श्री अन्नपूर्णा स्तवः
विश्वेश्वरीं वरेण्यां विश्वाश्रयणीं विशिष्टफलदात्रीं |
स्तोष्यामि वांछिताप्त्यै स्तोत्रैरन्नाधिनायिकामंबां ||1||
कांचनरत्नविचित्रां दवीं दधतीं तथान्नपात्रं च |
कष्टदरिद्रार्तिहरामंबां प्रणतोऽस्मि संपदां वृद्ध्यै ||2||
सर्वाभिलाषपूरणकल्पकलतिकान्नपूर्णाख्या |
दारिद्र्यदोषमुग्रं शमयतु सकलार्थवृद्धिदानेन ||3||
अन्नाधिनायिकायाः कृपाघना दुःखधर्मपरितप्ते |
मयि दारिद्र्यऋणघ्न्या वर्षतु धनधान्यधारया सुचिरं ||4||
वेदादिर्भुवनाहृद्भगवति माहेश्वरीति चान्नांते |
पूर्णेऽग्निवल्लभा स्यादुक्तोऽयं मनुरशेषफलदायी ||5||
गुरुकारुण्याल्लब्धं मंत्रमिदं दिनमुखेषु भक्तधिया |
यो जपति तस्य सिद्धिर्न दुर्लभा जायते च तापघ्नी ||6||
तव पादकमलसेवाहृतचित्तः साधकः समाहितधीः |
तरति महाभवदुर्गं विश्रुतकीर्तिप्रभावसौभाग्यः ||7||
त्वजपपूजाध्यानप्रभेदपरिनिष्ठितात्मधीर्मनुजः |
निःस्खोऽप्यकिंचनोऽपि त्रिभुवनविख्यातकीर्तिराशिः स्यात् ||8||
निधिवृंदमध्यगां त्वां ध्यात्वा मंत्रं यदा नरो जपति |
देवि तदास्य निवासं विशंति विविधार्थपूरिता निधयः ||9||
दिव्यान्नपूर्णपात्रं दवीं च करद्वयेन विभ्राणां |
ध्यात्वा यदि जपति त्वां प्रपूर्यते तस्य वेश्म धान्यौघैः ||10||
यस्मिन् वसति मनुष्यस्तव मंत्रविशेषजापको देशे |
तत्र न दीना वाणी प्रवर्तते देवि ``नास्ति नास्ती'' ति ||11||
अन्नाद्रिमध्यविस्फुरदंबुजमध्ये त्रिमंडलांतःस्थां |
ध्यायेद्यो दारिद्र्याद्विमुच्यते साधकः स एवाशु ||12||
इंद्राग्निसोमभास्करवरुणानिलघनदतार्क्ष्यकंदर्पाः |
विष्णुविरिश्चप्रमुखा देवास्त्वद्ध्यानसंपदा प्रथिताः ||13||
युष्मदपांगघनोऽयं प्रशमितबहुदुःखधर्मतापौघः |
धारासारवनौघं वर्षतु मयि देवि सर्वदा कृपया ||14||
तत्र पाणिवल्लवस्था दर्वी दिव्यान्नपूरिता देवि |
दारिद्र्यदोषमुग्रं शमयतु मम संपदां वृद्धयै ||15||
वीक्षस्व मामनेकामयदुरितदुरंतदुःखपरितप्तं | (परितप्तां)
मातर्विभूतिमय्या दिव्यामृतसारधारया दृष्टया ||16||
अभिनवभास्करकोटिप्रभासमुद्भासितं हि ते रूपं |
हृदयांबुजमध्यगतं देवि समाधौ भजंति योगींद्राः ||17||
आदौ सृजसि च विश्वं प्रपासि सचराचरं जगद् भृयः |
संहरसि लोकमंते गुणत्रये सा त्वमेव देव्येका ||18||
मायोदधिरयमंब विषयग्राहोर्मिंदारुणो भवति |
त्वत्तापवाडवाग्नौ सोऽपि च विलयं प्रयाति तच्चित्रं ||19||
श्रीमद्गुरुप्रसादात्तत्त्वं तव योऽभिवेत्ति लोकेऽस्मिन् |
देवि स मनुजो लोके पारत्रिकमैहिकं शमभ्येति ||20||
हुतभ्रुङ्मंडलमध्ये विलसितरविबिंबमध्यगं त्वमृतं |
सोमात्मकं विदित्वा देवि त्वद्भावनेन पूतः स्यात् ||21||
गुरुवरपादपवित्रीकृतांतरात्मा प्रतापयित्वा त्वां |
देवि चिदग्नौ दीप्ते योगी योगामृतं जुहोत्येव ||22||
सकृदपि युष्मद्भक्तो दिव्यामृतमंब भावपात्रस्थं |
पिबति विदित्वा सम्यग् जीवन्मुक्तः स विज्ञेयः ||23||
योगामृतपूतात्मा योगी विजितेंद्रियारिजितसंगः | (संघः)
नहि जननीगर्भगृहं प्रविशति योगेशि योगभावितधीः ||24||
योगी त्वयाहिधत्ते संवित्तिपदे तदैव परितुष्टिं | (त्वयाधिधत्ते)
विधिहरिरुद्रादीनां गणयति न पदानि देव्यनित्यानि ||25||
षट्त्रिंशत्तत्त्वाख्यं शिवादिभूम्यंतमंब विश्वमिदं |
यस्योर्मिंबुद्बुदः स्यात् तत्ते संवित्तिमाश्रये धाम ||26||
मूलाधारनिवासा सूक्ष्मा सूर्यायुतोपमा शक्तिः |
निर्भिद्य षट्सरोजं यांती या सा त्वमेव शंभुपदं ||27||
षोडशपत्रसरोजात् स्रवन्महाधारया सहोद्दीप्ता |
यांती मूलनिवासं या हि कुळा कुंडली त्वमेवांब ||28||
जित्वा षट् पंच पुनर्निरुध्य दशकं तथैकमवलंब्य |
देवि तव रूपमब्जे हृदयस्थे संयमी स्मरति ||29||
स्थूलं तवांब रूपं योगिमनःपद्मकर्णिकासंस्थं |
योगविवृद्ध्यै सिद्धिं मम दिशतु समस्तवांछितावाप्त्यै ||30||
सूक्ष्मं तवांब रूपं सकलजगत्राणकारणोद्भूतं |
स्तोष्ये तदेव भक्त्या वांछितसिद्धिप्रदानसुरवृक्षं ||31||
श्रीदुर्गा वाग्देवी गिरिजा लिपिमातृका च मातंगी |
त्रिपुरा तथान्नपूर्णा राज्या रमा चेति कीर्तिता मुनिभिः ||32||
वाग्देवीं वागाप्त्यै दुर्गां भयशांतये श्रियं भूत्यै |
आराधयति मनुष्यः पुरुषार्थचतुष्कलब्धये त्रिपुराम ||33||
बहुरूपधारिणीं त्वां बहुधा प्रवदंति मानवा लोके |
गुरुमंत्रदेवतात्मस्वरूपिणीं भावयाम्यहं त्वेकां ||34||
कथमंब रूपमाद्यं तव रूपगुणाधिकं च चिन्मात्रं |
जानामि देवि तस्माद् दुरुक्तमीशि क्षमस्व तत् सर्वं ||35||
दारिद्द्र्यदुरितदुःखप्रशांतये व्याहृतं मया स्तोत्रं |
देवि सदा तं जपतां भक्तानां भवतु कामधेनुरिदं ||36||
स्तोत्रेण त्वं तुष्टा मयोदितेन प्रभूतधनधान्यैः !
पूरय वेश्म मदीयं विधेहि मयि सन्निधिं प्रपद्ये त्वां ||37||
इति अन्नपूर्णास्तवः संपूर्णः |
अर्थ
श्री अन्नपूर्णा स्तव जगन्माता अन्नपूर्णा देवी को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र देवी की महिमा, करुणा और सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने की उनकी शक्ति का विस्तृत वर्णन करता है। अन्नपूर्णा का अर्थ है 'अन्न को पूर्ण रूप से प्रदान करने वाली', अर्थात केवल भौतिक भोजन ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ज्ञान और मोक्ष भी प्रदान करने वाली। भगवान शिव की पत्नी यह देवी, अपने भक्तों के सभी दरिद्रता, दुखों को दूर कर, सुख-समृद्धि प्रदान करने वाली करुणा स्वरूपिणी हैं। यह स्तोत्र भक्तों को इस लोक और परलोक दोनों में सौभाग्य प्रदान करने का दिव्य साधन है।
यह स्तोत्र देवी के दिव्य रूप का वर्णन करते हुए प्रारंभ होता है। वे स्वर्ण के समान कांति वाली, रत्नों से सुसज्जित, एक अमूल्य अन्नपात्र और दर्वी (चम्मच) धारण किए हुए दर्शन देती हैं। यह रूप सभी जीवों को भोजन प्रदान करने की उनकी निरंतर करुणा का प्रतीक है। स्तोत्र कहता है कि उनके दर्शन मात्र से ही कष्ट, दरिद्रता और दुख दूर हो जाते हैं। अन्नपूर्णा देवी कल्पवृक्ष की लता के समान हैं, जो भक्तों के मन की हर इच्छा को पूरा करने की शक्ति रखती हैं। उनकी कृपा से भक्तों पर धन-धान्य की वर्षा होती है और दरिद्रता पूर्णतः नष्ट हो जाती है।
स्तोत्र में उल्लिखित मंत्र वेदों के मूल से आया है और अग्निदेव को प्रिय देवी की स्तुति करता है। गुरु की करुणा से इस मंत्र का प्रतिदिन भक्तिपूर्वक जप करने वाले भक्तों को दिव्य संपदा प्राप्त होती है और उनके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। देवी के चरण कमलों की सेवा में लीन साधक महा भवसागर को आसानी से पार कर लेते हैं और कीर्ति, प्रभाव तथा सौभाग्य प्राप्त करते हैं। देवी के जप, पूजा और ध्यान में गहराई से डूबा हुआ मनुष्य, चाहे वह कितना भी निर्धन या असहाय क्यों न हो, तीनों लोकों में प्रसिद्ध हो जाता है। अन्नपूर्णा माता का ध्यान और मंत्र जप करने वालों के घर धन-धान्य से भर जाते हैं।
जिस स्थान पर अन्नपूर्णा माता का मंत्र जप होता है, वहाँ "नहीं" शब्द के लिए कोई स्थान नहीं होता। उनकी ध्यान-संपदा से ही इंद्र, अग्नि, सोम, सूर्य, विष्णु जैसे देवताओं ने अपनी श्रेष्ठता प्राप्त की है। भक्त प्रार्थना करता है, "हे माँ, आपकी कृपा दृष्टि वर्षा की तरह मेरे जीवन पर बरसे।" उनके हाथ में दिव्य दर्वी और अन्नपात्र सदा दरिद्रता को दूर करते हैं, और उनकी दृष्टि अमृतधारा के समान दुखों को शांत करती है। उनका रूप हजारों सूर्यों के समान कांति से चमकता है। वे सृष्टि, स्थिति, लय को संचालित करने वाली एकमात्र शक्ति हैं – माया स्वरूपिणी, शंभु की पत्नी, जगन्माता। उनकी कृपा से अज्ञान का सागर-अग्नि भी शांत हो जाता है। गुरु के आशीर्वाद से देवी के तत्व को जानने वाला इस लोक में ऐश्वर्य और परलोक में मोक्ष प्राप्त करता है। उनकी चिंतन में लीन योगी योगरूपी अमृत का अनुभव करता है; उनकी दिव्य अमृत का पान करने वाला जीवनमुक्त हो जाता है।
अन्नपूर्णेश्वरी योगशक्ति के रूप में मूलाधार में निवास करती हैं और कुंडलिनी के रूप में ऊपर उठकर शंभु पद तक पहुँचती हैं। योगी उस शक्ति का ध्यान करके अपने अंतर्मन में देवी का दर्शन करता है। देवी का स्थूल रूप योगसिद्धि और सौभाग्य प्रदान करता है, जबकि उनका सूक्ष्म रूप समस्त जगत की रक्षा का मूल है। अन्नपूर्णा देवी दुर्गा, वाग्देवी, गिरिजा, त्रिपुरा, लक्ष्मी जैसे अनेक रूपों में प्रकट होती हैं। उनकी आराधना मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष – इन चार पुरुषार्थों को प्रदान करती है। वे अनेक रूपों की माता होने पर भी, मूलतः उनका रूप एक चित्स्वरूप है। इस स्तोत्र का अंतिम भाग भक्त की अचल भक्ति को दर्शाता है: "हे माँ अन्नपूर्णे, मेरी प्रार्थना से संतुष्ट होकर, मेरे घर को समृद्धि से भर दो और सदा मेरे हृदय में निवास करो।"
प्रयोजन (Benefits):
- दरिद्रता निवारण: अन्नपूर्णा देवी की कृपा से सभी गरीबी, ऋण और आर्थिक संकट दूर होते हैं तथा धन, धान्य और समृद्धि प्राप्त होती है।
- दुःख निवारण: जीवन के दुख, मानसिक क्लेश और अशांति दूर होते हैं, जिससे मन को शांति और सुकून मिलता है।
- मनोकामना सिद्धि: कल्पवृक्ष के समान, देवी भक्तों की सभी न्यायोचित इच्छाओं और मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं।
- आध्यात्मिक उन्नति: गुरु कृपा से देवी के तत्व को जानकर, उनके ध्यान और जप करने वालों को ज्ञान, योगसिद्धि और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- कीर्ति और सौभाग्य: देवी के भक्त समाज में सम्मान, प्रसिद्धि और उत्तम भाग्य प्राप्त करते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री अन्नपूर्णा स्तव क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री अन्नपूर्णा स्तव के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
श्री अन्नपूर्णा स्तव का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना उचित है?
श्री अन्नपूर्णा स्तव का मूल या इसकी पृष्ठभूमि क्या है?
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