श्री हरि नाममाला स्तोत्रं
गोविंदं गोकुलानंदं गोपालं गोपिवल्लभं |
गोवर्धनोद्धरं धीरं तं वंदे गोमतीप्रियं || 1 ||
नारायणं निराकारं नरवीरं नरोत्तमं |
नृसिंहं नागनाथं च तं वंदे नरकांतकं || 2 ||
पीतांबरं पद्मनाभं पद्माक्षं पुरुषोत्तमं |
पवित्रं परमानंदं तं वंदे परमेश्वरं || 3 ||
राघवं रामचंद्रं च रावणारिं रमापतिं |
राजीवलोचनं रामं तं वंदे रघुनंदनं || 4 ||
वामनं विश्वरूपं च वासुदेवं च विठ्ठलं |
विश्वेश्वरं विभुं व्यासं तं वंदे वेदवल्लभं || 5 ||
दामोदरं दिव्यसिंहं दयाळुं दीननायकं |
दैत्यारिं देवदेवेशं तं वंदे देवकीसुतं || 6 ||
मुरारिं माधवं मत्स्यं मुकुंदं मुष्टिमर्दनं |
मुंजकेशं महाबाहुं तं वंदे मधुसूदनं || 7 ||
केशवं कमलाकांतं कामेशं कौस्तुभप्रियं |
कौमोदकीधरं कृष्णं तं वंदे कौरवांतकं || 8 ||
भूधरं भुवनानंदं भूतेशं भूतनायकं |
भावनैकं भुजंगेशं तं वंदे भवनाशनं || 9 ||
जनार्दनं जगन्नाथं जगज्जाड्यविनाशकं |
जामदग्न्यं परं ज्योतिस्तं वंदे जलशायिनं || 10 ||
चतुर्भुजं चिदानंदं मल्लचाणूरमर्दनं |
चराचरगुरुं देवं तं वंदे चक्रपाणिनं || 11 ||
श्रियःकरं श्रियोनाथं श्रीधरं श्रीवरप्रदं |
श्रीवत्सलधरं सौम्यं तं वंदे श्रीसुरेश्वरं || 12 ||
योगीश्वरं यज्ञपतिं यशोदानंददायकं |
यमुनाजलकल्लोलं तं वंदे यदुनायकं || 13 ||
सालग्रामशिलाशुद्धं शंखचक्रोपशोभितं |
सुरासुरैः सदा सेव्यं तं वंदे साधुवल्लभं || 14 ||
त्रिविक्रमं तपोमूर्तिं त्रिविधाघौघनाशनं |
त्रिस्थलं तीर्थराजेंद्रं तं वंदे तुलसीप्रियं || 15 ||
अनंतमादिपुरुषमच्युतं च वरप्रदं |
आनंदं च सदानंदं तं वंदे चाघनाशनं || 16 ||
लीलया धृतभूभारं लोकसत्त्वैकवंदितं |
लोकेश्वरं च श्रीकांतं तं वंदे लक्ष्मणप्रियं || 17 ||
हरिं च हरिणाक्षं च हरिनाथं हरप्रियं |
हलायुधसहायं च तं वंदे हनुमत्प्रियं || 18 ||
हरिनामकृता माला पवित्रा पापनाशिनी |
बलिराजेंद्रेण चोक्ता कंठे धार्या प्रयत्नतः ||
इति बलिराजेंद्रेणोक्तं श्री हरि नाममाला स्तोत्रं |
अर्थ
श्री हरि नाममाला स्तोत्र भगवान विष्णु के दिव्य नामों की एक अनमोल माला है, जो सदियों से भक्तों के हृदय में गूंज रही है। इस स्तोत्र का प्रत्येक श्लोक भगवान के अनगिनत रूपों, अवतारों, दिव्य लीलाओं और उनकी परम दया को मोतियों की तरह पिरोता है, जिससे भक्त के हृदय में नामस्मरण की शक्ति बढ़ती है। यह स्तोत्र भगवान के प्रति गहन भक्ति और श्रद्धा जगाने का एक शक्तिशाली माध्यम है, जो मन को शुद्ध करता है और आंतरिक शांति प्रदान करता है। माना जाता है कि स्वयं बलि महाराज को भगवान हरि ने इस स्तोत्र की महिमा का उपदेश दिया था, जिससे इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।
पहला श्लोक 'गोविंदं गोकुलांनदं गोपालं गोपीवल्लभं | गोवर्धनोद्धरं धीरं तं वन्दे गोमतीप्रियं ||' भगवान कृष्ण के नामों जैसे गोविंद, गोकुलांनद, गोपाल, गोपीवल्लभ का स्मरण करता है। यह गोवर्धन पर्वत को उठाने वाले धीर और गोमती के प्रिय कृष्ण की वंदना करता है। इसके बाद 'नारायणं निराकारं नरवीरं नरोत्तमं | नृसिंहं नागनाथं च तं वन्दे नरकांतकं ||' श्लोक नारायण, निराकार, नरसिंह और नागपति के रूप में भगवान की स्तुति करता है, जो राक्षसों का नाश करते हैं और भक्तों की रक्षा करते हैं। पीले वस्त्र धारण करने वाले, पद्मनाभ, पद्माक्ष, पुरुषोत्तम, पवित्र और परमानंद स्वरूप परमेश्वर का वर्णन तीसरे श्लोक में किया गया है, जो भगवान की आंतरिक महिमा और शांत स्वभाव को दर्शाता है।
अगले श्लोकों में भगवान रामचन्द्र के शौर्य, धर्म-पालन और करुणा को 'राघवं रामचन्द्रं च रावणारिं रमापतिं | राजीवलोचनं रामं तं वन्दे रघुनंदनं ||' के रूप में महिमामंडित किया गया है। वामन, विश्वरूप, वासुदेव, विट्ठल और व्यास के रूप में भगवान के अनेक अवतारों को दर्शाया गया है, जो विश्व के संरक्षण के लिए प्रकट हुए। दामोदर, दयालु, देवकीसुत जैसे नाम भगवान की बाल-प्रेम, दया और भक्त-हितैषी प्रवृत्ति को दर्शाते हैं। मुरारी, माधव, मत्स्य, मुकुंद, मधुसूदन जैसे नाम विशेष क्षणों में भक्तों की रक्षा करने वाले भगवान को इंगित करते हैं। केशव, कृष्ण, कमलाकांत और कौरवांतक जैसे नाम धर्म की स्थापना के लिए शक्ति, बुद्धि और प्रेम के अद्वितीय संगम को दर्शाते हैं।
इसके बाद के श्लोक भगवान को भूधर (पृथ्वी को धारण करने वाले), भूतेश (समस्त प्राणियों के स्वामी), जगन्नाथ (जगत के नाथ), चतुर्भुज (चार भुजाओं वाले), चिदानंद (चेतना और आनंद स्वरूप), श्रीवत्सल (श्री के प्रिय), श्रीधर (लक्ष्मी को धारण करने वाले), यज्ञेश (यज्ञों के स्वामी), योगेश्वर (योगियों के स्वामी) और यमुना क्रीड़ाकेलि कृष्ण के रूप में वर्णित करते हैं। यह स्तोत्र भगवान के सालग्राम रूप, शंख-चक्र धारण करने वाले और सुर-असुरों द्वारा पूजित होने का भी उल्लेख करता है। त्रिविक्रम, तपोमूर्ति और तीर्थराजेंद्र जैसे नाम भगवान को तीनों लोकों के कल्याणकर्ता के रूप में प्रस्तुत करते हैं। अंतिम श्लोक में आदिपुरुष, आनंदस्वरूप, लोकेश और लक्ष्मणप्रिय के रूप में हरि के सर्वगुण संपन्न स्वरूप का वर्णन है। यह हरि नाममाला स्तोत्र पापों का नाश करने वाला, शुद्धता प्रदान करने वाला और धारण करने योग्य बताया गया है। यह भक्तों के चित्त के लिए एक माला के समान है, जहाँ प्रत्येक नाम एक रत्न है, प्रत्येक रत्न एक सुरक्षा है और प्रत्येक सुरक्षा मोक्ष का साधन है।
लाभ (Benefits):
- मनोशुद्धि और शांति: हरि नामस्मरण से मन शांत होता है, नकारात्मक विचार दूर होते हैं और सकारात्मकता बढ़ती है, जिससे आंतरिक शांति मिलती है।
- पाप-नाश: इस स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करने से जाने-अनजाने में किए गए सभी पापों का नाश होता है और आत्मा पवित्र होती है।
- भगवत्कृपा की प्राप्ति: भगवान विष्णु के विभिन्न नामों का स्मरण करने से उनकी सीधी कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
- मोक्ष की प्राप्ति: निरंतर नाम संकीर्तन भगवान के साथ गहरा संबंध स्थापित करता है, जो अंततः जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति (मोक्ष) प्राप्त करने में सहायक होता है।
- आध्यात्मिक उन्नति: प्रत्येक नाम भगवान के एक गुण का प्रतिनिधित्व करता है, उनके स्मरण से भक्त की आध्यात्मिक समझ और विवेक में वृद्धि होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री हरि नाममाला स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री हरि नाममाला स्तोत्र के पाठ से क्या मुख्य लाभ मिलते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री हरि नाममाला स्तोत्र का उद्गम या स्रोत क्या है?
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