श्री

श्री हरिहरपुत्र अष्टोत्तर शतनामावलिः 2

संपादन: अद्यतन
अष्टोत्तर
0 व्यूज़

ध्यनं -
द्विहस्तं पद्मसंस्थं च शुक्लयज्ञोपवीतिनं  ।
पूर्णाया पुष्कलादेव्या युक्तं शास्तारमाश्रये ॥

1।    ॐ शास्त्रे नमः
    2।    ॐ हरिहरोद्भूताय नमः
    3।    ॐ हरिहरपुत्राय नमः
    4।    ॐ उन्मत्तगजवाहनाय नमः
    5।    ॐ पुत्रलाभकराय नमः
    6।    ॐ मदनोद्भवाय नमः
    7।    ॐ शास्त्रार्थाय नमः
    8।    ॐ चैतन्याय नमः
    9।    ॐ चेतोद्भवाय नमः
    10।    ॐ उत्तराय नमः
    11।    ॐ रूपपंचकाय नमः
    12।    ॐ स्थानपंचकाय नमः
    13।    ॐ घृणये नमः
    14।    ॐ वीराय नमः
    15।    ॐ समुद्रवर्णाय नमः
    16।    ॐ कालाय नमः
    17।    ॐ परिग्रहाय नमः
    18।    ॐ अमृताय नमः
    19।    ॐ ब्रह्मरूपिणे नमः
    20।    ॐ विष्णुरूपिणे नमः
    21।    ॐ रुद्ररूपिणे नमः
    22।    ॐ वीररुद्राय नमः
    23।    ॐ प्रभवे नमः
    24।    ॐ स्त्रीरूपिणे नमः
    25।    ॐ खड्गधारिणे नमः
    26।    ॐ मातंगिने नमः
    27।    ॐ मोहनाय नमः
    28।    ॐ महामतये नमः
    29।    ॐ कामितदाय नमः
    30।    ॐ दिद्दक्षाय नमः
    31।    ॐ गरलाशनाय नमः
    32।    ॐ जातस्थाय नमः
    33।    ॐ महाकोटये नमः
    34।    ॐ मेधाविने नमः
    35।    ॐ द्विनेत्राय नमः
    36।    ॐ द्विभुजाय नमः
    37।    ॐ भूषिताय नमः
    38।    ॐ श्यामलाय नमः
    39।    ॐ यक्षाय नमः
    40।    ॐ नागयज्ञोपवीतधृते नमः
    41।    ॐ रक्तांबरधराय नमः
    42।    ॐ कुंडलोज्ज्वलाय नमः
    43।    ॐ सद्योजाताय नमः
    44।    ॐ सर्वसिद्धिकराय नमः
    45।    ॐ पाणिदेवाय नमः
    46।    ॐ पीतरक्ताय नमः
    47।    ॐ सम्यङ्नुताय नमः
    48।    ॐ सर्वाभरणसंयुक्ताय नमः
    49।    ॐ शक्तिपार्श्वाय नमः
    50।    ॐ विद्वेषाय नमः
    51।    ॐ मदनाय नमः
    52।    ॐ आर्याय नमः
    53।    ॐ कन्यासुताय नमः
    54।    ॐ मानिने नमः
    55।    ॐ विकृताय नमः
    56।    ॐ अमृताय नमः
    57।    ॐ विक्रमाय नमः
    58।    ॐ वीराय नमः
    59।    ॐ दाक्षिणात्याय नमः
    60।    ॐ हस्तीशाय नमः
    61।    ॐ चक्रेशाय नमः
    62।    ॐ दंडधारणाय नमः
    63।    ॐ मथनेशाय नमः
    64।    ॐ मंगळदाय नमः
    65।    ॐ पल्लवेशाय नमः
    66।    ॐ अस्त्रेशाय नमः
    67।    ॐ कुंचिताय नमः
    68।    ॐ व्यापकाय नमः
    69।    ॐ भूतपालाय नमः
    70।    ॐ बृहत्कुक्षये नमः
    71।    ॐ नीलांगाय नमः
    72।    ॐ कविभूषिताय नमः
    73।    ॐ धृतबाणाय नमः
    74।    ॐ चापधराय नमः
    75।    ॐ शक्त्यानंदितमूर्तिमते नमः
    76।    ॐ भूलोकाय नमः
    77।    ॐ यौवनाय नमः
    78।    ॐ भीमाय नमः
    79।    ॐ तुंगभंगाय नमः
    80।    ॐ कुंतलाय नमः
    81।    ॐ सारस्वताय नमः
    82।    ॐ योगपट्टाय नमः
    83।    ॐ बद्धपद्मासनाय नमः
    84।    ॐ साम्ने नमः
    85।    ॐ ईश्वराय नमः
    86।    ॐ छागावृताय नमः
    87।    ॐ श्वानावृताय नमः
    88।    ॐ कुक्कुटावृताय नमः
    89।    ॐ मेषावृताय नमः
    90।    ॐ पीतरक्ताय नमः
    91।    ॐ उत्पलाभाय नमः
    92।    ॐ धर्मिणे नमः
    93।    ॐ पद्मालयाय नमः
    94।    ॐ क्षीबाय नमः
    95।    ॐ भोगिने नमः
    96।    ॐ योगिने नमः
    97।    ॐ करालभूतास्त्राय नमः
    98।    ॐ भूतलीलाधारिणे नमः
    99।    ॐ भेतालसंवृताय नमः
    100।    ॐ आवृतप्रमथाय नमः
    101।    ॐ जटामकुटधारिणे नमः
    102।    ॐ रुंडमालाधराय नमः
    103।    ॐ भूताय नमः
    104।    ॐ भूतांडाय नमः
    105।    ॐ हुंकारभूताय नमः
    106।    ॐ कालरात्राय नमः
    107।    ॐ चामुंडाय नमः
    108।    ॐ पूर्णापुष्कलावल्लभाय नमः

इति श्रीहरिहरपुत्र अष्टोत्तर शतनामावलिः समाप्ता ॥
 

अर्थ

श्री हरिहरपुत्र अष्टोत्तर शतनामावलि 2 भगवान अयप्पा स्वामी को समर्पित 108 दिव्य नामों का एक पवित्र संग्रह है। यह नामावलि भगवान शिव और भगवान विष्णु के दिव्य पुत्र, श्री हरिहरपुत्र की अनंत महिमा, अद्भुत लीलाओं और भक्तों के प्रति उनकी अपार करुणा का वर्णन करती है। प्रत्येक नाम स्वामी के विभिन्न गुणों, शक्तियों और दिव्य स्वरूप को प्रकट करता है, जो भक्तों को आंतरिक शांति, आध्यात्मिक उत्थान और लौकिक व पारलौकिक लाभ प्रदान करने में सक्षम है।

इस नामावलि में प्रत्येक नाम भगवान अयप्पा के धर्म रक्षक और योगीश्वर स्वरूप को उजागर करता है। हरिहरपुत्र जगत के कर्ता, पालक और संहारक हैं। वे भक्तों के कष्टों को दूर करते हैं और उन्हें मोक्ष प्रदान करते हैं। यह नामावलि शास्ता के पराक्रम, ज्ञान, शांति, करुणा और दिव्य योग स्थिति का वर्णन करती है। उदाहरण के लिए, 'ॐ शास्त्रे नमः' ज्ञान और अनुशासन के देवता को दर्शाता है, जबकि 'ॐ हरिहरोद्भूताय नमः' उनके अद्वितीय दिव्य जन्म का स्मरण कराता है। 'ॐ उन्मत्तगजवाहनाय नमः' उनके गजवाहन और 'ॐ पुत्रलाभकराय नमः' संतान प्रदान करने वाले स्वरूप को इंगित करता है।

इस अष्टोत्तर शतनामावलि का निरंतर पाठ भक्तों के मन में भक्ति और श्रद्धा को गहराई से स्थापित करता है। यह भौतिक और आध्यात्मिक जीवन में संतुलन प्राप्त करने में सहायता करता है, क्योंकि अयप्पा स्वामी स्वयं हरि और हर दोनों की शक्तियों का संगम हैं। यह नामावलि हमारे भीतर की नकारात्मक शक्तियों को नष्ट कर सकारात्मकता और साहस भरती है। अयप्पा स्वामी की दिव्य शक्ति भक्तों को जीवन की चुनौतियों का सामना करने और धर्म के मार्ग पर चलने के लिए मार्गदर्शन करती है।

संक्षेप में, श्री हरिहरपुत्र अष्टोत्तर शतनामावलि 2 भगवान अयप्पा स्वामी के 108 दिव्य नामों की स्तुति करने वाली एक पवित्र नामावलि है। यह हरिहर स्वरूप वाले धर्मशास्ता की स्तुति करती है। इन नामों का जाप करने से भक्त का हृदय पवित्र होता है और उसे शांति, धर्म तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह अयप्पा स्वामी का आशीर्वाद प्राप्त करने का एक अत्यंत प्रभावी माध्यम है।

लाभ (Benefits):

  • पापों का नाश: इस नामावलि का भक्तिपूर्वक पाठ करने से जाने-अनजाने में किए गए पापों का नाश होता है और मन शुद्ध होता है।
  • साहस और आत्मविश्वास: अयप्पा स्वामी के पराक्रम की स्तुति करने वाले ये नाम भक्तों को किसी भी कठिन परिस्थिति में साहस और आत्मविश्वास प्रदान करते हैं।
  • ऐश्वर्य और समृद्धि: स्वामी की कृपा से भक्तों को धन, समृद्धि और जीवन में सफलता प्राप्त होती है।
  • मानसिक शांति: इन दिव्य नामों का जाप करने से मन को अपार शांति और सुकून मिलता है, तनाव और चिंताएं दूर होती हैं।
  • आध्यात्मिक बल: हरिहरपुत्र के नाम स्मरण से आध्यात्मिक प्रगति होती है, भक्ति में स्थिरता आती है और मोक्ष मार्ग प्रशस्त होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री हरिहरपुत्र अष्टोत्तर शतनामावलि 2 क्या है?
यह भगवान अयप्पा स्वामी को समर्पित 108 दिव्य नामों का एक पवित्र संग्रह है। यह नामावलि स्वामी के शिव-विष्णु स्वरूप, धर्मरक्षक गुणों और योगीश्वर महिमाओं का वर्णन करती है।
इस नामावलि का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस नामावलि का पाठ प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद या शाम को दीपक जलाने के बाद किया जा सकता है। शुद्ध मन, एकाग्रता और भक्ति से पाठ करना उत्तम होता है। सबरीमाला तीर्थयात्री इसे नियमित रूप से पढ़ते हैं।
श्री हरिहरपुत्र अष्टोत्तर शतनामावलि 2 के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस नामावलि का पाठ करने से पापों का नाश होता है, साहस, ऐश्वर्य, मानसिक शांति और आध्यात्मिक बल प्राप्त होता है। यह भक्ति में स्थिरता और मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करती है।
इस नामावलि का पाठ कौन कर सकता है?
भगवान अयप्पा स्वामी के भक्त, विशेष रूप से सबरीमाला के तीर्थयात्री, धार्मिक मार्ग पर चलने की इच्छा रखने वाले और मानसिक शांति व आध्यात्मिक उत्थान चाहने वाले कोई भी व्यक्ति इसका पाठ कर सकता है। लिंग भेद के बिना सभी इसका पाठ कर सकते हैं।
इस नामावलि का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
सामान्यतः, एक दिन में कम से कम एक बार पूरी नामावलि का पाठ करना उत्तम होता है। विशेष अवसरों पर या अधिक फल के लिए 3, 5, 11 या 108 बार भी पाठ किया जा सकता है। संख्या से अधिक भक्ति और एकाग्रता महत्वपूर्ण है।
श्री हरिहरपुत्र अष्टोत्तर शतनामावलि 2 की उत्पत्ति कहाँ से हुई है?
यह नामावलि प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों और अयप्पा स्वामी से संबंधित पुराणों में वर्णित विभिन्न नामों से संकलित की गई है। यह धर्मशास्ता स्तुति का एक हिस्सा है, जिसे भक्तों की सुविधा के लिए एकत्र किया गया है।

टिप्पणियाँ

टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...