गजेंद्रशार्दूल मृगेंद्रवाहनं
मुनींद्रसंसेवित पादपंकजं ।
देवीद्वयेनावृत पार्श्वयुग्मं
शास्तारमाद्यं सततं नमामि ॥1॥
हरिहरभवमेकं सच्चिदानंदरूपं
भवभयहरपादं भावनागम्यमूर्तिं ।
सकलभुवनहेतुं सत्यधर्मानुकूलं
श्रितजनकुलपालं धर्मशास्तारमीडे ॥2॥
हरिहरसुतमीशं वीरवर्यं सुरेशं
कलियुगभवभीतिध्वंसलीलावतारं ।
जयविजयलक्ष्मी सुसंसृताजानुबाहुं
मलयगिरिनिवासं धर्मशास्तारमीडे ॥3॥
परशिवमयमीड्यं भूतनाथं मुनींद्रं
करधृतविकचाब्जं ब्रह्मपंचस्वरूपं ।
मणिमयसुकिरीटं मल्लिकापुष्पहारं
वरवितरणशीलं धर्मशास्तारमीडे ॥4॥
हरिहरमयमाय बिंबमादित्यकोटि
त्विषममलमुखेंदुं सत्यसंधं वरेण्यं ।
उपनिषदविभाव्यं ओंइतिध्यानगम्यं
मुनिजनहृदि चिंत्यं धर्मशास्तारमीडे ॥5॥
कनकमय दुकूलं चंदनार्द्रावसिक्तं
सरसमृदुलहासं ब्राह्मणानंदकारं ।
मधुरसमयपाणिं मारजीवातुलीलं
सकलदुरितनाशं धर्मशास्तारमीडे ॥6॥
मुनिजनगणसेव्यं मुक्तिसाम्राज्यमूलं
विदितसकलतत्वज्ञानमंत्रोपदेशं ।
इहपरफलहेतुं तारकं ब्रह्मसंज्ञं
षडरिमलविनाशं धर्मशास्तारमीडे ॥7॥
मधुरसफलमुख्यैः पायसैर्भक्ष्यजालैः
दधिघृत परिपूर्णैरन्नदानैस्संतुष्टं ।
निजपदनमितानां नित्यवात्सल्यभावं
हृदयकमलमध्ये धर्मशास्तारमीडे ॥8॥
भवगुणजनितानां भोगमोक्षाय नित्यं
हरिहरभवदेवस्याष्टकं सन्निधौ यः ।
पठति सकलभोगान् मुक्तिसाम्राज्यभाग्ये
भुविदिवि? च तस्मै नित्यतुष्टो ददाति ॥9॥
इति श्रीमहाशास्ताष्टकं संपूर्णं ।
अर्थ
श्री महाशास्त अष्टकं भगवान अय्यप्पा, जिन्हें धर्मशास्त के नाम से भी जाना जाता है, की स्तुति में रचा गया एक अत्यंत शक्तिशाली और भक्तिमय स्तोत्र है। यह आठ श्लोकों का संग्रह भगवान महाशास्त के दिव्य गुणों, उनके विभिन्न रूपों, वाहनों और उनकी असीम करुणा का विस्तृत वर्णन करता है। यह स्तोत्र भक्तों को भगवान की निकटता का अनुभव कराता है और उन्हें आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।
भगवान महाशास्त हरि और हर (विष्णु और शिव) के संयुक्त स्वरूप हैं, जो सच्चिदानंद के प्रतीक हैं। वे संसार के भय को दूर करने वाले, सत्य और धर्म के पोषक तथा भक्तों के रक्षक हैं। कलियुग में भक्तों को भय और दुखों से मुक्त करने तथा धर्म की स्थापना के लिए उनका अवतार हुआ है। इस अष्टक का पाठ करने से भक्त सांसारिक मोह और भय से मुक्त होकर आंतरिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करते हैं। यह भगवान की अनंत शक्ति और करुणा का प्रतीक है।
पहला श्लोक भगवान शास्त को गज, शार्दूल (बाघ) और मृगेन्द्र (सिंह) जैसे शक्तिशाली वाहनों पर आरूढ़ बताता है, जिनके चरण कमल मुनियों द्वारा पूजे जाते हैं और जो जुड़वां देवियों से घिरे रहते हैं। यह उनकी शक्ति और सर्वव्यापकता को दर्शाता है। दूसरा श्लोक उन्हें हरिहर का एक ही स्वरूप, सच्चिदानंदमय, भवभय को हरने वाला और सत्यधर्म का पालन करने वाला बताता है। तीसरा श्लोक उन्हें हरिहर के पुत्र, वीरों में श्रेष्ठ, देवताओं के स्वामी और कलियुग के भय को नष्ट करने वाले लीलावतारी के रूप में वर्णित करता है, जो मलय पर्वत पर निवास करते हैं। चौथा श्लोक उन्हें परमशिव स्वरूप, भूतों के नाथ, हाथ में खिले हुए कमल धारण किए हुए, मणिमय मुकुट और मल्लिका पुष्पमाला से सुशोभित, वर देने वाले के रूप में चित्रित करता है।
पांचवां श्लोक शास्त को हरिहरमय, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी, निर्मल चंद्रमा के समान मुख वाले, सत्यनिष्ठ और ओंकार ध्यान द्वारा प्राप्त होने वाले के रूप में वर्णित करता है, जिनका मुनियों के हृदय में चिंतन किया जाता है। छठा श्लोक उन्हें सुनहरे वस्त्र धारण किए हुए, चंदन की सुगंध से सुवासित, मंद मुस्कान से ब्राह्मणों को आनंदित करने वाले और सुख प्रदान करने वाले करुणासागर के रूप में स्तुति करता है। सातवां श्लोक उन्हें मुनियों द्वारा सेवित, मुक्ति साम्राज्य के मूल, तत्वज्ञान मंत्रों का उपदेश देने वाले, इहलोक और परलोक के फल प्रदान करने वाले तथा छह अरिषड्वर्गों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर) का नाश करने वाले तारकब्रह्म स्वरूप के रूप में पूजता है। आठवां श्लोक उन्हें पायस, घृतान्न और दही जैसे नैवेद्य से प्रसन्न होने वाले, भक्तों के प्रति नित्य वात्सल्य भाव रखने वाले और हृदय कमल में निवास करने वाले धर्मशास्त के रूप में स्मरण करता है।
कुल मिलाकर, यह अष्टक भक्तों को भगवान शास्त की दिव्य लीलाओं और उनकी असीम करुणा का स्मरण कराता है। यह विश्वास दिलाता है कि उनकी शरण में जाने से सभी दुख दूर होते हैं और जीवन में शांति, समृद्धि तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस स्तोत्र का नियमित पाठ भक्तों को मानसिक शांति और भगवान की निकटता प्रदान करता है।
लाभ (Benefits):
- भय निवारण: भवभय हरने वाले भगवान शास्त की स्तुति करने से सांसारिक भय, चिंताएं और मानसिक अशांति दूर होती है। भगवान भक्तों को साहस और अभय प्रदान करते हैं।
- धर्म की रक्षा: सत्यधर्म के अनुकूल भगवान की कृपा से धर्म के मार्ग पर चलने की शक्ति मिलती है और अधर्म से सुरक्षा प्राप्त होती है। यह न्याय और सत्य के पथ पर चलने की प्रेरणा देता है।
- स्वास्थ्य और समृद्धि: भगवान के आशीर्वाद से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है, तथा जीवन में सुख-समृद्धि, शांति और संतोष आता है। इहलोक के सभी सुख प्राप्त होते हैं।
- मोक्ष की प्राप्ति: मुक्ति साम्राज्य के मूल भगवान शास्त की आराधना करने से अरिषड्वर्गों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर) का नाश होता है, आध्यात्मिक उन्नति होती है और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- इच्छित फल की प्राप्ति: श्री महाशास्त अष्टकं का भक्तिपूर्वक पाठ करने और भगवान का स्मरण करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायता मिलती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री महाशास्त अष्टकं क्या है?
श्री महाशास्त अष्टकं का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री महाशास्त अष्टकं का पाठ करने से क्या लाभ होते हैं?
श्री महाशास्त अष्टकं का पाठ कौन कर सकता है?
श्री महाशास्त अष्टकं का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री महाशास्त अष्टकं की उत्पत्ति क्या है?
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