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श्री धर्मशास्त अष्टोत्तरशतनामावलिः

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अष्टोत्तर
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ध्यानं ।
कल्हारोज्ज्वल नीलकुंतलभरं कालांबुदश्यामलं
कर्पूराकलिताभिरामवपुषं कांतेंदुबिंबाननं ।
श्रीदंडांकुश-पाश-शूल विलसत्पाणिं मदांत-
द्विपारूढं शत्रुविमर्दनं हृदि महा शास्तारमाद्यं भजे ॥

अथ नामावलिः

    1।    ॐ महाशास्त्रे नमः
    2।    ॐ महादेवाय नमः
    3।    ॐ महादेवसुताय नमः
    4।    ॐ अव्याय नमः
    5।    ॐ लोककर्त्रे नमः
    6।    ॐ लोकभर्त्रे नमः
    7।    ॐ लोकहर्त्रे नमः
    8।    ॐ परात्पराय नमः
    9।    ॐ त्रिलोकरक्षकाय नमः
    10।    ॐ धन्विने नमः
    11।    ॐ तपस्विने नमः
    12।    ॐ भूतसैनिकाय नमः
    13।    ॐ मंत्रवेदिने नमः
    14।    ॐ महावेदिने नमः
    15।    ॐ मारुताय नमः
    16।    ॐ जगदीश्वराय नमः
    17।    ॐ लोकाध्यक्षाय नमः
    18।    ॐ अग्रण्ये नमः
    19।    ॐ श्रीमते नमः
    20।    ॐ अप्रमेयपराक्रमाय नमः
    21।    ॐ सिंहारूढाय नमः
    22।    ॐ गजारूढाय नमः
    23।    ॐ हयारूढाय नमः
    24।    ॐ महेश्वराय नमः
    25।    ॐ नानाशस्त्रधराय नमः
    26।    ॐ अनर्घाय नमः
    27।    ॐ नानाविद्याविशारदाय नमः
    28।    ॐ नानारूपधराय नमः
    29।    ॐ वीराय नमः
    30।    ॐ नानाप्राणिनिषेविताय नमः
    31।    ॐ भूतेशाय नमः
    32।    ॐ भूतिदाय नमः
    33।    ॐ भृत्याय नमः
    34।    ॐ भुजंगाभरणोज्ज्वलाय नमः
    35।    ॐ इक्षुधन्विने नमः
    36।    ॐ पुष्पबाणाय नमः
    37।    ॐ महारूपाय नमः
    38।    ॐ महाप्रभवे नमः
    39।    ॐ मायादेवीसुताय नमः
    40।    ॐ मान्याय नमः
    41।    ॐ महनीयाय नमः
    42।    ॐ महागुणाय नमः
    43।    ॐ महाशैवाय नमः
    44।    ॐ महारुद्राय नमः
    45।    ॐ वैष्णवाय नमः
    46।    ॐ विष्णुपूजकाय नमः
    47।    ॐ विघ्नेशाय नमः
    48।    ॐ वीरभद्रेशाय नमः
    49।    ॐ भैरवाय नमः
    50।    ॐ षण्मुखप्रियाय नमः
    51।    ॐ मेरुशृंगसमासीनाय नमः
    52।    ॐ मुनिसंघनिषेविताय नमः
    53।    ॐ देवाय नमः
    54।    ॐ भद्राय नमः
    55।    ॐ जगन्नाथाय नमः
    56।    ॐ गणनाथाय नमः
    57।    ॐ गणेश्वराय नमः
    58।    ॐ महायोगिने नमः
    59।    ॐ महामायिने नमः
    60।    ॐ महाज्ञानिने नमः
    61।    ॐ महास्थिराय नमः
    62।    ॐ देवशास्त्रे नमः
    63।    ॐ भूतशास्त्रे नमः
    64।    ॐ भीमपराक्रमाय नमः
    65।    ॐ नागहाराय नमः
    66।    ॐ नागकेशाय नमः
    67।    ॐ व्योमकेशाय नमः
    68।    ॐ सनातनाय नमः
    69।    ॐ सगुणाय नमः
    70।    ॐ निर्गुणाय नमः
    71।    ॐ नित्याय नमः
    72।    ॐ नित्यतृप्ताय नमः
    73।    ॐ निराश्रयाय नमः
    74।    ॐ लोकाश्रयाय नमः
    75।    ॐ गणाधीशाय नमः
    76।    ॐ चतुःषष्टिकलामयाय नमः
    77।    ॐ ऋग्यजुःसामाथर्वात्मने नमः
    78।    ॐ मल्लकासुरभंजनाय नमः
    79।    ॐ त्रिमूर्तये नमः
    80।    ॐ दैत्यमथनाय नमः
    81।    ॐ प्रकृतये नमः
    82।    ॐ पुरुषोत्तमाय नमः
    83।    ॐ कालज्ञानिने नमः
    84।    ॐ महाज्ञानिने नमः
    85।    ॐ कामदाय नमः
    86।    ॐ कमलेक्षणाय नमः
    87।    ॐ कल्पवृक्षाय नमः
    88।    ॐ महावृक्षाय नमः
    89।    ॐ विद्यावृक्षाय नमः
    90।    ॐ विभूतिदाय नमः
    91।    ॐ संसारतापविच्छेत्रे नमः
    92।    ॐ पशुलोकभयंकराय नमः
    93।    ॐ रोगहंत्रे नमः
    94।    ॐ प्राणदात्रे नमः
    95।    ॐ परगर्वविभंजनाय नमः
    96।    ॐ सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञाय नमः
    97।    ॐ नीतिमते नमः
    98।    ॐ पापभंजनाय नमः
    99।    ॐ पुष्कलापूर्णासंयुक्ताय नमः
    100।    ॐ परमात्मने नमः
    101।    ॐ सतांगतये नमः
    102।    ॐ अनंतादित्यसंकाशाय नमः
    103।    ॐ सुब्रह्मण्यानुजाय नमः
    104।    ॐ बलिने नमः
    105।    ॐ भक्तानुकंपिने नमः
    106।    ॐ देवेशाय नमः
    107।    ॐ भगवते नमः
    108।    ॐ भक्तवत्सलाय नमः

इति श्रीधर्मशास्ताष्टोत्तरशतनामावलिः संपूर्णं ।

अर्थ

श्री धर्मशास्त अष्टोत्तरशतनामावलि भगवान अयप्पा स्वामी को समर्पित 108 दिव्य नामों का एक पवित्र स्तोत्र है। यह नामावलि भगवान के अनगिनत गुणों, महिमा और शक्ति का गुणगान करती है। अयप्पा स्वामी भगवान शिव और विष्णु के मोहिनी रूप के पुत्र हैं, जिन्हें धर्म का रक्षक, भक्तों का पालक और सभी लोकों का स्वामी माना जाता है। इस नामावली का प्रत्येक नाम भगवान के एक अद्वितीय दिव्य पहलू को प्रकाशित करता है, उनके सगुण और निर्गुण स्वरूपों का अनावरण करता है।

इस नामावलि का पाठ केवल शब्दों का उच्चारण नहीं है, बल्कि भगवान के दिव्य स्वरूप के साथ गहरा संबंध स्थापित करने का एक गहन आध्यात्मिक अभ्यास है। 'महाशास्त्रे नमः' जैसे पहले नाम से लेकर अंतिम नाम तक, प्रत्येक नाम अयप्पा स्वामी के परम ज्ञान, करुणा, शौर्य और धर्मनिष्ठा को स्मरण कराता है। 'लोककर्त्रे', 'लोकभर्त्रे', 'लोकहर्त्रे' जैसे नाम इस बात का संकेत देते हैं कि भगवान ही सृष्टि, पालन और संहार के परम कारण हैं। 'पाशहस्ता', 'धनुर्धरा' जैसे नाम उनके अस्त्रों और भक्तों की रक्षा करने की उनकी क्षमता का वर्णन करते हैं। यह नामावलि भगवान के विभिन्न रूपों, लीलाओं और उनके दिव्य गुणों को मन में लाती है, जिससे भक्तों का आध्यात्मिक अनुभव बढ़ता है।

श्री धर्मशास्त कलियुग के प्रत्यक्ष देवताओं में से एक हैं, जो सबरीमाला में निवास करते हैं और भक्तों को दर्शन देते हैं। उनकी अष्टोत्तरशतनामावलि का पाठ मन को शुद्ध करता है, नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर करता है और सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है। यह भक्तों के जीवन में धर्म, नैतिकता और सत्य के मार्ग को प्रदर्शित करता है। प्रतिदिन नियमित रूप से इस नामावलि का पाठ करने से भक्त अयप्पा स्वामी की कृपा प्राप्त करते हैं और भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों क्षेत्रों में उन्नति प्राप्त करते हैं।

लाभ (Benefits):

  • मानसिक शांति और संतोष: इस नामावलि के पाठ से मन में व्याप्त चिंता, भय और तनाव कम होता है, जिससे आंतरिक शांति और संतोष प्राप्त होता है।
  • पापों का नाश और शुद्धिकरण: भक्तिपूर्वक इन नामों का जप करने से जाने-अनजाने में किए गए पापों का नाश होता है और आत्मा शुद्ध होती है।
  • आध्यात्मिक बल और ज्ञान: भगवान अयप्पा के गुणों का स्मरण करने से आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है और जीवन के सत्य के प्रति ज्ञानोदय होता है।
  • साहस और आत्मविश्वास: धर्मशास्त साहस और शौर्य के प्रतीक हैं। उनके नामों का पाठ करने से भक्तों को किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए साहस और आत्मविश्वास मिलता है।
  • सुरक्षा और समृद्धि: अयप्पा स्वामी भक्तों के रक्षक हैं। इस नामावलि का पाठ सभी बाधाओं से सुरक्षा प्रदान करता है और जीवन में सभी शुभता तथा समृद्धि लाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री धर्मशास्त अष्टोत्तरशतनामावलि क्या है?
यह भगवान अयप्पा स्वामी को समर्पित 108 दिव्य नामों का एक पवित्र संग्रह है। प्रत्येक नाम भगवान अयप्पा के विभिन्न गुणों, शक्तियों और दिव्य स्वरूप का वर्णन करता है।
इसका पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इसका पाठ प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद शुद्ध मन से करना चाहिए। विशेष रूप से शनिवार, मंडल पूजा के दौरान या किसी भी शुभ दिन पर पाठ करना अधिक फलदायी होता है।
इस नामावली के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस नामावली के पाठ से मानसिक शांति, भय निवारण, पापों का नाश, आध्यात्मिक ज्ञान, साहस और भगवान अयप्पा स्वामी की दिव्य सुरक्षा प्राप्त होती है। यह जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाती है।
इस नामावली का पाठ कौन कर सकता है?
लिंग, आयु या जाति के भेद के बिना कोई भी इस नामावली का पाठ भक्ति और श्रद्धा से कर सकता है। अयप्पा व्रत धारण करने वाले भक्तों के लिए इसका पाठ विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
इस नामावली का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस नामावली का पाठ कम से कम एक बार या 11, 21, 108 बार अपनी समय और भक्ति के अनुसार किया जा सकता है। नियमित रूप से पाठ करना अधिक प्रभावी होता है।
श्री धर्मशास्त का उद्भव या महत्व क्या है?
श्री धर्मशास्त भगवान शिव और विष्णु के मोहिनी रूप के पुत्र हैं, जिन्हें धर्म के रक्षक, वन देवता और भक्तों के पालक के रूप में पूजा जाता है। उन्हें सत्य और धर्म का प्रतीक माना जाता है।

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