श्री अय्यप्प पंचरत्नं
लोकवीरं महापूज्यं सर्वरक्षाकरं विभुम् |
पार्वती हृदयानंदं शास्तारं प्रणमाम्यहम् || 1 ||
विप्रपूज्यं विश्ववंद्यं विष्णुशंभोः प्रियं सुतम् |
क्षिप्रप्रसादनिरतं शास्तारं प्रणमाम्यहम् || 1 ||
मत्तमातंगगमनं कारुण्यामृतपूरितम् |
सर्वविघ्नहरं देवं शास्तारं प्रणमाम्यहम् || 3 ||
अस्मत्कुलेश्वरं देवमस्मच्छत्रु विनाशनम् |
अस्मदिष्टप्रदातारं शास्तारं प्रणमाम्यहम् || 4 ||
पांड्येशवंशतिलकं केरले केलिविग्रहम् |
आर्तत्राणपरं देवं शास्तारं प्रणमाम्यहम् || 5 ||
पंचरत्नाख्यमेतद्यो नित्यं शुद्धः पठेन्नरः |
तस्य प्रसन्नो भगवान् शास्ता वसति मानसे ||
अर्थ
श्री अय्यप्प पंचरत्नं स्तोत्रम् भगवान अय्यप्पा स्वामी को समर्पित पाँच रत्नों (श्लोकों) का एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली संग्रह है। ये पंचरत्न भगवान अय्यप्पा के दिव्य गुणों, उनकी महिमा और भक्तों के प्रति उनकी असीम करुणा का वर्णन करते हैं। भगवान अय्यप्पा, जिन्हें हरिहरपुत्र के नाम से भी जाना जाता है, धर्म के रक्षक और सबरीमाला में विराजमान देवता के रूप में लाखों भक्तों द्वारा पूजे जाते हैं। इस स्तोत्र का नित्य पाठ करने से भक्तगण भगवान अय्यप्पा की शीघ्र कृपा प्राप्त कर सकते हैं और जीवन के सभी दुखों से मुक्ति पा सकते हैं।
यह स्तोत्र भगवान अय्यप्पा के अद्वितीय दिव्य गुणों का स्मरण कराता है। पहले श्लोक में, भगवान अय्यप्पा को लोकवीर (संसार के नायक), महापूंज्य (अत्यंत पूजनीय), सर्वरक्षाकर (सभी की रक्षा करने वाले), विभु (सर्वव्यापी प्रभु) और पार्वती के हृदय को आनंदित करने वाले शास्ता के रूप में स्तुति की गई है। यह उनके पराक्रम, व्यापकता और दिव्य जन्म का प्रतीक है। दूसरा श्लोक उन्हें विप्रपूज्य (ब्राह्मणों द्वारा पूजे जाने वाले), विश्ववंद्य (विश्व द्वारा वंदित), विष्णु और शिव के प्रिय पुत्र, और क्षिप्रप्रसाद निरत (शीघ्र प्रसन्न होकर वरदान देने वाले) शास्ता के रूप में वर्णित करता है। यह उनकी पूजनीय स्थिति और भक्तों को त्वरित फल देने की उनकी क्षमता को दर्शाता है।
तीसरे श्लोक में, भगवान अय्यप्पा की चाल को मतवाले हाथी के समान गंभीर और सुंदर (मत्तमातंगगमनं) बताया गया है। उन्हें करुणा के अमृत से परिपूर्ण (कारुण्यामृतपूरितम्) और सभी विघ्नों को हरने वाले देव (सर्वविघ्नहरं देवं) के रूप में वर्णित किया गया है। यह भक्तों के कष्टों को दूर करने की उनकी शक्ति और असीम दया को दर्शाता है। चौथा श्लोक उन्हें हमारे कुल के ईश्वर, हमारे शत्रुओं का विनाश करने वाले, और हमारी इच्छाओं को पूर्ण करने वाले शास्ता के रूप में प्रार्थना करता है। यह भगवान अय्यप्पा को व्यक्तिगत रक्षक और मनोकामना पूर्ण करने वाले देवता के रूप में देखने वाले भक्तों के भाव को व्यक्त करता है।
अंतिम, पाँचवें श्लोक में, भगवान अय्यप्पा को पांड्य वंश के तिलक (गौरव), केरल में क्रीड़ारत विग्रह (सबरीमाला में विराजमान), और संकट में पड़े लोगों के परम रक्षक देव के रूप में महिमामंडित किया गया है। यह उनके ऐतिहासिक और भौगोलिक महत्व को उजागर करता है, विशेषकर सबरीमाला तीर्थयात्रा के संदर्भ में। स्तोत्र के फलश्रुति में कहा गया है कि जो कोई भी इस पंचरत्न स्तोत्र का नित्य शुद्ध मन से पाठ करता है, उस पर भगवान शास्ता प्रसन्न होकर उसके हृदय में निवास करते हैं। यह केवल पाठ मात्र नहीं, बल्कि भगवान अय्यप्पा के साथ एक गहरा आध्यात्मिक संबंध स्थापित करता है।
लाभ (Benefits):
- समस्त बाधाओं का निवारण: भगवान अय्यप्पा की स्तुति से भक्तों के जीवन में आने वाली सभी बाधाएँ, चुनौतियाँ और कष्ट दूर होते हैं।
- स्वास्थ्य और समृद्धि की प्राप्ति: इस स्तोत्र का नियमित पाठ शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है, साथ ही आर्थिक समृद्धि और खुशहाली लाता है।
- शत्रुओं पर विजय और सुरक्षा: यह स्तोत्र नकारात्मक शक्तियों और शत्रुओं से रक्षा करता है, भक्तों को साहस और निर्भयता प्रदान करता है।
- मनोकामना पूर्ति: शुद्ध भक्ति के साथ इस स्तोत्र का पाठ करने वाले भक्तों की सभी न्यायसंगत इच्छाएँ और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
- मानसिक शांति और आध्यात्मिक उत्थान: अय्यप्पा के स्मरण से मन को शांति, स्थिरता और अंततः मोक्ष की ओर आध्यात्मिक प्रगति मिलती है। भगवान अय्यप्पा स्वयं भक्तों के हृदय में निवास करते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री अय्यप्प पंचरत्नं स्तोत्रम् क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री अय्यप्प पंचरत्नं स्तोत्रम् के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
यह स्तोत्र कौन पाठ कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का उद्गम या स्रोत क्या है?
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