- ॐ श्रीमत्सूत्रवतीनाथाय नमः
- ॐ श्रीविष्वक्सेनाय नमः
- ॐ चतुर्भुजाय नमः
- ॐ श्रीवासुदेवसेनान्याय नमः
- ॐ श्रीशहस्तावलंबदाय नमः
- ॐ सर्वारंभेषुसंपूज्याय नमः
- ॐ गजास्यादिपरीवृताय नमः
- ॐ सर्वदासर्वकार्येषुसर्वविघ्ननिवर्तकाय नमः
- ॐ धीरोदात्ताय नमः
- ॐ शुचये नमः
- ॐ दक्षाय नमः
- ॐ माधवाज्ञाप्रवर्तकाय नमः
- ॐ हरिसंकल्पतोविश्वसृष्टिस्थितिलयादिकृते नमः
- ॐ तर्जनीमुद्रयाविश्वनियंत्रे नमः
- ॐ नियतात्मवते नमः
- ॐ विष्णुप्रतिनिधये नमः
- ॐ श्रीमते नमः
- ॐ विष्णुमार्गानुगाय नमः
- ॐ सुधिये नमः
- ॐ शंखिने नमः
- ॐ चक्रिणे नमः
- ॐ गदिने नमः
- ॐ शार्ङ्गिणे नमः
- ॐ नानाप्रहरणायुधाय नमः
- ॐ सुरसेनानंदकारिणे नमः
- ॐ दैत्यसेनभयंकराय नमः
- ॐ अभियात्रे नमः
- ॐ प्रहर्त्रे नमः
- ॐ सेनानयविशारदाय नमः
- ॐ भूतप्रेतपिशाचादिसर्वशत्रुनिवारकाय नमः
- ॐ शौरिवीरकथालापिने नमः
- ॐ यज्ञविघ्नकरांतकाय नमः
- ॐ कटाक्षमात्रविज्ञातविष्णुचित्ताय नमः
- ॐ चतुर्गतये नमः
- ॐ सर्वलोकहितकांक्षिणे नमः
- ॐ सर्वलोकाभयप्रदाय नमः
- ॐ आजानुबाहवे नमः
- ॐ सुशिरसे नमः
- ॐ सुललाटाय नमः
- ॐ सुनासिकाय नमः
- ॐ पीनवक्षसे नमः
- ॐ विशालाक्षाय नमः
- ॐ मेघगंभीरनिस्वनाय नमः
- ॐ सिंहमध्याय नमः
- ॐ सिंहगतये नमः
- ॐ सिंहाक्षाय नमः
- ॐ सिंहविक्रमाय नमः
- ॐ किरीटकर्णिकामुक्ताहारकेयूरभूषिताय नमः
- ॐ अंगुळीमुद्रिकाभ्राजदंगुळये नमः
- ॐ स्मरसुंदराय नमः
- ॐ यज्ञोपवीतिने नमः
- ॐ सर्वोत्तरोत्तरीयाय नमः
- ॐ सुशोभनाय नमः
- ॐ पीतांबरधराय नमः
- ॐ स्रग्विणे नमः
- ॐ दिव्यगंधानुलेपनाय नमः
- ॐ रम्योर्ध्वपुंड्रतिलकाय नमः
- ॐ दयांचितदृगंचलाय नमः
- ॐ अस्त्रविद्यास्फुरन्मूर्तये नमः
- ॐ रशनाशोभिमध्यमाय नमः
- ॐ कटिबंधत्सरुन्यस्तखड्गाय नमः
- ॐ हरिनिषेविताय नमः
- ॐ रत्नमंजुलमंजीरशिंजानपदपंकजाय नमः
- ॐ मंत्रगोप्त्रे नमः
- ॐ अतिगंभीराय नमः
- ॐ दीर्घदर्शिने नमः
- ॐ प्रतापवते नमः
- ॐ सर्वज्ञाय नमः
- ॐ सर्वशक्तये नमः
- ॐ निखिलोपायकोविदाय नमः
- ॐ अतींद्राय नमः
- ॐ अप्रमत्ताय नमः
- ॐ वेत्रदंडधराय नमः
- ॐ प्रभवे नमः
- ॐ समयज्ञाय नमः
- ॐ शुभाचाराय नमः
- ॐ सुमनसे नमः
- ॐ सुमनसः प्रियाय नमः
- ॐ मंदस्मितांचितमुखाय नमः
- ॐ श्रीभूनीळाप्रियंकराय नमः
- ॐ अनंतगरुडादीनां प्रियकृते नमः
- ॐ प्रियभूषणाय नमः
- ॐ विष्णुकिंकरवर्गस्य तत्तत्कार्योपदेशकाय नमः
- ॐ लक्ष्मीनाथपदांभोजषट्पदाय नमः
- ॐ षट्पदप्रियाय नमः
- ॐ श्रीदेव्यनुग्रहप्राप्त द्वयमंत्राय नमः
- ॐ कृतांतविदे नमः
- ॐ विष्णुसेवितदिव्यस्रक् अंबरादिनिषेवित्रे नमः
- ॐ श्रीशप्रियकराय नमः
- ॐ श्रीशभुक्तशेषैकभोजनाय नमः
- ॐ सौम्यमूर्तये नमः
- ॐ प्रसन्नात्मने नमः
- ॐ करुणावरुणालयाय नमः
- ॐ गुरुपंक्तिप्रधानाय नमः
- ॐ श्रीशठकोपमुनेर्गुरवे नमः
- ॐ मंत्ररत्नानुसंधात्रे नमः
- ॐ न्यासमार्गप्रवर्तकाय नमः
- ॐ वैकुंठसूरि परिषन्निर्वाहकाय नमः
- ॐ उदारधिये नमः
- ॐ प्रसन्नजनसंसेव्याय नमः
- ॐ प्रसन्नमुखपंकजाय नमः
- ॐ साधुलोकपरित्राते नमः
- ॐ दुष्टशिक्षणतत्पराय नमः
- ॐ श्रीमन्नारायणपदशरणत्वप्रबोधकाय नमः
- ॐ श्रीवैभवख्यापयित्रे नमः
- ॐ स्ववशंवदमाधवाय नमः
- ॐ विष्णुना परमं साम्यमापन्नाय नमः
- ॐ देशिकोत्तमाय नमः
- ॐ श्रीमते विष्वक्सेनाय नमः
|| इति श्री विष्वक्सेन अष्टोत्तर शतनामावळि संपूर्णं ||
अर्थ
श्री विष्वक्सेन अष्टोत्तर शतनामावली भगवान विष्णु के प्रधान सेनापति श्री विष्वक्सेन को समर्पित 108 पवित्र नामों का संग्रह है। यह नामावली वैष्णव परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। किसी भी शुभ कार्य को आरंभ करने से पूर्व बाधाओं को दूर करने और कार्य की सफलता के लिए श्री विष्वक्सेन की पूजा की जाती है। वे भगवान विष्णु की संकल्प शक्ति के प्रतीक हैं और समस्त सृष्टि, स्थिति एवं लय के कार्यों में भगवान की आज्ञा को क्रियान्वित करने वाली प्रमुख शक्ति हैं।
इस अष्टोत्तर शतनामावली का प्रत्येक नाम विष्वक्सेन के दिव्य गुणों, अधिकारों और सामर्थ्य का वर्णन करता है। उदाहरण के लिए, 'ॐ श्रीमत्सूत्रवतीनाथाय नमः' का अर्थ है अपनी पत्नी सूत्रवती के साथ निवास करने वाले, 'ॐ श्रीविष्वक्सेनाय नमः' उनका मूल नाम दर्शाता है। 'ॐ चतुर्भुजाय नमः' का अर्थ है चार भुजाओं वाले, जो उनकी दिव्य शक्ति और क्षमता को प्रतिबिंबित करता है। 'ॐ श्रीवासुदेवसेनान्याय नमः' यह स्पष्ट करता है कि वे श्री वासुदेव (विष्णु) के सेनापति हैं। 'ॐ सर्वारंभेषुसंपूज्याय नमः' यह नाम इस बात पर जोर देता है कि किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले उनकी पूजा की जानी चाहिए, जो उनकी बाधा निवारक शक्ति का सूचक है।
'ॐ सर्वदा सर्वकार्येषु सर्वविघ्ननिवर्तकाय नमः' उनका प्रमुख गुण बताता है, अर्थात वे हमेशा सभी कार्यों में आने वाली सभी बाधाओं को दूर करने वाले हैं। 'ॐ माधवाज्ञाप्रवर्तकाय नमः' और 'ॐ हरिसंकल्पतोविश्वसृष्टिस्थितिलयादिकृते नमः' नाम यह बताते हैं कि वे भगवान माधव (विष्णु) की आज्ञाओं को क्रियान्वित करते हैं और हरि के संकल्प से विश्व की सृष्टि, स्थिति और लय के कारण हैं। यह उनके असीमित अधिकार और ब्रह्मांडीय व्यवस्था में उनकी भूमिका को उजागर करता है। 'ॐ तर्जनीमुद्रयाविश्वनियंत्रे नमः' का अर्थ है अपनी तर्जनी मुद्रा (उठी हुई उंगली) से ही विश्व को नियंत्रित करने वाले, जो उनकी प्रबल आज्ञा शक्ति को दर्शाता है।
विष्वक्सेन शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग जैसे विभिन्न आयुध धारण करने वाले हैं, जो देवताओं की सेना को आनंदित करते हैं और दैत्य सेना के लिए भयंकर हैं। वे भूत, प्रेत, पिशाच आदि अशुभ शक्तियों और सभी शत्रुओं का निवारण करने की क्षमता रखते हैं। यह नामावली उन्हें यज्ञों में बाधा डालने वालों का नाश करने वाले और भगवान विष्णु के शौर्य की कथाएँ कहने वाले के रूप में वर्णित करती है। इस नामावली का पाठ भक्तों को दिव्य सुरक्षा और मार्गदर्शन प्रदान करता है।
लाभ (Benefits):
- बाधा निवारण: किसी भी नए कार्य या शुभ समारोह को शुरू करने से पहले इस नामावली का पाठ करने से सभी बाधाएँ दूर होती हैं और कार्य सफलतापूर्वक पूर्ण होता है।
- कार्यसिद्धि और सफलता: श्री विष्वक्सेन के अनुग्रह से सभी प्रयासों में सफलता प्राप्त होती है और इच्छित लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायता मिलती है।
- शत्रु भय निवारण: भूत, प्रेत, पिशाच आदि अशुभ शक्तियों और लौकिक शत्रुओं से सुरक्षा प्राप्त होती है।
- दिव्य सुरक्षा: भगवान विष्णु के प्रधान सेनापति के आशीर्वाद से निरंतर दिव्य सुरक्षा और मार्गदर्शन प्राप्त होता है।
- आध्यात्मिक प्रगति: इस नामावली का नियमित पाठ मन को शांति, एकाग्रता और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री विष्वक्सेन अष्टोत्तर शतनामावली क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री विष्वक्सेन अष्टोत्तर शतनामावली के पाठ के क्या लाभ हैं?
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल या उत्पत्ति क्या है?
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