गो

श्री गोमात अष्टोत्तर शतनामावळि

संपादन: अद्यतन
अष्टोत्तर108 नाम
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  1. ॐ कृष्णवल्लभायै नमः
  2. ॐ कृष्णायै नमः
  3. ॐ श्री कृष्ण पारिजातायै नमः
  4. ॐ कृष्ण प्रियायै नमः
  5. ॐ कृष्ण रूपायै नमः
  6. ॐ कृष्ण प्रेम विवर्दिन्यै नमः
  7. ॐ कमनीयायै नमः
  8. ॐ कळ्यान्यै नमः
  9. ॐ कळ्य वंदितायै नमः
  10. ॐ कल्पवृक्ष स्वरूपायै नमः
  11. ॐ दिव्य कल्प समलंकृतायै नमः
  12. ॐ क्षीरार्णव संभूतायै नमः
  13. ॐ क्षीरदायै नमः
  14. ॐ क्षीर रूपिन्यै नमः
  15. ॐ नंदादिगोपविनुतायै नमः
  16. ॐ नंदिन्यै नमः
  17. ॐ नंदन प्रदायै नमः
  18. ॐ ब्रह्मादिदेवविनुतायै नमः
  19. ॐ ब्रह्म नंदविदायिन्यै नमः
  20. ॐ सर्वधर्म स्वरूपिन्यै नमः
  21. ॐ सर्वभूतावनतायै नमः
  22. ॐ सर्वदायै नमः
  23. ॐ सर्वामोददायै नमः
  24. ॐ शिश्टेष्टायै नमः
  25. ॐ शिष्टवरदायै नमः
  26. ॐ सृष्टिस्थितितिलयात्मिकायै नमः
  27. ॐ सुरभ्यै नमः
  28. ॐ सुरासुरनमस्कृतायै नमः
  29. ॐ सिद्धि प्रदायै नमः
  30. ॐ सौरभेयै नमः
  31. ॐ सिद्धविद्यायै नमः
  32. ॐ अभिष्टसिद्दिवर्षिन्यै नमः
  33. ॐ जगद्धितायै नमः
  34. ॐ ब्रह्म पुत्र्यै नमः
  35. ॐ गायत्र्यै नमः
  36. ॐ ऎकहायन्यै नमः
  37. ॐ गंधर्वादिसमाराध्यायै नमः
  38. ॐ यज्ञांगायै नमः
  39. ॐ यज्ञ फलदायै नमः
  40. ॐ यज्ञेश्यै नमः
  41. ॐ हव्यकव्य प्रदायै नमः
  42. ॐ श्रीदायै नमः
  43. ॐ स्तव्यभव्य क्रमोज्ज्वलायै नमः
  44. ॐ बुद्दिदायै नमः
  45. ॐ बुद्यै नमः
  46. ॐ धन ध्यान विवर्दिन्यै नमः
  47. ॐ यशोदायै नमः
  48. ॐ सुयशः पूर्णायै नमः
  49. ॐ यशोदानंदवर्दिन्यै नमः
  50. ॐ धर्मज्ञायै नमः
  51. ॐ धर्म विभवायै  नमः
  52. ॐ धर्मरूपतनूरुहायै नमः
  53. ॐ विष्णुसादोद्भवप्रख्यायै नमः
  54. ॐ वैष्णव्यै नमः
  55. ॐ विष्णुरूपिन्यै नमः
  56. ॐ वसिष्ठपूजितायै नमः
  57. ॐ शिष्टायै नमः
  58. ॐ शिष्टकामदुहे नमः
  59. ॐ दिलीप सेवितायै नमः
  60. ॐ दिव्यायै नमः
  61. ॐ खुरपावितविष्टपायै नमः
  62. ॐ रत्नाकरमुद्भूतायै नमः
  63. ॐ रत्नदायै नमः
  64. ॐ शक्रपूजितायै नमः
  65. ॐ पीयूषवर्षिन्यै नमः
  66. ॐ पुण्यायै नमः
  67. ॐ पुण्या पुण्य फलप्रदायै नमः
  68. ॐ पयः प्रदायै नमः
  69. ॐ परामोदायै नमः
  70. ॐ घ्रुतदायै नमः
  71. ॐ घ्रुतसंभवायै नमः
  72. ॐ कार्त वीर्यार्जुन मृत हेतवे नमः
  73. ॐ हेतुकसन्नुतायै नमः
  74. ॐ जमदग्निकृताजस्र सेवायै नमः
  75. ॐ संतुष्टमानसायै नमः
  76. ॐ रेणुकाविनुतायै नमः
  77. ॐ पादरेणुपावित भूतलायै नमः
  78. ॐ शिश्टेष्टायै नमः
  79. ॐ सवत्सायै नमः
  80. ॐ यज्ञ रूपिन्यै नमः
  81. ॐ वत्स कारातिपालितायै नमः
  82. ॐ भक्तवत्सलायै नमः
  83. ॐ व्रुषदायै नमः
  84. ॐ क्रुषिदायै  नमः
  85. ॐ हेम श्रुज्ञाग्रतलशोभनायै नमः
  86. ॐ त्र्यैलोक्य वंदितायै नमः
  87. ॐ भव्यायै नमः
  88. ॐ भावितायै नमः
  89. ॐ भवनाशिन्यै नमः
  90. ॐ भुक्ति मुक्ति प्रदायै नमः
  91. ॐ कांतायै नमः
  92. ॐ कांताजन शुभंकर्यै नमः
  93. ॐ सुरूपायै नमः
  94. ॐ बहुरूपायै नमः
  95. ॐ अच्चायै नमः
  96. ॐ कर्भुरायै नमः
  97. ॐ कपिलायै नमः
  98. ॐ अमलायै नमः
  99. ॐ साधुशीतलायै  नमः
  100. ॐ साधु रूपायै नमः
  101. ॐ साधु बृंदान सेवितायै नमः
  102. ॐ सर्ववेदमयै नमः
  103. ॐ सर्वदेव रूपायै नमः
  104. ॐ प्रभावत्यै नमः
  105. ॐ रुद्र मात्रे नमः
  106. ॐ आदित्य सहोदर्यै नमः
  107. ॐ महा मायायै नमः
  108. ॐ महा देवादि वंदितायै नमः

|| इति श्री गोमात अष्टोत्तर शतनामावळि समाप्तं ||

अर्थ

श्री गोमात अष्टोत्तर शतनामावळि हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र मानी जाने वाली गौमाता को समर्पित 108 दिव्य नामों का स्तोत्र है। गौमाता को केवल एक पशु नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की सृष्टि, स्थिति और लय की अधिष्ठात्री देवी का साक्षात स्वरूप माना जाता है। यह नामावली गौमाता के विभिन्न गुणों, महिमाओं और आशीर्वादों का वर्णन करती है, उन्हें सभी देवताओं का निवास स्थान बताती है। प्रत्येक नाम गौमाता की दिव्य शक्ति और संपूर्ण विश्व के लिए उनके योगदान पर प्रकाश डालता है। यह कामधेनु या सुरभि देवी का स्वरूप है, जो भक्तों की सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाले कल्पवृक्ष के समान हैं।

इस अष्टोत्तर शतनामावली के प्रारंभिक नाम 'ॐ कृष्णवल्लभायै नमः' और 'ॐ कृष्णप्रियायै नमः' गौमाता को श्रीकृष्ण की अत्यंत प्रिय बताते हैं। स्वयं श्रीकृष्ण ने एक ग्वाले के रूप में गायों की पूजा की और गोसेवा को महत्व दिया। गौमाता को कृष्ण के प्रेम को बढ़ाने वाली और उनके ही स्वरूप में विद्यमान बताया गया है। 'ॐ कमनीयायै नमः', 'ॐ कल्यान्यै नमः' नाम उनके सौंदर्य और मंगलकारी स्वभाव को दर्शाते हैं, जबकि 'ॐ कल्पवृक्ष स्वरूपायै नमः' बताता है कि वे भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूरा करने की शक्ति रखती हैं। 'क्षीरार्णव संभूतायै' का अर्थ है कि वे क्षीरसागर मंथन से उत्पन्न हुई हैं, जो उनके दिव्य और पवित्र मूल को दर्शाता है। वे क्षीरदायिनी (दूध देने वाली) और क्षीररूपिणी (दूध के रूप में विद्यमान) के रूप में जीवों का पोषण करती हैं।

यह नामावली गौमाता को केवल मनुष्यों द्वारा ही नहीं, बल्कि देवताओं द्वारा भी पूजित बताती है। 'ॐ नंदादिगोपविनुतायै नमः' का अर्थ है कि वे नंद और अन्य ग्वालों द्वारा पूजित हैं, जबकि 'ॐ ब्रह्मादिदेवविनुतायै नमः' बताता है कि वे ब्रह्मादि देवताओं द्वारा भी प्रशंसित हैं। वे नंदिनी, अर्थात आनंद देने वाली और ब्रह्मानंद प्रदान करने वाली हैं। 'ॐ सर्वधर्म स्वरूपिण्यै नमः' नाम यह घोषित करता है कि गौमाता सभी धर्मों का सार हैं। वे सभी जीवों की आश्रयदाता, सर्वभूतावनता हैं। 'ॐ सृष्टिस्थितितिलयात्मिकायै नमः' नाम इस बात पर जोर देता है कि वे सृष्टि, स्थिति और लय की शक्तियों को समाहित करने वाली परम शक्ति हैं। वे सुरभि (दिव्य गाय, सुगंधमयी) और सौरभेयी (सुरभि की पुत्री) हैं, जो देवताओं और असुरों द्वारा भी पूजित हैं।

गोमात अष्टोत्तर शतनामावली का पाठ भक्तों को अपार आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्रदान करता है। वे 'ॐ सिद्धि प्रदायै नमः' (सिद्धियाँ प्रदान करने वाली) और 'ॐ अभिष्टसिद्धिवर्षिण्यै नमः' (इष्ट सिद्धियों की वर्षा करने वाली) हैं, इसलिए इस स्तोत्र का पाठ भक्तों के सभी नेक उद्देश्यों को पूरा करता है। वे जगद्धितायै, अर्थात जगत का कल्याण करने वाली हैं। इस नामावली का भक्तिपूर्वक पाठ करने से गौमाता की कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन में समृद्धि, शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त की जा सकती है। गोसेवा के महत्व को प्रतिपादित करने वाला यह स्तोत्र हमारी संस्कृति में गाय को दिए गए उच्च स्थान को और मजबूत करता है।

लाभ (Benefits):

  • स्वास्थ्य और धन: गौमाता का दूध, घी, गोमूत्र, गोबर आदि पंचगव्य स्वास्थ्य के लिए उत्तम हैं। इस स्तोत्र का पाठ आर्थिक समृद्धि और धन-धान्य की वृद्धि लाता है।
  • मानसिक शांति और सुख: गौमाता के आशीर्वाद से मन को शांति, सुकून और आनंद मिलता है। नकारात्मक ऊर्जाएं दूर होती हैं और सकारात्मक वातावरण बनता है।
  • संतान प्राप्ति: 'नंदन प्रदायै' नाम के अनुसार, इस स्तोत्र का नियमित पाठ संतान सुख प्रदान करता है और बच्चों के उज्ज्वल भविष्य में सहायक होता है।
  • अभीष्ट सिद्धि: गौमाता 'कल्पवृक्ष स्वरूपायै' और 'अभीष्ट सिद्धिवर्षिण्यै' हैं, इसलिए भक्तों के सभी नेक उद्देश्य और मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
  • धार्मिक और आध्यात्मिक प्रगति: गौमाता 'सर्वधर्म स्वरूपिण्यै' हैं, इसलिए इस स्तोत्र का पाठ धार्मिक और आध्यात्मिक जीवन में प्रगति प्राप्त करने में मदद करता है, धर्मनिष्ठा बढ़ाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री गोमात अष्टोत्तर शतनामावळि क्या है?
यह गौमाता को समर्पित 108 पवित्र नामों का स्तोत्र है। हिंदू धर्म में गौमाता को सभी देवताओं का स्वरूप, कल्पवृक्ष और मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली कामधेनु के रूप में पूजा जाता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह या शाम को स्नान करके शुद्ध मन से करना चाहिए। गोपूजा करते समय या गोशाला जाते समय इसका पाठ करना विशेष फलदायी होता है।
श्री गोमात अष्टोत्तर शतनामावळि के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र के पाठ से स्वास्थ्य, धन, संतान सुख, मानसिक शांति और अभीष्ट सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। यह धार्मिक और आध्यात्मिक प्रगति में भी सहायक है।
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
गौमाता के भक्त, श्रीकृष्ण के अनुयायी, समृद्धि, स्वास्थ्य और शांति की कामना करने वाले, और गोसेवा को महत्व देने वाला कोई भी व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है।
इस नामावली का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
भक्त अपनी श्रद्धा और उपलब्ध समय के अनुसार 1, 3, 5, 11 या 108 बार पाठ कर सकते हैं। नियमितता अधिक फलदायी होती है।
इस स्तोत्र की उत्पत्ति कहाँ से हुई है?
श्री गोमात अष्टोत्तर शतनामावळि प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों और पुराणों से प्रेरित है। गौमाता की दिव्य महिमा का वर्णन करने वाला यह स्तोत्र वैदिक परंपरा का हिस्सा है।

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