श्री

श्री हरिहरपुत्र अष्टोत्तरशतनामावलिः

संपादन: अद्यतन
अष्टोत्तर
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 श्री हरिहरपुत्र अष्टोत्तरशतनामावली

अस्य श्री हरिहरपुत्राष्टोत्तरशतनामावल्यस्य ।
ब्रह्मा ऋषिः । अनुष्टुप् छंदः । श्री हरिहरपुत्रो देवता ।
ह्रीं बीजं । श्रीं शक्तिः । क्लीं कीलकं ।
श्री हरिहरपुत्र प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ॥

ह्रीं इत्यादिभिः षडंगन्यासः ॥

ध्यानं -
त्रिगुणितमणिपद्मं वज्रमाणिक्यदंडं
   सितसुमशरपाशमिक्षुकोदंडकांडं
घृतमधुपात्रं बिभृतं हस्तपद्मैः
   हरिहरसुतमीडे चक्रमंत्रात्ममूर्तिं ॥

आश्याम-कोमल-विशालतनुं विचित्र-
   वासोदधानमरुणोत्पल-दामहस्तं ।
उत्तुंगरत्न-मकुटं कुटिलाग्रकेशं
   शास्तारमिष्टवरदं प्रणतोऽस्ति नित्यं ॥

1।    ॐ महाशास्त्रे नमः
2।    ॐ विश्वशास्त्रे नमः
3।    ॐ लोकशास्त्रे नमः
4।    ॐ धर्मशास्त्रे नमः
5।    ॐ वेदशास्त्रे नमः
6।    ॐ कालशास्त्रे नमः
7।    ॐ गजाधिपाय नमः
8।    ॐ गजारूढाय नमः
9।    ॐ गणाध्यक्षाय नमः
10।    ॐ व्याघ्रारूढाय नमः
11।    ॐ महाद्युतये नमः
12।    ॐ गोप्त्रे नमः
13।    ॐ गीर्वाणसंसेव्याय नमः
14।    ॐ गतातंकाय नमः
15।    ॐ गणाग्रण्ये नमः
16।    ॐ ऋग्वेदरूपाय नमः
17।    ॐ नक्षत्राय नमः
18।    ॐ चंद्ररूपाय नमः
19।    ॐ बलाहकाय नमः
20।    ॐ दूर्वाश्यामाय नमः
21।    ॐ महारूपाय नमः
22।    ॐ क्रूरदृष्टये नमः
23।    ॐ अनामयाय नमः
24।    ॐ त्रिनेत्राय नमः
25।    ॐ उत्पलकराय नमः
26।    ॐ कालहंत्रे नमः
27।    ॐ नराधिपाय नमः
28।    ॐ खंडेंदुमौळितनयाय नमः
29।    ॐ कल्हारकुसुमप्रियाय नमः
30।    ॐ मदनाय नमः
31।    ॐ माधवसुताय नमः
32।    ॐ मंदारकुसुमार्चिताय नमः
33।    ॐ महाबलाय नमः
34।    ॐ महोत्साहाय नमः
35।    ॐ महापापविनाशनाय नमः
36।    ॐ महाशूराय नमः
37।    ॐ महाधीराय नमः
38।    ॐ महासर्पविभूषणाय नमः
39।    ॐ असिहस्ताय नमः
40।    ॐ शरधराय नमः
41।    ॐ हालाहलधरात्मजाय नमः
42।    ॐ अर्जुनेशाय नमः
43।    ॐ अग्निनयनाय नमः
44।    ॐ अनंगमदनातुराय नमः
45।    ॐ दुष्टग्रहाधिपाय नमः
46।    ॐ श्रीदाय नमः
47।    ॐ शिष्टरक्षणदीक्षिताय नमः
48।    ॐ कस्तूरीतिलकाय नमः
49।    ॐ राजशेखराय नमः
50।    ॐ राजसत्तमाय नमः
51।    ॐ राजराजार्चिताय नमः
52।    ॐ विष्णुपुत्राय नमः
53।    ॐ वनजनाधिपाय नमः
54।    ॐ वर्चस्कराय नमः
55।    ॐ वररुचये नमः
56।    ॐ वरदाय नमः
57।    ॐ वायुवाहनाय नमः
58।    ॐ वज्रकायाय नमः
59।    ॐ खड्गपाणये नमः
60।    ॐ वज्रहस्ताय नमः
61।    ॐ बलोद्धताय नमः
62।    ॐ त्रिलोकज्ञाय नमः
63।    ॐ अतिबलाय नमः
64।    ॐ पुष्कलाय नमः
65।    ॐ वृत्तपावनाय नमः
66।    ॐ पूर्णाधवाय नमः
67।    ॐ पुष्कलेशाय नमः
68।    ॐ पाशहस्ताय नमः
69।    ॐ भयापहाय नमः
70।    ॐ फट्काररूपाय नमः
71।    ॐ पापघ्नाय नमः
72।    ॐ पाषंडरुधिराशनाय नमः
73।    ॐ पंचपांडवसंत्रात्रे नमः
74।    ॐ परपंचाक्षराश्रिताय नमः
75।    ॐ पंचवक्त्रसुताय नमः
76।    ॐ पूज्याय नमः
77।    ॐ पंडिताय नमः
78।    ॐ परमेश्वराय नमः
79।    ॐ भवतापप्रशमनाय नमः
80।    ॐ भक्ताभीष्टप्रदायकाय नमः
81।    ॐ कवये नमः
82।    ॐ कवीनामधिपाय नमः
83।    ॐ कृपाळवे नमः
84।    ॐ क्लेशनाशनाय नमः
85।    ॐ समाय नमः
86।    ॐ अरूपाय नमः
87।    ॐ सेनान्ये नमः
88।    ॐ भक्तसंपत्प्रदायकाय नमः
89।    ॐ व्याघ्रचर्मधराय नमः
90।    ॐ शूलिने नमः
91।    ॐ कपालिने नमः
92।    ॐ वेणुवादनाय नमः
93।    ॐ कंबुकंठाय नमः
94।    ॐ कलरवाय नमः
95।    ॐ किरीटादिविभूषणाय नमः
96।    ॐ धूर्जटये नमः
97।    ॐ वीरनिलयाय नमः
98।    ॐ वीराय नमः
99।    ॐ वीरेंदुवंदिताय नमः
100।    ॐ विश्वरूपाय नमः
101।    ॐ वृषपतये नमः
102।    ॐ विविधार्थफलप्रदाय नमः
103।    ॐ दीर्घनासाय नमः
104।    ॐ महाबाहवे नमः
105।    ॐ चतुर्बाहवे नमः
106।    ॐ जटाधराय नमः
107।    ॐ सनकादिमुनिश्रेष्ठस्तुत्याय नमः
108।    ॐ हरिहरात्मजाय नमः

इति श्रीहरिहरपुत्राष्टोत्तरशतनामावलिः संपूर्णं ॥

अर्थ

श्री हरिहरपुत्र अष्टोत्तरशतनामावलि भगवान अयप्पा स्वामी को समर्पित 108 दिव्य नामों का एक पवित्र स्तोत्र है। यह नामावलि भगवान शिव और भगवान विष्णु (हरि-हर) के पुत्र, हरिहरपुत्र अयप्पा स्वामी की महिमा का गुणगान करती है। प्रत्येक नाम उनके अद्वितीय स्वरूप, दिव्य ऊर्जा और गुणों को प्रकट करता है, जो भक्तों को आंतरिक शांति और आध्यात्मिक उत्थान प्रदान करने का एक पवित्र मार्ग है। इस नामावलि का पाठ करने से भक्तों का मन शुद्ध होता है और सकारात्मक ऊर्जाएँ व्याप्त होती हैं।

अयप्पा स्वामी हरिहरपुत्र के रूप में भगवान शिव की तपस्या, वैराग्य और शक्ति तथा भगवान विष्णु के पालन, संरक्षण और धर्मनिष्ठा के गुणों का संगम हैं। यह नामावलि भगवान के इस द्वैत स्वरूप का गहराई से वर्णन करती है। वे केवल देवताओं के पुत्र नहीं, बल्कि धर्म के रक्षक, भक्तों के पालक और सत्य के साकार रूप हैं। इन नामों का जाप करने से भक्त शिव-विष्णु तत्वों की एकता का अनुभव करते हैं और समग्र दिव्य शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह भक्तों को अज्ञान से मुक्त कर ज्ञान के मार्ग की ओर अग्रसर करता है।

इस नामावलि के आरंभ में आने वाले ध्यान श्लोक अयप्पा स्वामी के मनमोहक रूप का वर्णन करते हैं। वे त्रिगुणित मणिपद्म, वज्र माणिक्य दण्ड, सितसुमाशरपाश और इक्षुकोदण्ड धारण किए हुए हैं, मधुपात्र लिए हुए हैं, और श्याम-कोमल तनु, विचित्र वस्त्र, लाल कमल की माला, उच्च रत्न मुकुट तथा घुंघराले केशों के साथ शोभायमान हैं। प्रत्येक नाम उनके शौर्य, करुणा, ज्ञान, योग शक्ति, धैर्य और भक्तों को वरदान देने की क्षमता को उजागर करता है। वे दुष्ट शक्तियों का संहार कर धर्म की स्थापना करने वाले देवता हैं और भक्तों के कष्टों को हरने वाले करुणामय हैं।

अयप्पा स्वामी के 108 नाम उनके अनगिनत गुणों, रूपों और कार्यों का विस्तार से वर्णन करते हैं। 'ॐ महाशास्त्रे नमः' जैसा पहला नाम उन्हें एक महान शासक और शिक्षक के रूप में दर्शाता है, जो सभी जीवों को सही मार्ग दिखाते हैं। 'ॐ विश्वशास्त्रे नमह' का अर्थ है कि वे ब्रह्मांड के नियंत्रक हैं, और 'ॐ धर्मशास्त्रे नमः' का अर्थ है धर्म के रक्षक। ये नाम भक्तों को जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए आध्यात्मिक बल प्रदान करते हैं और धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। इस नामावलि का पाठ मन को शुद्ध करता है, नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर करता है और सकारात्मकता भरता है, अंततः मोक्ष की ओर ले जाता है।

लाभ (Benefits):

  • पाप निवारण और शुद्धि: इस नामावलि के निरंतर पाठ से पूर्वजन्मों और वर्तमान जन्म के पापों का नाश होता है, जिससे मन और आत्मा शुद्ध होती है तथा आंतरिक शांति मिलती है।
  • साहस और आत्मविश्वास: अयप्पा स्वामी के शौर्य और धैर्य की स्तुति करने से भक्तों को किसी भी कठिन परिस्थिति का सामना करने के लिए अपार साहस और आत्मविश्वास प्राप्त होता है, भय दूर होता है।
  • धन और समृद्धि: भगवान के आशीर्वाद से भक्तों के जीवन में आर्थिक स्थिति में सुधार होता है, जिससे समृद्धि और सफलता प्राप्त होती है। बाधाएँ दूर होती हैं और प्रगति संभव होती है।
  • स्वास्थ्य और सुरक्षा: यह नामावलि रोगों से मुक्ति दिलाकर उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करती है और सभी बुरी शक्तियों तथा नकारात्मक प्रभावों से रक्षा करती है।
  • आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष: अयप्पा स्वामी के दिव्य नामों का जाप करने से आध्यात्मिक ज्ञान में वृद्धि होती है, मन को शांति मिलती है और अंततः मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है, आत्म-साक्षात्कार में सहायक होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री हरिहरपुत्र अष्टोत्तरशतनामावलि क्या है?
श्री हरिहरपुत्र अष्टोत्तरशतनामावलि भगवान अयप्पा स्वामी को समर्पित 108 दिव्य नामों का एक पवित्र स्तोत्र है। यह नामावलि उनके हरिहर स्वरूप और दिव्य गुणों का वर्णन करती है।
इस नामावलि का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस नामावलि का पाठ प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद या किसी भी शुभ अवसर पर, विशेषकर शनिवार को, भक्ति और एकाग्रता के साथ किया जा सकता है। अयप्पा स्वामी के व्रत के दौरान पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
इस नामावलि के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
इस नामावलि के पाठ से पापों का निवारण होता है, साहस, आत्मविश्वास, उत्तम स्वास्थ्य, आर्थिक समृद्धि और मन को शांति मिलती है। यह आध्यात्मिक उन्नति में भी सहायक है।
श्री हरिहरपुत्र अष्टोत्तरशतनामावलि का पाठ कौन कर सकता है?
अयप्पा स्वामी के भक्त, विशेष रूप से धर्म, शांति और सुरक्षा की कामना करने वाले व्यक्ति इस नामावलि का पाठ कर सकते हैं। किसी भी जाति, पंथ या लिंग का व्यक्ति इसे पाठ करने के लिए योग्य है।
इस नामावलि का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
प्रतिदिन कम से कम एक बार पूरी नामावलि का पाठ करना उत्तम माना जाता है। विशेष अवसरों पर 3, 5, 11 या 108 बार पाठ किया जा सकता है। महत्वपूर्ण बात भक्ति और श्रद्धा है।
इस नामावलि का उद्गम क्या है?
श्री हरिहरपुत्र अष्टोत्तरशतनामावलि प्राचीन शास्त्रों और स्तोत्र परंपराओं से निकली है। यह अयप्पा स्वामी के दिव्य गुणों की स्तुति करने वाले कई शास्त्रीय ग्रंथों में पाई जाती है।

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