श्रीगणेशाय नमः ।
अथ महाशास्त्रनुग्रहकवचं प्रारभ्यते ॥
श्रीदेव्युवाच
भगवन् देवदेवेश सर्वज्ञ त्रिपुरांतक ।
प्राप्ते कलियुगे घोरे महाभूतैः समावृते ॥1॥
महाव्याधिमहाव्याळघोरराजैः समावृते ।
दुःस्वप्नघोरसंतापैः दुर्विनीतैः समावृते ॥2॥
स्वधर्मविरते मार्गे प्रवृत्ते हृदि सर्वदा ।
तेषां सिद्धिं च मुक्तिं च त्वं मे ब्रूहि वृषध्वज ॥3॥
ईश्वर इवाच
शृणु देवि महाभागे सर्वकल्याणकारणे ।
महाशास्तुश्च देवेशि कवचं पुण्यवर्धनं ॥4॥
अग्निस्तंभजलस्तंभसेनास्तंभविधायकं ।
महाभूतप्रशमनं महाव्याधिनिवारणं ॥5॥
महाज्ञानप्रदं पुण्यं विशेषात्कलितापहं ।
सर्वरक्षाकरं दिव्यमायुरारोग्यवर्धनं ॥6॥
किमतो बहुनोक्तेन यं यं कामयते द्विजः ।
तं तमाप्नोत्यसंदेहो महाशास्तुः प्रसादतः ॥7॥
कवचस्य ऋषिर्ब्रह्मा गायत्रीश्छंद उच्यते ।
देवता श्रीमहाशास्ता देवो हरिहरात्मजः ॥8॥
षडंगमाचरेद्भक्त्या मात्रया जातियुक्तया ।
ध्यानमस्य प्रवक्ष्यामि शृणुष्वावहिता प्रिये ॥9॥
अस्य श्रीमहाशास्तुः कवचस्तोत्रमहामंत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः ।
गायत्रीः छंदः । महाशास्ता देवता ।
(ह्रां)प्रां बीजं । (ह्रीं)प्रीं शक्तिः । (ह्रूं)प्रूं कीलकं
श्रीमहाशास्तुः प्रसादसिद्धर्थे जपे विनियोगः ।
(ह्रां)प्रां इत्यादि षडंगन्यासः ॥
अथ ध्यानं ।
तेजोमंडलमध्यगं त्रिनयनं दिव्यांबरालंकृतं
देवं पुष्पशरेक्षुकार्मुकलसन्माणिक्यपात्राभयं ।
बिभ्राणं करपंकजे मदगजस्कंधाधिरूढं विभुं
शास्तारं शरणं व्रजामि सततं त्रैलोक्यसम्मोहनं ॥
(लमित्यादि पंचोपचारपूजा ।)
महाशास्ता शिरः पातु भालं हरिहरात्मजः ।
कामरूपी दृशौ पातु सर्वज्ञो मे श्रुती सदा ॥1॥
घ्राणं पातु कृपाध्यक्षो मुखं गौरीप्रियः सदा ।
वेदाध्यायी च मे जिह्वां पातु मे चिबुकं गुरुः ॥2॥
कंठं पातु विशुद्धात्मा स्कंधौ पातु सुरार्चितः ।
बाहू पातु विरूपाक्षः करौ तु कमलाप्रियः ॥3॥
भूताधिपो मे हृदयं मध्यं पातु महाबलः ।
नाभिं पातु महावीरः कमलाक्षोऽवतात्कटिं ॥4॥
अपानं पातु विश्वात्मा गुह्यं गुह्यार्थवित्तमः ।
(समीपं पातु विश्वेशो गुह्यं गुह्यार्थवित्सदा)
ऊरू पातु गजारूढो वज्रधारी च जानुनी ॥5॥
जंघे पाशांकुशधरः पादौ पातु महामतिः ।
सर्वांगं पातु मे नित्यं महामायाविशारदः ॥6॥
इतीदं कवचं पुण्यं सर्वाघौघनिकृंतनं ।
महाव्याधिप्रशमनं महापातकनाशनं ॥7॥
ज्ञानवैराग्यदं दिव्यमणिमादिविभूषितं ।
आयुरारोग्यजननं महावश्यकरं परं ॥8॥
यं यं कामयते कामं तं तं प्राप्नोत्यसंशयः ।
त्रिसंध्यं यः पठेद्विद्वान् स याति परमां गतिं ॥9॥
इति श्रीगुह्यरत्नचिंतामणौ श्रीमहाशास्त्रनुग्रहकवचं संपूर्णं ।
अर्थ
देवी परमेश्वर से पूछती हैं, "हे देवों के देव, सर्वज्ञ, त्रिपुरान्तक! इस भयानक कलियुग में, जो महाभूतों (बीमारियों, पापों, कष्टों) से घिरा है, भक्त कैसे सुरक्षित रहेंगे?" वह कलियुग का वर्णन करती हैं कि यह भयानक बीमारियों, विषैले सर्पों, दुष्ट राजाओं, बुरे सपनों और दुराचारियों से भरा है। लोग अपने धर्म मार्ग से विमुख हो गए हैं और सदैव अधर्म में प्रवृत्त हैं। ऐसे समय में, उन्हें सिद्धि और मुक्ति कैसे प्राप्त होगी, यह मुझे बताएं।
देवी की प्रार्थना सुनकर, भगवान शिव उत्तर देते हैं, "हे देवी, महाभागे, सभी कल्याणों का कारण! सुनो। श्री महाशास्ता का अनुग्रह कवच अत्यंत पुण्यवर्धक और दिव्य सुरक्षा का सर्वोच्च स्रोत है।" यह कवच केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि साक्षात् भगवान की रक्षा शक्ति से ओतप्रोत है।
यह दिव्य कवच अग्निस्तंभ, जलस्तंभ और सेनास्तंभ करने की शक्ति रखता है, अर्थात अग्नि, जल और शत्रु सेनाओं के भय से रक्षा करता है। यह पंचमहाभूतों को शांत करने में सक्षम है और बड़े रोगों का निवारण करता है। यह महाज्ञान प्रदान करता है, पापों को नष्ट करता है और कलियुग के तापों को दूर करता है। यह सर्व-रक्षक है, दिव्य है और आयु तथा आरोग्य को बढ़ाता है। जो कोई भी इसे भक्ति और श्रद्धा के साथ जपता है, उसे श्री महाशास्ता की कृपा से अपनी सभी मनोकामनाएं निःसंदेह प्राप्त होती हैं।
इस अनुग्रह कवच के ऋषि ब्रह्मा हैं, इसका छंद गायत्री है, और देवता हरिहर के पुत्र श्री महाशास्ता हैं। कवच पाठ से पहले, तेजोमय मंडल के मध्य में विराजमान, त्रिनेत्रधारी, हरिहर के संयुक्त रूप में, पुष्पबाण, वज्र, पाश और अंकुश धारण किए हुए, मदमस्त गज पर आरूढ़ श्री महाशास्ता का ध्यान करना चाहिए। यह ध्यान मन को शुद्ध करता है और भगवान के साथ संबंध स्थापित करता है।
कवच का मुख्य भाग शरीर के विभिन्न अंगों की रक्षा के लिए श्री महाशास्ता के विभिन्न रूपों से प्रार्थना करता है। हरिहरसुत सिर की रक्षा करें, कामरूपी नेत्रों की, सर्वज्ञ कानों की, और गौरीप्रिय मुख की रक्षा करें। भूताधिप हृदय की, कमलाक्ष नाभि की, और महावीर कटि (कमर) की रक्षा करें। गजारूढ़ ऊरुओं (जांघों) की, पाशांकुशधारी पैरों की रक्षा करें। महामायाविशारद संपूर्ण शरीर की सदा रक्षा करें, ऐसी प्रार्थना की जाती है। इस प्रकार, भक्त के संपूर्ण शरीर को दिव्य सुरक्षा प्राप्त होती है।
इस कवच का भक्तिपूर्वक पाठ करने से सभी पाप, रोग और महान कष्ट दूर हो जाते हैं। यह ज्ञान, वैराग्य, आयु, आरोग्य, धन और संतान प्रदान कर भक्तों को इहलोक और परलोक दोनों में सुख प्रदान करता है।
लाभ (Benefits):
- कलियुग के कष्टों से मुक्ति: इस कवच का पाठ कलियुग में आने वाली भयंकर बीमारियों, पापों और दुःखों से भक्तों की रक्षा करता है, उन्हें शांति और सुरक्षा प्रदान करता है।
- शत्रु, अग्नि, जल के भय से सुरक्षा: महाशास्ता के अनुग्रह से अग्नि, जल और शत्रु सेनाओं जैसी बाहरी आपदाओं से पूर्ण सुरक्षा प्राप्त होती है।
- स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्राप्ति: यह बड़े रोगों का निवारण करता है और उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करता है। साथ ही, भक्तों की आयु में वृद्धि कर उन्हें दीर्घायु प्रदान करता है।
- ज्ञान, वैराग्य और आध्यात्मिक उन्नति: कवच का पाठ अज्ञान को दूर कर सत्य का बोध कराता है। यह भौतिक आसक्तियों से विरक्ति और आध्यात्मिक ज्ञान व वैराग्य को विकसित करने में सहायक है।
- सभी मनोकामनाओं की पूर्ति: जो भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ इस कवच का पाठ करते हैं, श्री महाशास्ता की कृपा से उनकी सभी न्यायसंगत मनोकामनाएं निश्चित रूप से पूर्ण होती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री महाशास्त अनुग्रह कवचम् क्या है?
इस कवच का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री महाशास्त अनुग्रह कवचम् के पाठ के क्या लाभ हैं?
इस कवच का पाठ कौन कर सकता है?
इस कवच का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री महाशास्त अनुग्रह कवचम् का उद्गम क्या है?
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