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श्री धर्मशास्तास्तोत्रं

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स्तोत्र
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श्रीभारतीतीर्थ-महास्वामिविरचितं

जगत्प्रतिष्ठाहेतुर्यः धर्मः श्रुत्यंतकीर्तितः ।
तस्याऽपि शास्ता यो देवः तं सदा समुपाश्रये ॥1॥

श्रीशंकरार्यैर्हि शिवावतारैः
     धर्मप्रचाराय समस्तकाले ।
सुस्थापितं शृंगमहीध्रवर्ये
     पीठं यतींद्राः परिभूषयंति ॥2॥

तेष्वेव कर्मंदिवरेषु विद्या-
     तपोधनेषु प्रथितानुभावः ।
विद्यासुतीर्थोऽभिनवोऽद्य योगी
     शास्तारमालोकयितुं प्रतस्थे ॥3॥

धर्मस्य गोप्ता यतिपुंगवोऽयं
     धर्मस्य शास्तारमवैक्षतेति ।
युक्तं तदेतद्ध्युभयोस्तयोर्हि
     सम्मेलनं लोकहिताय नूनं ॥4॥

कालेऽस्मिन् कलिमलदूषितेऽपि धर्मः
     श्रौतोऽयं न खलु विलोपमाप तत्र ।
हेतुः खल्वयमिह नूनमेव नाऽन्यः
     शास्ताऽस्ते सकलजनैकवंद्यपादः ॥5॥

ज्ञानं षडास्यवरतातकृपैकलभ्यं
     मोक्षस्तु तार्क्ष्यवरवाहदयैकलभ्यः ।
ज्ञानं च मोक्ष उभयं तु विना श्रमेण
     प्राप्यं जनैः हरिहरात्मजसत्प्रसादात् ॥6॥

यमनियमादिसमेतैः यतचित्तैर्योगिभिः सदा ध्येयं ।
शास्तारं हृदि कलये धातारं सर्वलोकस्य ॥7॥

शबरगिरिनिवासः सर्वलोकैकपूज्यः
     नतजनसुखकारी नम्रहृत्तापहारी ।
त्रिदशदितिजसेव्यः स्वर्गमोक्षप्रदाता
     हरिहरसुतदेवः संततं शं तनोतु ॥8॥

इति दक्षिणाम्नाय-श्री-शृंगेरी-शारदा-पीठाधीश्वर-
जगद्गुरुशंकराचार्य-अनंतश्रीविभूषित-श्रीभारतीतीर्थ-
महास्वामिविरचित-धर्मशास्ता-स्तोत्रं संपूर्णं ।

अर्थ

श्री धर्मशास्ता स्तोत्रम्, जगद्गुरु श्री भारती तीर्थ महास्वामी जी द्वारा रचित है, जो धर्म के रक्षक भगवान धर्मशास्ता (अयप्पा) के महिमा का गुणगान करता है। यह स्तोत्र धर्म के मूलभूत महत्व को उजागर करता है और धर्म की स्थापना तथा रक्षा में शास्ता देव की भूमिका का वर्णन करता है। यह सृष्टि की स्थिरता के आधार 'धर्म' की रक्षा करने वाले भगवान शास्ता को शरण लेने का उपदेश देता है। यह भक्तों को मानसिक शांति, आध्यात्मिक उत्थान और सभी प्रकार के शुभ फल प्रदान करने वाला एक उत्कृष्ट स्तोत्र है।

यह स्तोत्र भगवान धर्मशास्ता को केवल एक देवता के रूप में नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के समस्त धर्म के मूल आधार और रक्षक के रूप में चित्रित करता है। इसमें श्री शंकराचार्य द्वारा स्थापित श्रृंगेरी महापीठ के अधिपति विद्यासुतीर्थ स्वामी के भगवान धर्मशास्ता के दर्शन के लिए प्रस्थान करने की घटना का उल्लेख है। यह घटना दर्शाती है कि धर्म के रक्षक और धर्म के शासक का मिलन किस प्रकार लोक कल्याण का कारण बनता है। स्तोत्र दृढ़ता से कहता है कि कलियुग के दोषों के बावजूद वैदिक धर्म अक्षुण्ण बना हुआ है, इसका कारण भगवान धर्मशास्ता ही हैं। यह उनकी सर्वोच्च शक्ति और धर्म रक्षा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

प्रत्येक श्लोक भगवान धर्मशास्ता के एक विशेष गुण को उजागर करता है। पहला श्लोक सृष्टि की स्थापना के कारणभूत धर्म की रक्षा करने वाले शास्ता देव की शरण लेने की बात कहता है। दूसरे से चौथे श्लोक में, श्री शंकर भगवत्पाद द्वारा स्थापित श्रृंगेरी पीठ के यतिश्रेष्ठ विद्यासुतीर्थ स्वामी का धर्मशास्ता देव के दर्शन के लिए प्रस्थान और लोक कल्याण के लिए धर्म के गोप्ता तथा धर्म के शास्ता के मिलन का वर्णन है। पांचवां श्लोक घोषणा करता है कि कलियुग के दोषों के बावजूद वैदिक धर्म अक्षुण्ण है, जिसका कारण धर्मशास्ता देव ही हैं। छठा श्लोक कहता है कि ज्ञान सुब्रह्मण्य की कृपा से और मोक्ष विष्णु के आशीर्वाद से प्राप्त होता है, लेकिन ये दोनों हरिहरसुत धर्मशास्ता की कृपा से आसानी से प्राप्त हो जाते हैं। सातवां श्लोक बताता है कि यम-नियमादि द्वारा मन को एकाग्र करने वाले योगियों को सदैव अपने हृदय में धर्मशास्ता देव का ध्यान करना चाहिए। आठवां श्लोक प्रार्थना करता है कि शबरीगिरि निवासी, समस्त लोकों द्वारा पूज्य, भक्तों को सुख देने वाले, दुःखों को दूर करने वाले, देवताओं द्वारा पूजित, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने वाले धर्मशास्ता देव सदैव शुभ प्रदान करें।

संक्षेप में, यह स्तोत्र भगवान धर्मशास्ता की सर्वोच्चता और उनके लोक कल्याणकारी गुणों पर जोर देता है। वे केवल एक देवता नहीं हैं, बल्कि धर्म के साक्षात् स्वरूप, रक्षक और प्रवर्तक हैं। उनकी कृपा से भक्त ज्ञान, मोक्ष, सुख और सभी शुभ फल प्राप्त करते हैं। कलियुग के प्रभाव से धर्म का क्षय न होने का प्रमुख कारण वे ही हैं, यह इस स्तोत्र का मुख्य संदेश है। भगवान शास्ता की पूजा और स्मरण भक्तों को मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति तथा लौकिक एवं पारमार्थिक लाभ प्रदान करता है।

लाभ (Benefits):

  • धर्म की रक्षा और स्थिरता: इस स्तोत्र का पाठ करने से धर्मशास्ता देव की कृपा से व्यक्तियों के जीवन में धर्म की रक्षा होती है और स्थिरता स्थापित होती है।
  • ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति: हरिहरसुत धर्मशास्ता की कृपा से ज्ञान और मोक्ष का मार्ग सुगम होता है, जिससे आध्यात्मिक प्रगति में सहायता मिलती है।
  • दुःख निवारण और सुख प्राप्ति: भगवान धर्मशास्ता में भक्तों के दुःखों को दूर कर उन्हें सुख और शांति प्रदान करने की शक्ति है, जिससे जीवन में संतोष प्राप्त होता है।
  • कलियुग के दोषों से रक्षा: कलियुग के अशुभ प्रभावों से रक्षा मिलती है और सदैव सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है, जिससे नकारात्मक शक्तियाँ दूर होती हैं।
  • समस्त शुभ फलों की प्राप्ति: शास्ता देव के निरंतर स्मरण और पूजा से व्यक्ति लौकिक और पारमार्थिक सभी शुभ फल प्राप्त करते हैं, जिससे जीवन में सफलता और समृद्धि आती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री धर्मशास्ता स्तोत्रं क्या है?
यह जगद्गुरु श्री भारती तीर्थ महास्वामी जी द्वारा रचित एक स्तोत्र है, जो धर्म के रक्षक भगवान धर्मशास्ता की महिमा का गुणगान करता है। यह धर्म के मूलभूत महत्व को समझाता है और उनकी भूमिका पर प्रकाश डालता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद शुद्ध मन से किया जा सकता है। विशेष रूप से शनिवार को और मंडलाकाल में अयप्पा दीक्षा लेने वाले भक्तों के लिए इसका पाठ अत्यंत फलदायी माना जाता है।
श्री धर्मशास्ता स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इसके पाठ से धर्म की रक्षा, ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति, दुःखों का निवारण, कलियुग के दोषों से मुक्ति और सभी प्रकार के शुभ फल प्राप्त होते हैं। यह मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति भी प्रदान करता है।
किसे श्री धर्मशास्ता स्तोत्र का पाठ करना चाहिए?
धर्म के मार्ग पर चलने की इच्छा रखने वाले, ज्ञान और मोक्ष की कामना करने वाले, कलियुग के प्रभावों से रक्षा पाने के इच्छुक और भगवान अयप्पा के सभी भक्त इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
सामान्यतः प्रतिदिन एक या तीन बार इसका पाठ किया जा सकता है। विशेष फल प्राप्ति के लिए 11, 21 या 108 बार भी पाठ किया जा सकता है। इसमें निष्ठा और भक्ति ही सर्वोपरि है।
श्री धर्मशास्ता स्तोत्र का मूल या इसके रचयिता कौन हैं?
इस स्तोत्र की रचना जगद्गुरु श्री भारती तीर्थ महास्वामी जी ने की है। वे श्रृंगेरी शारदा पीठ के अधिपति हैं और उन्होंने इस स्तोत्र के माध्यम से भगवान धर्मशास्ता के महत्व को समझाया है।

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