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श्री कृष्ण स्तोत्रं (इंद्र कृतं)

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स्तोत्रश्री कृष्ण
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श्री कृष्ण स्तोत्रं (इंद्र कृतं)

अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनं |
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनंतकं || 1 ||

भक्तध्यानाय सेवायै नानारूपधरं वरं |
शुक्लरक्तपीतश्यामं युगानुक्रमणेन च || 2 ||

शुक्लतेजः स्वरूपं च सत्ये सत्यस्वरूपिणं |
त्रेतायां कुंकुमाकारं ज्वलंतं ब्रह्मतेजसा || 3 ||

द्वापरे पीतवर्णं च शोभितं पीतवाससा |
कृष्णवर्णं कलौ कृष्णं परिपूर्णतमं प्रभुं || 4 ||

नवधाराधरोत्कृष्टश्यामसुंदरविग्रहं |
नंदैकनंदनं वंदे यशोदानंदनं प्रभुं || 5 ||

गोपिकाचेतनहरं राधाप्राणाधिकं परं |
विनोदमुरळीशब्दं कुर्वंतं कौतुकेन च || 6 ||

रूपेणाप्रतिमेनैव रत्नभूषणभूषितं |
कंदर्पकोटिसौंदर्यं बिभ्रतं शांतमीश्वरं || 7 ||

क्रीडंतं राधया सार्धं बृंदारण्ये च कुत्रचित् |
कुत्रचिन्निर्जनेऽरण्ये राधावक्षः स्थलस्थितं || 8 ||

जलक्रीडां प्रकुर्वंतं राधया सह कुत्रचित् |
राधिकाकबरीभारं कुर्वंतं कुत्रचिद्वने || 9 ||

कुत्रचिद्राधिकापादे दत्तवंतमलक्तकं |
राधाचर्चिततांबूलं गृह्णंतं कुत्रचिन्मुदा || 10 ||

पश्यंतं कुत्रचिद्राधां पश्यंतीं वक्रचक्षुषा |
दत्तवंतं च राधायै कृत्वा मालां च कुत्रचित् || 11 ||

कुत्रचिद्राधया सार्धं गच्छंतं रासमंडलं |
राधादत्तां गळे मालां धृतवंतं च कुत्रचित् || 12 ||

सार्धं गोपालिकाभिश्च विहरंतं च कुत्रचित् |
राधां गृहीत्वा गच्छंतं विहाय तां च कुत्रचित् || 13 ||

विप्रपत्नीदत्तमन्नं भुक्तवंतं च कुत्रचित् |
भुक्तवंतं ताळफलं बालकैः सह कुत्रचित् || 14 ||

वस्त्रं गोपालिकानां च हरंतं कुत्रचिन्मुदा |
गवां गणं व्याहरंतं कुत्रचिद्बालकैः सह || 15 ||

काळीयमूर्ध्नि पादाब्जं दत्तवंतं च कुत्रचित् |
विनोदमुरळीशब्दं कुर्वंतं कुत्रचिन्मुदा || 16 ||

गायंतं रम्यसंगीतं कुत्रचिद्बालकैः सह |
स्तुत्वा शक्रः स्तवेंद्रेण प्रणनाम हरिं भिया || 17 ||

पुरा दत्तेन गुरुणा रणे वृत्रासुरेण च |
कृष्णेन दत्तं कृपया ब्रह्मणे च तपस्यते || 18 ||

एकादशाक्षरो मंत्रः कवचं सर्वलक्षणं |
दत्तमेतत् कुमाराय पुष्करे ब्रह्मणा पुरा || 19 ||

कुमारोऽंगिरसे दत्तं गुरवेऽंगिरसां मुने |
इदमिंद्रकृतं स्तोत्रं नित्यं भक्त्या च यः पठेत् || 20 ||

स हि प्राप्य दृढां भक्तिमंते दास्यं लभेद्ध्रुवं |
जन्ममृत्युजराव्याधिशोकेभ्यो मुच्यते नरः |
न हि पश्यति स्वप्नेऽपि यमदूतं यमालयं || 21 ||

इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे श्रीकृष्णजन्मखंडे एकविंशोऽध्याये इंद्रकृत श्री कृष्ण स्तोत्रं |

अर्थ

श्री कृष्ण स्तोत्रं (इंद्र कृतं) ब्रह्मवैवर्त पुराण के कृष्ण जन्म खंड में इंद्रदेव द्वारा भगवान श्री कृष्ण की स्तुति में गाया गया एक अत्यंत पवित्र स्तोत्र है। इस स्तोत्र में इंद्र भगवान कृष्ण को परमब्रह्म स्वरूप, ज्योतिर्मय, सनातन, गुणातीत, निराकार, स्वेच्छामय और अनंत के रूप में वर्णित करते हैं। वे बताते हैं कि भक्तों के ध्यान और सेवा के लिए, भगवान युगों के अनुसार विभिन्न रूप धारण करते हैं – शुक्ल (श्वेत), रक्त (लाल), पीत (पीला) और श्याम (काला)। सत्ययुग में वे शुक्ल वर्ण में सत्यस्वरूप हैं; त्रेतायुग में कुमकुम वर्ण में ब्रह्मतेज से प्रकाशित होते हैं। द्वापरयुग में वे पीतवर्ण में पीताम्बरधारी के रूप में शोभायमान होते हैं, और कलियुग में श्यामवर्ण के परिपूर्ण कृष्ण स्वरूप में प्रकट होते हैं।

स्तोत्र नंद के पुत्र, यशोदा के आनंददायक, नव रंध्रों के आधार, श्यामसुंदर विग्रह वाले कृष्ण को वंदन करता है। यह गोपिकाओं के चित्त को हरने वाले, राधा के प्राणों से भी अधिक प्रिय, और अपनी मुरली की ध्वनि से लीलापूर्वक हँसने वाले श्रीकृष्ण को नमन करता है। इंद्रदेव करोड़ों कामदेवों के सौंदर्य को मात देने वाले, रत्नभूषणों से सुशोभित, अनुपम सौंदर्य से युक्त और शांत स्वरूप वाले ईश्वर को प्रणाम करते हैं।

इंद्र भगवान कृष्ण की विभिन्न लीलाओं का स्मरण करते हैं। वे राधा के साथ वृंदावन में रासलीला, जलक्रीड़ा और मधुर लीलाएं करते हुए कृष्ण का वर्णन करते हैं। राधा के चरणों में आलता लगाने वाले, तांबूल ग्रहण करने वाले, मालाओं का आदान-प्रदान करने वाले, और अपनी मुरली की ध्वनि से भक्तों को मंत्रमुग्ध करने वाले कृष्ण को नमस्कार करते हैं। कालिया नाग को नृत्य द्वारा शांत करने वाले, गोपबालकों के साथ क्रीड़ा करने वाले, और रमणीय गीतों से भक्तों को प्रसन्न करने वाले भगवान की इंद्र इस स्तोत्र के माध्यम से महिमा गाते हैं।

यह स्तोत्र प्राचीन काल में ब्रह्मादेव द्वारा अपने पुत्र को और अंगिरस मुनि को प्रदान किया गया एक पवित्र कवच भी माना जाता है। जो व्यक्ति इस इंद्रकृत स्तोत्र का नित्य भक्तिपूर्वक पाठ करता है, उसे सुदृढ़ भक्ति और दास्यभाव प्राप्त होता है। वह जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था, रोग और शोक के चक्र से मुक्त हो जाता है, और यमदूतों को स्वप्न में भी नहीं देखता। यह स्तोत्र कृष्ण की सभी लीलाओं और महिमाओं का सार है, और भक्तिपूर्वक इसका जप करने वालों को परम शांति और मोक्ष प्रदान करता है।

लाभ (Benefits):

  • दृढ़ भक्ति और दास्यभाव: इस स्तोत्र का नित्य पाठ करने से भगवान श्री कृष्ण के प्रति अटूट भक्ति और दास्यभाव विकसित होता है, जिससे भक्त परमात्मा के करीब आता है।
  • जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति: स्तोत्र का नियमित पाठ जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे, बीमारी और दुखों के चक्र से मुक्ति प्रदान करता है, जिससे भक्त मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होता है।
  • यमभय का निवारण: इस पवित्र स्तोत्र का पाठ करने वालों को यमदूतों का भय नहीं रहता, उन्हें स्वप्न में भी यमदर्शन नहीं होता, जिससे भक्त को अभय प्राप्त होता है।
  • मानसिक शांति और आनंद: श्री कृष्ण की विभिन्न लीलाओं और दिव्य स्वरूपों का वर्णन करने वाला यह स्तोत्र मन को असीम शांति, आनंद और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।
  • इच्छित फलों की प्राप्ति: भगवान कृष्ण की कृपा को आकर्षित करने वाला यह स्तोत्र भक्तों की सद्भावनापूर्ण इच्छाओं को पूर्ण करने में सहायक होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री कृष्ण स्तोत्रं (इंद्र कृतं) क्या है?
यह ब्रह्मवैवर्त पुराण में इंद्रदेव द्वारा भगवान श्री कृष्ण की स्तुति में गाया गया एक दिव्य स्तोत्र है। इसमें कृष्ण के परमब्रह्म स्वरूप, युगावतारों और राधा-कृष्ण की लीलाओं का वर्णन किया गया है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद, शुद्ध मन और भक्तिभाव से करना चाहिए। भगवान कृष्ण की प्रतिमा या चित्र के सामने बैठकर पाठ करना अधिक फलदायी होता है।
श्री कृष्ण स्तोत्रं (इंद्र कृतं) के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इसके पाठ से दृढ़ भक्ति, दास्यभाव, जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि-शोक से मुक्ति और यमभय का निवारण जैसे लाभ प्राप्त होते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
भगवान श्री कृष्ण में आस्था रखने वाला कोई भी व्यक्ति, लिंग या आयु के भेद के बिना इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से आध्यात्मिक उन्नति चाहने वाले और कठिनाइयों से मुक्ति पाने वाले इसे पढ़ सकते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
सामान्यतः, प्रतिदिन कम से कम एक बार पूरे स्तोत्र का पाठ करना उत्तम है। अधिक लाभ के लिए 3, 5, 11 या 108 बार भी पाठ किया जा सकता है, लेकिन नियमितता महत्वपूर्ण है।
इस स्तोत्र की उत्पत्ति कहाँ से हुई है?
यह स्तोत्र ब्रह्मवैवर्त पुराण के कृष्ण जन्म खंड से लिया गया है। ऐसा कहा जाता है कि इसे ब्रह्मादेव ने अपने पुत्र को और फिर अंगिरस मुनि को प्रदान किया था।

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