय नमः
- ॐ दर्वीकराय नमः
- ॐ धरणी धराय नमः
- ॐ कश्यपात्मजाय नमः
- ॐ काल रूपाय नमः
- ॐ युगाधि पाय नमः
- ॐ युगंधराय नमः
- ॐ युक्तायुक्ताय नमः
- ॐ युग्म शिरसे नमः
- ॐ रश्मिवंताय नमः
- ॐ रम्य गात्राय नमः
- ॐ केशव प्रियाय नमः
- ॐ विश्वंभरभायाय नमः
- ॐ आदित्य मर्धनाय नमः
- ॐ सर्व पूज्याय नमः
- ॐ सर्वा धाराय नमः
- ॐ निराशाय नमः
- ॐ निरंजनाय नमः
- ॐ ऐरावताय नमः
- ॐ शरण्याय नमः
- ॐ सर्व दायकाय नमः
- ॐ धनंजयाय नमः
- ॐ लोक त्रयाधीशाय नमः
- ॐ शिवाय नमः
- ॐ वेदवेद्याय नमः
- ॐ पूर्णाय नमः
- ॐ पुण्याय नमः
- ॐ पुण्य कीर्तये नमः
- ॐ परदेशाय नमः
- ॐ पारगाय नमः
- ॐ निष्कळाय नमः
- ॐ वरप्रदाय नमः
- ॐ कर्कोटकाय नमः
- ॐ श्रेष्टाय नमः
- ॐ शांताय नमः
- ॐ दांताय नमः
- ॐ जितक्रोधाय नमः
- ॐ जीवाय नमः
- ॐ जयदाय नमः
- ॐ जनप्रिय नमः
- ॐ विश्वरूपाय नमः
- ॐ विधि स्तुताय नमः
- ॐ वीधींद्रशिवसंस्तुताय नमः
- ॐ श्रेयः प्रदाय नमः
- ॐ प्राणदाय नमः
- ॐ अव्यक्ताय नमः
- ॐ व्यक्तरूपाय नमः
- ॐ तमोहराय नमः
- ॐ योगीशायि नमः
- ॐ कळ्याणाय नमः
- ॐ बालाय नमः
- ॐ ब्रह्मचारिणे नमः
- ॐ वटुरूपाय नमः
- ॐ रक्तांगाय नमः
- ॐ शंकरानंद कराय नमः
- ॐ विष्णु कल्पाय नमः
- ॐ गुप्ताय नमः
- ॐ गुप्ततराय नमः
- ॐ रक्तवस्त्राय नमः
- ॐ रक्त भूषाय नमः
- ॐ कद्रुवासंभूता य नमः
- ॐ आधारवीधिपधिकाय नमः
- ॐ सुषुम्नाद्वार मध्य गाय नमः
- ॐ फणिरत्नविभूषणाय नमः
- ॐ नागेंद्राय नमः
|| इति श्री नागेंद्र अष्टोत्तर शतनामावळि संपूर्णं ||
अर्थ
श्री नागेंद्र अष्टोत्तर शतनामावलि सर्पों के अधिपति और भगवान विष्णु के शयन शेषनाग को समर्पित 108 पवित्र नामों का संग्रह है। हिंदू धर्म में नागों को दिव्य शक्ति, सुरक्षा, समृद्धि और उर्वरता का प्रतीक माना जाता है। भगवान शिव के आभूषण के रूप में, भगवान विष्णु के बिस्तर के रूप में, और पाताल लोक के संरक्षक के रूप में नागेंद्र की पूजा की जाती है। यह नामावलि नाग देवता के विभिन्न रूपों, गुणों और महिमा का वर्णन करती है, जिससे भक्तों को अपार आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं।
इस नामावलि का प्रत्येक नाम नाग देवता के एक अद्वितीय गुण या रूप को प्रकट करता है। 'ॐ अनंताय नमः' के माध्यम से, अनंत और असीम शक्ति वाले नाग देवता की स्तुति की जाती है। 'ॐ आदि शेषाय नमः' सृष्टि के आरंभ से विद्यमान और भगवान विष्णु के शयन के रूप में प्रतिष्ठित महान सर्प को इंगित करता है। 'ॐ वासुकये नमः' का जाप करके समुद्र मंथन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले वासुकि को स्मरण किया जाता है। 'ॐ शंकराभरणाय नमः' शिव के आभूषण नाग को महिमामंडित करता है, जो शिव और नागेंद्र के बीच गहरे संबंध को दर्शाता है। 'ॐ विष्णुप्रियाय नमः' नाम विष्णु के प्रिय को इंगित करता है, जो आदि शेष के महत्व को उजागर करता है।
यह माना जाता है कि इस अष्टोत्तर शतनामावलि का पाठ करने से नाग देवता प्रसन्न होते हैं। इन पवित्र नामों का जाप करते समय, भक्त नागेंद्र की अपार शक्ति, सुरक्षात्मक गुणों और सृष्टि, स्थिति और लय से संबंधित उनकी भूमिका का ध्यान करते हैं। उनका अनंत रूप ब्रह्मांड की अनंतता का प्रतिनिधित्व करता है। उनका पंचशिरा रूप पांच मूल तत्वों पर उनके नियंत्रण को दर्शाता है। इस स्तोत्र के माध्यम से, भक्त अपने मन में शांति, सकारात्मक ऊर्जा और भक्ति विकसित करते हैं, जो आध्यात्मिक प्रगति में सहायक होता है।
नागेंद्र अष्टोत्तर शतनामावलि का नियमित पाठ भक्तों को शारीरिक और मानसिक शांति प्रदान करता है। इसे नाग दोष निवारण, संतान प्राप्ति, धन वृद्धि और शत्रुओं से सुरक्षा के लिए अत्यंत प्रभावी माना जाता है। नाग पूजा में प्रकृति के प्रति सम्मान और संतुलन बनाए रखने का संदेश भी निहित है। यह नामावलि भक्तों को नाग देवता का आशीर्वाद प्राप्त करने, जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने और अंततः मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ने में सहायक है।
लाभ (Benefits):
- नाग दोष निवारण: जिन लोगों की कुंडली में नाग दोष या सर्प शाप होता है, वे इस नामावलि का पाठ करके इन दोषों से मुक्ति पा सकते हैं और शुभ फल प्राप्त कर सकते हैं।
- संतान प्राप्ति: निःसंतान दंपति नागेंद्र की भक्तिपूर्वक पूजा करके इस अष्टोत्तर का पाठ करने से संतान सुख प्राप्त करते हैं।
- धन और समृद्धि: चूंकि नाग देवता धन के रक्षक माने जाते हैं, इस नामावलि का पाठ करने से आर्थिक स्थिति में सुधार होता है और समृद्धि बढ़ती है।
- सुरक्षा और निर्भयता: यह सर्प भय और अन्य खतरों से सुरक्षा प्रदान करता है। नागेंद्र अपने भक्तों को सभी प्रकार की बुरी शक्तियों और बाधाओं से बचाते हैं।
- स्वास्थ्य और दीर्घायु: उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए इस नामावलि का पाठ किया जाता है, विशेषकर त्वचा रोगों से मुक्ति पाने में सहायक है।
- मानसिक शांति: नियमित पाठ से मन को शांति, सुकून मिलता है और आध्यात्मिक प्रगति होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री नागेंद्र अष्टोत्तर शतनामावलि क्या है?
नागेंद्र अष्टोत्तर शतनामावलि का पाठ कब करना चाहिए?
इस नामावलि का पाठ करने के प्रमुख लाभ क्या हैं?
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
इस नामावलि का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री नागेंद्र अष्टोत्तर शतनामावलि का मूल क्या है?
टिप्पणियाँ
टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...
