श्री अन्नपूर्णा मंत्र स्तवः
श्री दक्षिणामूर्तिरुवाच |
अन्नपूर्णामनुं वक्ष्ये विद्याप्रत्यंगमीश्वरी |
यस्य श्रवणमात्रेण अलक्ष्मीर्नाशमाप्नुयात् || 1 ||
प्रणवं पूर्वमुच्चार्य मायां श्रियमथोच्चरेत् |
कामं नमः पदं प्रोक्तं पदं भगवतीत्यथ || 2 ||
माहेश्वरी पदं पश्चादन्नपूर्णेत्यथोच्चरेत् |
उत्तरे वह्निदयितां मंत्र एष उदीरितः || 3 ||
ऋषिः ब्रह्मास्य मंत्रस्य गायत्री छंद ईरितं |
अन्नपूर्णेश्वरीदेवी देवता प्रोच्यते बुधैः || 4 ||
मायाबीजं बीजमाहुः लक्ष्मीशक्तिरितीरिता |
कीलकं मदनं प्राहुर्मायया न्यासमाचरेत् || 5 ||
रक्तां विचित्रवासनां नवचंद्रजूटा-
-मन्नप्रदाननिरतां स्तनभारनम्रां |
अन्नप्रदाननिरतां नवहेमवस्त्रा-
-मंबां भजे कनकमौक्तिकमाल्यशोभां || 6 ||
नृत्यंतमिंदिशकलाभरणं विलोक्य
ह्यष्टां भजे भगवतीं भवदुःखहंत्रीं |
आदाय दक्षिणकरेण सुवर्णदर्पं
दुग्धान्नपूर्णमितरेण च रत्नपात्रं || 7 ||
एवं ध्यात्वा महादेवीं लक्षमेकं जपेन्मनुं |
दशांशमन्नं जुहुयान्मंत्रसिद्धिर्भविष्यति || 8 ||
एवं सिद्धस्य मंत्रस्य प्रयोगाच्छृणु पार्वति |
लक्षमेकं जपेन्मंत्रं सहस्रैकं हविर्हुनेत् || 9 ||
महतीं श्रियमाप्नोति कुबेरत्रयसन्निभां |
जप्त्वैकलक्षं मंत्रज्ञो हुनेदन्नं दशांशकं || 10 ||
तत्कुलेन्नसमृद्धिस्स्यादक्षय्यं नात्र संशयः |
अन्नं स्पृष्ट्वा जपेन्मंत्रं नित्यं वारचतुष्टयं || 11 ||
अन्नराशिमवाप्नोति स्वमलव्यापिनीमपि |
सहस्रं प्रजपेद्यस्तु मंत्रमेतं नरोत्तमः || 12
इह भोगान्यथाकामान्भुक्त्वांते मुक्तिमाप्नुयात् |
कुले न जायते तस्य दारिद्र्यं कलहावळिः || 13 ||
न कदाचिदवाप्नोति दारिद्र्यं परमेश्वरि |
पलाशपुष्पैर्हवनमयुतं यस्समाचरेत् || 14 ||
स लब्ध्वा महतीं कांतिं वशीकुर्याज्जगत्रयं |
पयसा हवनं मर्त्यो य आचरति काळिकः || 15 ||
तद्गेहे पशुवृद्धिस्स्याद्गावश्च बहुदुग्धदाः |
एवं मंत्रं जपेन्मर्त्यो न कदाचिल्लभेद्भयं || 16 ||
असौख्यमश्रियं दुःखं संशयो नात्र विद्यते |
हविष्येण हुनेद्यस्तु नियुतं मानवोत्तमः || 17 ||
सर्वान्कामानवाप्नोति दुर्लभानप्यसंशयः |
अन्नपूर्णाप्रयोगोयमुक्तो भक्तेष्टदायकः |
किमन्यदिच्छसि श्रोतुं भूयो मे वद पार्वति || 18 ||
इति श्रीमहात्रिपुरसिद्धांते अन्नपूर्णा मंत्रस्तवः |
अर्थ
श्री अन्नपूर्णा मंत्र स्तव एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली मंत्र रहस्य है, जिसका वर्णन स्वयं भगवान दक्षिणामूर्ति ने अपनी पत्नी पार्वती देवी को किया था। दक्षिणामूर्ति महादेव ने पार्वती से कहा कि मैं तुम्हें अन्नपूर्णा मंत्र का रहस्य बताता हूँ, जो विद्या, ऐश्वर्य और अन्न-संपदा का अधिपति है। इस मंत्र के मात्र श्रवण से ही दरिद्रता का नाश होता है। यह सिर्फ एक मंत्र नहीं, बल्कि जीवन में समृद्धि, ज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति लाने का एक दिव्य साधन है। यह स्तोत्र भक्तों को माता अन्नपूर्णा की कृपा प्राप्त करने का मार्ग दिखाता है, जिससे उनका जीवन सुखमय और पूर्ण हो जाता है।
इस मंत्र का उच्चारण इस प्रकार है: “ॐ माया श्री कां नमः भगवती माहेश्वरी अन्नपूर्णे वह्निदयिते”। मंत्र का प्रत्येक घटक गहन अर्थ रखता है। 'ॐ' प्रणव है, 'माया' दिव्य शक्ति और सृष्टि के मूल को दर्शाती है, 'श्री' समृद्धि और धन का प्रतीक है, और 'कां' कामबीज है जो इच्छाओं की पूर्ति की शक्ति को दर्शाता है। 'नमः' का अर्थ है नमस्कार, 'भगवती' दिव्य माँ को संबोधित करता है, 'माहेश्वरी' भगवान शिव की पत्नी पार्वती का रूप है, 'अन्नपूर्णे' अन्न की पूर्णता प्रदान करने वाली देवी हैं, और 'वह्निदयिते' का अर्थ अग्निदेव की प्रिया या अग्नि के समान शक्ति वाली है। इस मंत्र के ऋषि ब्रह्मा हैं, छंद गायत्री है, और अधिष्ठात्री देवी अन्नपूर्णेश्वरी हैं। 'माया' बीज है, 'लक्ष्मी' शक्ति है, और 'मदन' कीलक है। ये सभी घटक मंत्र की शक्ति को पूर्ण रूप से समझने और उसे सक्रिय करने में सहायक होते हैं।
देवी अन्नपूर्णा का ध्यान करते समय, उन्हें रक्तवर्ण वाली, सुनहरे वस्त्र धारण किए हुए, अर्धचंद्र से सुशोभित मुकुट वाली, और कनक-मोतियों की मालाओं से सुशोभित देखना चाहिए। वह अपने स्तन भार से नम्र होकर भक्तों को भोजन प्रदान करने के लिए तत्पर रहती हैं। उनके एक हाथ में दूध और अन्न से भरा स्वर्ण पात्र होता है, और दूसरे हाथ में दर्पण होता है, वे दिव्य कृपा के साथ नृत्य करती हुई सभी दुखों को दूर करती हैं। इस प्रकार ध्यान करने के बाद, मंत्र सिद्धि के लिए एक लाख (लक्ष) बार मंत्र का जप करना चाहिए। जप के बाद, जप संख्या के दसवें हिस्से का अग्निहोत्र (हवन) करने से मंत्र सिद्ध होता है। ऐसा करने वाले को कुबेर के समान धन और समृद्धि प्राप्त होती है।
इस मंत्र के अनुष्ठान से अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। प्रतिदिन भोजन पर चार बार इस मंत्र का जप करने से घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती और दरिद्रता कभी प्रवेश नहीं करती। भक्तगण जीवन में भोग (सुख) का अनुभव करते हैं और अंत में मोक्ष प्राप्त करते हैं। पलाश के फूलों से हवन करने वाला तेजस्वी बनता है, और पायस (दूध और चावल से बनी खीर) से हवन करने वाला पशु-संपत्ति प्राप्त करता है। इस मंत्र का निरंतर जप करने वाले को कभी भय, दुःख या अशुभ का सामना नहीं करना पड़ता। दस लाख (नियुत) की संख्या में हवन करने से मनुष्य अपनी सभी मनोकामनाओं को, यहाँ तक कि दुर्लभ इच्छाओं को भी पूर्ण कर सकता है। भगवान दक्षिणामूर्ति ने कहा कि भक्तों की सभी इच्छाओं को पूरा करने वाले इस अन्नपूर्णा मंत्र स्तव से बढ़कर कोई अन्य मंत्र रहस्य नहीं है।
लाभ (Benefits):
- दरिद्रता का नाश: इस मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करने से दरिद्रता दूर होती है और आर्थिक समृद्धि आती है।
- अन्न की प्रचुरता: प्रतिदिन भोजन पर मंत्र का जप करने से घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती और परिवार में संतोष बना रहता है।
- ऐश्वर्य और संपत्ति: मंत्र जप और दशांश हवन से कुबेर के समान धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
- मनोकामना पूर्ति: नियुत संख्या में हवन करने से सभी मनोकामनाएं, यहाँ तक कि अत्यंत दुर्लभ इच्छाएं भी पूर्ण होती हैं।
- भोग और मोक्ष: साधक जीवन में सभी सुखों का अनुभव करता है और अंततः आध्यात्मिक मोक्ष प्राप्त करता है।
- भय और दुःख से मुक्ति: इस मंत्र के निरंतर जप से भक्त सभी प्रकार के भय, दुःख और अशुभ प्रभावों से मुक्त होकर शांतिपूर्ण जीवन जीते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री अन्नपूर्णा मंत्र स्तव क्या है?
अन्नपूर्णा मंत्र का जप कब और कैसे करना चाहिए?
श्री अन्नपूर्णा मंत्र स्तव के जप से क्या लाभ मिलते हैं?
इस मंत्र का जप कौन कर सकता है?
अन्नपूर्णा मंत्र का कितनी बार जप करना चाहिए?
इस मंत्र स्तव का उद्गम क्या है?
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