मा

श्री मातंगी स्तोत्रं

संपादन: अद्यतन
स्तोत्र
0 व्यूज़

श्री मातंगी स्तोत्रं

ईश्वर उवाच |
आराध्य मातश्चरणांबुजे ते
ब्रह्मादयो विस्तृतकीर्तिमापुः |
अन्ये परं वा विभवं मुनींद्राः
परां श्रियं भक्तिभरेण चान्ये || 1

नमामि देवीं नवचंद्रमौळे-
-र्मातंगिनीं चंद्रकळावतंसां |
आम्नायप्राप्तिप्रतिपादितार्थं
प्रबोधयंतीं प्रियमादरेण || 2 ||

विनम्रदेवासुरमौळिरत्नै-
-र्नीराजितं ते चरणारविंदं |
भजंति ये देवि महीपतीनां
व्रजंति ते संपदमादरेण || 3 ||

कृतार्थयंतीं पदवीं पदाभ्या-
-मास्फालयंतीं कृतवल्लकीं तां |
मातंगिनीं सद्धृदयां धिनोमि
लीलांशुकां शुद्धनितंबबिंबां || 4 ||

तालीदळेनार्पितकर्णभूषां
माध्वीमदोद्घूर्णितनेत्रपद्मां |
घनस्तनीं शंभुवधूं नमामि
तटिल्लताकांतिमनर्घ्यभूषां || 5 ||

चिरेण लक्ष्यं नवलोमराज्या
स्मरामि भक्त्या जगतामधीशे |
वलित्रयाढ्यं तम मध्यमंब
नीलोत्पलांशुश्रियमावहंत्याः || 6 ||

कांत्या कटाक्षैः कमलाकराणां
कदंबमालांचितकेशपाशं |
मातंगकन्यां हृदि भावयामि
ध्यायेयमारक्तकपोलबिंबं || 7 ||

बिंबाधरन्यस्तललामवश्य-
-मालीललीलालकमायताक्षं |
मंदस्मितं ते वदनं महेशि
स्तुत्यानया शंकरधर्मपत्नीं || 8 ||

मातंगिनीं वागधिदेवतां तां
स्तुवंति ये भक्तियुता मनुष्याः |
परां श्रियं नित्यमुपाश्रयंति
परत्र कैलासतले वसंति || 9 ||

उद्यद्भानुमरीचिवीचिविलसद्वासो वसानां परां
गौरीं संगतिपानकर्परकरामानंदकंदोद्भवां |
गुंजाहारचलद्विहारहृदयामापीनतुंगस्तनीं
मत्तस्मेरमुखीं नमामि सुमुखीं शावासनासेदुषीं || 10 ||

इति श्रीरुद्रयामले मातंगी स्तोत्रं |

अर्थ

श्री मातंगी स्तोत्रम रुद्रयामल तंत्र से उद्भूत एक अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र स्तोत्र है। यह दशमहाविद्याओं में से नौवीं महाविद्या, देवी मातंगी को समर्पित है। इस स्तोत्र में स्वयं भगवान शिव मातंगी देवी की महिमा का गुणगान करते हुए, उनके पूजन से प्राप्त होने वाले फलों का विस्तृत वर्णन करते हैं। मातंगी देवी वाणी, संगीत, कला और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी हैं, जो अपने भक्तों को समस्त सिद्धियाँ और ऐश्वर्य प्रदान करती हैं।

स्तोत्र के प्रथम श्लोक में, भगवान शिव कहते हैं कि जो भक्त देवी मातंगी के चरण कमलों की आराधना करते हैं, वे ब्रह्मादि देवताओं से भी अधिक कीर्ति प्राप्त करते हैं। मुनींद्र भी उनकी भक्ति से परम ऐश्वर्य और ज्ञान को प्राप्त करते हैं। दूसरे श्लोक में, मातंगी देवी को अर्धचंद्र से सुशोभित मस्तक वाली और वेदों के गूढ़ अर्थों को भक्तों को प्रेमपूर्वक समझाने वाली वाग्देवी के रूप में वर्णित किया गया है। वे ज्ञान की प्रकटीकरण हैं।

तीसरे श्लोक में कहा गया है कि देवता और असुर भी अपने रत्नजड़ित मुकुटों से उनके चरणारविंदों की पूजा करते हैं। राजागण उनकी भक्ति से अपार धन-संपत्ति और साम्राज्य प्राप्त करते हैं। चौथे श्लोक में, वीणा बजाकर भक्तों के हृदयों को आनंदित करने वाली, लावण्यमयी और शुद्ध सौंदर्य की देवी मातंगी को नमन किया गया है। वे कला और संगीत का साकार रूप हैं।

पाँचवाँ श्लोक उनके दिव्य स्वरूप का वर्णन करता है: तालीदल के कर्णभूषणों से सुशोभित, मधुर मद से उन्मत्त करुणापूर्ण कमल जैसे नेत्रों वाली, भगवान शंभु की प्रिय वधू, बिजली की चमक के समान कांतिमयी और अनमोल आभूषणों से सज्जित। छठे श्लोक में, नीलोत्पल के समान कांति वाली, तीन सुंदर वलयों से सुशोभित कटिप्रदेश वाली उन देवी का भक्तिपूर्वक स्मरण किया जाता है। सातवें श्लोक में, कदंब पुष्पों की मालाओं से अलंकृत केशराशि वाली, कमल जैसे नेत्रों से करुणा बरसाने वाली मातंग कन्या का हृदय में ध्यान किया जाता है। आठवाँ श्लोक लाल बिंब जैसे अधरों वाली, सुंदर मुस्कान और मधुर मुखकांति वाली महेश्वरी, भगवान शंकर की पत्नी की स्तुति करता है।

नौवें श्लोक में कहा गया है कि जो भक्त मातंगी देवी की भक्तिपूर्वक स्तुति करते हैं, वे परम श्रेय को प्राप्त करते हैं और परलोक में कैलाश लोक में निवास करने का अवसर पाते हैं। दसवाँ श्लोक उदयमान सूर्य की किरणों के समान वस्त्र धारण करने वाली, उन्नत स्तनों वाली, प्रसन्न मुख वाली, शव के आसन पर विराजमान, मधुर मुस्कान से शोभायमान सुमुखी देवी को नमन करता है। यह स्तोत्र मातंगी देवी के सौंदर्य, शक्ति, करुणा और ज्ञानप्रदायिनी स्वरूप का गहन वर्णन करता है।

प्रयोजन (Benefits):

  • वाक् सिद्धि और ज्ञान: मातंगी देवी वाणी की अधिष्ठात्री हैं, अतः इस स्तोत्र के पाठ से वाक्पटुता, ज्ञान और रचनात्मक कलाओं में प्रवीणता प्राप्त होती है।
  • कीर्ति और सम्मान: देवी के चरणों की आराधना करने वाले भक्तों को ब्रह्मादि देवताओं से भी अधिक कीर्ति और समाज में सम्मान प्राप्त होता है।
  • धन और समृद्धि: राजा और सामान्य भक्त देवी की कृपा से अपार धन, ऐश्वर्य और समृद्धि प्राप्त करते हैं।
  • मानसिक शांति और आनंद: मातंगी देवी के स्मरण से मन को शांति, आनंद और समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
  • आध्यात्मिक उन्नति: इस स्तोत्र के नियमित पाठ से आध्यात्मिक ज्ञान, परम श्रेय और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री मातंगी स्तोत्रं क्या है?
श्री मातंगी स्तोत्रं दशमहाविद्याओं में से एक, देवी मातंगी को समर्पित एक शक्तिशाली स्तोत्र है। यह रुद्रयामल तंत्र से लिया गया है, जिसमें स्वयं भगवान शिव देवी की महिमा का वर्णन करते हैं।
मातंगी स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद शुद्ध मन से करना चाहिए। विशेष रूप से शुक्रवार, पूर्णिमा या मातंगी देवी को समर्पित त्योहारों पर इसका पाठ अधिक फलदायी होता है। देवी की छवि या मूर्ति के सामने बैठकर एकाग्रता से पाठ करें।
इस स्तोत्र के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ करने से वाक् सिद्धि, ज्ञान, कलाओं में निपुणता, धन, कीर्ति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और मानसिक शांति मिलती है।
कौन इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है?
जो लोग वाक् शक्ति, ज्ञान, कला, संगीत में प्रगति चाहते हैं, छात्र, कलाकार, संगीतकार और सार्वजनिक वक्ता इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं। मातंगी देवी के भक्त भी अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए इसका पाठ करते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
सामान्यतः, इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन कम से कम एक बार या 11, 21, 108 बार किया जा सकता है। पूर्ण परिणामों के लिए, 40 दिनों तक नियमित रूप से संकल्पपूर्वक पाठ करना उत्तम माना जाता है।
मातंगी स्तोत्र का मूल स्रोत क्या है?
श्री मातंगी स्तोत्रं प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथ रुद्रयामल तंत्र से उत्पन्न हुआ है। यह तंत्र दशमहाविद्याओं की पूजा और उनकी महिमा का विस्तृत वर्णन करता है।

टिप्पणियाँ

टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...