- ॐ कृष्णाय नमः
- ॐ कृतिने नमः
- ॐ कृपाशीताय नमः
- ॐ कृतज्ञाय नमः
- ॐ कृष्णमूर्थजाय नमः
- ॐ कृष्णाव्यसनसंहर्त्रे नमः
- ॐ कृष्णांबुधरविग्रहाय नमः
- ॐ कृष्णाब्जवदनाय नमः
- ॐ कृष्णाप्रकृत्यंगाय नमः
- ॐ कृताखिलाय नमः
- ॐ कृतगीताय नमः
- ॐ कृष्णगीताय नमः
- ॐ कृष्णगोपीजनांबराय नमः
- ॐ कृष्णस्वराय नमः
- ॐ कृत्तजिष्णुगर्वाय नमः
- ॐ कृष्णोत्तरस्रजाय नमः
- ॐ कृतलोकेशसम्मोहाय नमः
- ॐ कृतदावाग्निपारणाय नमः
- ॐ कृष्टोलूखलनिर्भिन्न यमलार्जुनभूरुहाय नमः
- ॐ कृतगोवर्धनच्छत्राय नमः
- ॐ कृताहिफणतांडवाय नमः
- ॐ कृत्ताघाय नमः
- ॐ कृत्तभक्ताघाय नमः
- ॐ कृतदैवतमंगलाय नमः
- ॐ कृतांतसदनानीतगुरुपुत्राय नमः
- ॐ कृतस्मिताय नमः
- ॐ कृतांतभगिनीवारि विहारिणे नमः
- ॐ कृतवित्प्रियाय नमः
- ॐ कृतगोवत्ससंत्त्राणाय नमः
- ॐ कृतकेतरसौहृदाय नमः
- ॐ कृत्तभूमिभराय नमः
- ॐ कृष्णबंधवे नमः
- ॐ कृष्णमहागुरवे नमः
- ॐ कृष्णप्रियाय नमः
- ॐ कृष्णसखाय नमः
- ॐ कृष्णेशाय नमः
- ॐ कृष्णसारधये नमः
- ॐ कृतरासोत्सवाय नमः
- ॐ कृष्णगोपीजनमनोधनाय नमः
- ॐ कृष्णगोपीकटाक्षालि पूजितेंदीवराकृतये नमः
- ॐ कृष्णप्रतापाय नमः
- ॐ कृष्णाप्ताय नमः
- ॐ कृष्णमानाभिरक्षणाय नमः
- ॐ कृपीटधिकृतावासाय नमः
- ॐ कृपीटरुहलोचनाय नमः
- ॐ कृशानुवदनाधीशाय नमः
- ॐ कृशानुहुतखांडवाय नमः
- ॐ कृत्तिवासस्स्मयाहर्त्रे नमः
- ॐ कृत्तिवासोज्ज्वरार्दनाय नमः
- ॐ कृत्तबाणभुजाबृंदाय नमः
- ॐ कृतबृंदारकावनाय नमः
- ॐ कृतादियुगसंस्थाकृते नमः
- ॐ कृतधर्मपालनाय नमः
- ॐ कृतचित्तजनप्राणाय नमः
- ॐ कृतकंदर्पविग्रहाय नमः
- ॐ कृशोदरीबृंदबंदीमोचकाय नमः
- ॐ कृपणावनाय नमः
- ॐ कृत्स्नविदे नमः
- ॐ कृत्स्नदुर्ञ्जेयमहिम्ने नमः
- ॐ कृत्स्नपालकाय नमः
- ॐ कृत्स्नांतराय नमः
- ॐ कृत्स्नयंत्रे नमः
- ॐ कृत्स्नहने नमः
- ॐ कृत्स्नधारकाय नमः
- ॐ कृत्स्नाकृतये नमः
- ॐ कृत्स्नदृष्टये नमः
- ॐ कृच्छलभ्याय नमः
- ॐ कृताद्भुताय नमः
- ॐ कृत्स्नप्रियाय नमः
- ॐ कृत्स्नहीनाय नमः
- ॐ कृत्स्नात्मने नमः
- ॐ कृत्स्नभासकाय नमः
- ॐ कृत्तिकानंतरोद्भूताय नमः
- ॐ कृत्तरुक्मिकचव्रजाय नमः
- ॐ कृपात्तरुक्मिणीकांताय नमः
- ॐ कृतधर्मक्रियावनाय नमः
- ॐ कृष्णपक्षाष्टमीचंद्रफालभागमनोहराय नमः
- ॐ कृत्यसाक्षिणे नमः
- ॐ कृत्यपतये नमः
- ॐ कृत्स्नक्रतुफलप्रदाय नमः
- ॐ कृष्णवर्मलसच्चक्राय नमः
- ॐ कृपीटजविभूषणाय नमः
- ॐ कृताख्यारूपनिर्वाहाय नमः
- ॐ कृतार्धीकृतबाडबाय नमः
- ॐ कृतवन्यस्रजाभूषाय नमः
- ॐ कृपीटजलसत्काराय नमः
- ॐ कृपीटजालयावक्षसे नमः
- ॐ कृतपादार्चनांबुजाय नमः
- ॐ कृतिमेतरसौंदर्याय नमः
- ॐ कृतिमाशयदुर्लभाय नमः
- ॐ कृततार्क्ष्यध्वजारधाय नमः
- ॐ कृतमोक्षाभिधेयकाय नमः
- ॐ कृतीकृतद्वापरकाय नमः
- ॐ कृतसौभाग्यभूतलाय नमः
- ॐ कृतलोकत्रयानंदाय नमः
- ॐ कृतीकृतकलिप्रधाय नमः
- ॐ कृतोत्तरागर्भरक्षाय नमः
- ॐ कृतधिये नमः
- ॐ कृतलक्षणाय नमः
- ॐ कृतत्रिजगतीमोहाय नमः
- ॐ कृतदेवद्रुमाहृतये नमः
- ॐ कृत्स्नानंदाय नमः
- ॐ कृत्स्नदुःखदूराय नमः
- ॐ कृत्स्नविलक्षणाय नमः
- ॐ कृत्स्नांशाय नमः
- ॐ कृत्स्नजीवांशाय नमः
- ॐ कृत्स्नसत्ताय नमः
- ॐ कृतिप्रियाय नमः
|| इति कृकारादि श्रीकृष्णाष्टोत्तरशतनामावलिः समाप्तं ||
अर्थ
कृकारादि श्री कृष्ण अष्टोत्तर शतनामावली भगवान श्री कृष्ण के 108 पवित्र नामों का एक दिव्य स्तोत्र है। 'कृकारादि' का अर्थ है 'कृ' अक्षर से प्रारंभ होने वाले नाम। यह नामावली श्री कृष्ण के विभिन्न रूपों, लीलाओं, गुणों और महिमा का स्तवन करती है। भक्त इस नामावली का पाठ भगवान के साथ गहरा संबंध स्थापित करने, उनकी कृपा प्राप्त करने और आध्यात्मिक उन्नति के लिए करते हैं। यह भगवान के दिव्य गुणों का स्मरण करने और उनकी उपस्थिति को अपने हृदय में अनुभव करने का एक श्रेष्ठ मार्ग है।
प्रत्येक नाम भगवान कृष्ण की अनंत महिमा के एक पहलू को उजागर करता है। इन नामों का पाठ करने से मन शांत होता है, नकारात्मक विचार दूर होते हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। पुराणों के अनुसार, कलियुग में भगवान के नाम का स्मरण मोक्ष का सबसे सरल मार्ग है। यह अष्टोत्तर शतनामावली भक्तों को कृष्ण की बाल लीलाओं, पराक्रमों, प्रेम और ज्ञान के रूपों से जोड़ती है, जिससे भक्ति भावना और मजबूत होती है। यह केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि भगवान की शक्तिशाली कंपनें इसमें समाहित हैं, जो हमारी आत्मा को शुद्ध करती हैं और भगवान के साथ एकत्व का अनुभव करने में सहायता करती हैं।
इस नामावली में श्री कृष्ण के अनेक अद्भुत गुणों का वर्णन किया गया है। उदाहरण के लिए, "ॐ कृष्णाय नमः" भगवान के सर्व-आकर्षक श्याम वर्ण और उनके दिव्य सौंदर्य को दर्शाता है। "ॐ कृपाशीताय नमः" का अर्थ है कृपा से शीतल, जो अपने भक्तों पर सदैव करुणा बरसाते हैं। "ॐ कृष्णाव्यसनसंहर्त्रे नमः" यह नाम भक्तों के सभी कष्टों और दुखों को दूर करने की कृष्ण की शक्ति को उजागर करता है। "ॐ कृष्णाम्बुधरविग्रहाय नमः" उन्हें काले बादल के समान सुंदर शरीर वाले, वर्षा लाने वाले बादल की तरह भक्तों को आनंद देने वाले के रूप में वर्णित करता है। "ॐ कृतगोवर्धनच्छत्राय नमः" गोवर्धन पर्वत को छाते के रूप में उठाकर गोकुलवासियों की रक्षा करने वाले कृष्ण के महान पराक्रम की याद दिलाता है। "ॐ कृत्तभक्ताघाय नमः" भक्तों के सभी पापों को नष्ट करने वाले उनके करुणामय स्वरूप को व्यक्त करता है। प्रत्येक नाम कृष्ण के एक विशिष्ट गुण और लीला को स्मरण करने के लिए प्रेरित करता है।
इस नामावली का पाठ भगवान कृष्ण की विभिन्न लीलाओं को - यमलार्जुन वृक्षों को तोड़ना, कालिया मर्दन, गोवर्धन पूजा, गुरुपुत्र को यमलोक से वापस लाना - आदि को स्मरण करने में सहायक है। यह भगवान की दिव्यता, पराक्रम, करुणा और प्रेम को मन में स्थापित करता है। इन नामों का जप करने से भक्त कृष्ण के साथ गहरा संबंध विकसित करते हैं और अंततः मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होते हैं। यह केवल नाम-पाठ नहीं है, बल्कि भगवान की दिव्य उपस्थिति का अनुभव करने की एक अनुभूति है।
लाभ (Benefits):
- मानसिक शांति और संतोष: इस नामावली का नियमित पाठ करने से मन शांत होता है, तनाव और चिंताएं कम होती हैं, जिससे आंतरिक शांति और संतोष प्राप्त होता है।
- पाप मुक्ति और सुरक्षा: श्री कृष्ण के पवित्र नामों का स्मरण करने से जाने-अनजाने में किए गए पापों का निवारण होता है और सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा मिलती है।
- आध्यात्मिक उन्नति और भक्ति में वृद्धि: भगवान के गुणों का स्मरण करने से भक्ति भावना बढ़ती है, आध्यात्मिक ज्ञान विकसित होता है और भगवान के साथ गहरा संबंध स्थापित होता है।
- इच्छित फल की प्राप्ति: भक्ति और एकाग्रता के साथ इस नामावली का पाठ करने से भक्तों की सद्-इच्छाएं पूरी होती हैं और जीवन में सफलता प्राप्त होती है।
- सर्व आकर्षण और प्रेम: कृष्ण के नाम सर्व-आकर्षक हैं, इसलिए इनका पाठ करने वालों में भी सद्गुण विकसित होते हैं और वे सभी के प्रेम और सम्मान के पात्र बनते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कृकारादि श्री कृष्ण अष्टोत्तर शतनामावली क्या है?
कृकारादि श्री कृष्ण अष्टोत्तर शतनामावली का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस नामावली का पाठ करने के प्रमुख लाभ क्या हैं?
कृकारादि श्री कृष्ण अष्टोत्तर शतनामावली का पाठ कौन कर सकता है?
इस नामावली का पाठ कितनी बार करना उत्तम है?
इस नामावली का मूल या पृष्ठभूमि क्या है?
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