श्री अन्नपूर्णा कवचं
द्वात्रिंशद्वर्णमंत्रोऽयं शंकरप्रतिभाषितः |
अन्नपूर्णा महाविद्या सर्वमंत्रोत्तमोत्तमा ||1||
पूर्वमुत्तरमुच्चार्य संपुटीकरणमुत्तमं |
स्तोत्रमंत्रस्य ऋषिर्ब्रह्मा छंदो त्रिष्टुबुदाहृतः ||2||
देवता अन्नपूर्णा च ह्रीं बीजमंबिका स्मृता |
स्वाहा शक्तिरिति ज्ञेयं भगवति कीलकं मतं ||3||
धर्माऽर्थ-काम-मोक्षेषु विनियोग उदाहृतः |
ॐ ह्रीं भगवति माहेश्वरि अन्नपूर्णायै स्वाहा |
सप्तार्णवमनुष्याणां जपमंत्रः समाहितः ||4||
अन्नपूर्णे इमं मंत्रं मनुसप्तदशाक्षरं |
सर्व संपत्प्रदो नित्यं सर्वविश्वकरी तथा ||5||
भुवनेश्वरीति विख्याता सर्वाऽभीष्टं प्रयच्छति |
हृल्लेखेयमिति ज्ञेयमोंकाराक्षररूपिणी ||6||
कांति-पुष्टि-धना-ऽऽरोग्य यशांसि लभते श्रियं |
अस्मिन् मंत्रे रतो नित्यं वशयेदखिलं जगत् ||7||
अंगन्यासः -- ॐ अस्य श्रीअन्नपूर्णामालामंत्रस्य ब्रह्मा ऋषये
नमः शिरसि | ॐ अन्नपूर्णादेवतायै नमः हृदये | ॐ ह्रीं बीजाय नमः
नाभौ | ॐ स्वाहा शक्तये नमः पादयोः | ॐ धर्मा-ऽर्थ-काम-मोक्षेषु
विनियोगाय नमः सर्वांगे |
करन्यासः -- ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः | ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां
नमः | ॐ ह्रँ मध्यमाभ्यां नमः | ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः |
ॐ ह्रीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः | ॐ ह्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः |
हृदयादिन्यासः -ॐ ह्रां हृदयाय नमः | ॐ ह्रीं शिरसे
स्वाहा | ॐ इह शिखायै वषट् | ॐ ह्रैं कवचाय हुं | ॐ ह्रौं
नेत्रत्रयाय वौषट् | ॐ ह्रः अस्त्राय फट् |
ध्यानं -
रक्तां विचित्रवसनां नवचंद्रचूडां
अन्नप्रदान-निरतां स्तनभारनम्रां |
नृत्यंतमिंदु सकलाभरणं विलोक्य
हृष्टां भजे भगवतीं भव-दुःख-हंत्रीं |
मालामत्रः -ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं नमो भगवति माहेश्वरि
अन्नपूर्णे ! ममाऽभिलषितमन्नं देहि स्वाहा |
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं मंदार-कल्प-हरिचंदन-पारिजात-मध्ये
शशांक-मणिमंडित-वेदिसंस्थे |
अर्धेंदु-मौलि-सुललाट-षडर्धनेत्रे भिक्षां
प्रदेहि गिरिजे! क्षुधिताय मह्यं क्लीं श्रीं ह्रीं ऐं ॐ ||1||
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं केयूर-हार-कनकांगदकर्णपूरे कांचीकलाप-
मणिकांति-लसद्दुकूले | दुग्धा-ऽन्नपात्र-वर-कांचन-दर्विहस्ते
भिक्षां प्रदेहि गिरिजे! क्षुधिताय मह्यं
ॐ क्लीं श्री ह्रीं ऐं ॐ ||2||
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं आली कदंबपरिसेवित-पार्श्वभागे
शक्रादिभिर्मुकुलितांजलिभिः पुरस्तात् | देवि! त्वदीयचरणौ शरणं
प्रपद्ये भिक्षां प्रदेहि गिरिजे! क्षुधिताय मह्यं
ॐ क्लीं श्रीं ह्रीं ऐं ॐ ||3||
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं गंधर्व-देवऋषि-नारद-कौशिकाऽत्रि-व्यासा-
ऽम्वरीष-कलशोद्भव-कश्यपाद्याः |
भक्त्या स्तुवंति निगमा-ऽऽगम-सूक्त-
मंत्रैर्भिक्षा प्रदेहि गिरिजे! क्षुधिताय मह्यं क्लीं
ॐ श्रीं ह्रीं ऐं ॐ ||4||
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं लीलावचांसि तव देवि! ऋगादिवेदाः
सृष्ट्यादिकर्मरचना भवदीयचेष्टा | त्वत्तेजसा जगदिदं प्रतिभाति
नित्यं भिक्षां प्रदेहि गिरिजे! क्षुधिताय मह्यं क्लीं श्रीं ह्रीं ऐं ॐ ||5||
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं शब्दात्मिके शशिकलाभरणार्धदेहे शंभो-
रुरस्थल-निकेतननित्यवासे | दारिद्र्य-दुःखभयहारिणि का त्वदन्या
भिक्षां प्रदेहि गिरिजे ! क्षुधिताय मह्यं क्लीं श्रीं ऐं ॐ ||6||
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं संध्यात्रये सकलभूसुरसेव्यमाने स्वाहा स्वधासि
पितृदेवगणार्तिहंत्री | जाया सुताः परिजनातिथयोऽन्नकामाः भिक्षां
प्रदेहि गिरिजे! क्षुधिताय मह्यं क्लीं श्रीं ह्रीं ऐं ॐ ||7||
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सद्भक्तकल्पलतिके भुवनं कवंद्ये भूतेश-
हृत्कमलमग्न-कुचाग्रभृंगे |
कारुण्यपूर्णनयने किमुपेक्षसे मां भिक्षां
प्रदेहि गिरजे क्षुधिताय मह्यं क्लीं श्रीं ह्रीं ऐं ॐ ||8||
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं अंब! त्वदीय-चरणांबुज-संश्रयेण ब्रह्मादयो-
ऽप्यविकलां श्रियमाश्रयंते | तस्मादहं तव नतोऽस्मि पदारविंदे
भिक्षां प्रदेहि गिरिजे! क्षुधिताय मह्यं क्लीं श्रीं ह्रीं ऐं ॐ ||9||
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं एकाग्रमूलनिलयस्य महेश्वरस्य प्राणेश्वरि!
प्रणत-भक्तजनाय शीघ्रं | कामाक्षि-रक्षित-जगत्-त्रितयेऽन्नपूर्णे
भिक्षां प्रदेहि गिरिजे! क्षुधिताय मह्यं क्लीं श्रीं ह्रीं ऐं ॐ ||10||
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं भक्त्या पठंति गिरिजादशकं प्रभाते
मोक्षार्थिनो बहुजनाः प्रथितान्नकामाः | प्रीता महेशवनिता हिमशैल-
कन्या तेषां ददाति सुतरां मनसेप्सितानि क्लीं श्रीं ह्रीं ऐं ॐ ||11||
इति श्रीशंकराचार्यविरचितमन्नपूर्णाकवचं समाप्तं |
अर्थ
श्री अन्नपूर्णा कवचम् महाशक्ति अन्नपूर्णेश्वरी को समर्पित एक शक्तिशाली रक्षात्मक स्तोत्र है, जिसकी रचना भगवान शंकर ने की थी। यह द्वात्रिंशदक्षर मंत्र के रूप में 'अन्नपूर्णा महाविद्या' के नाम से प्रसिद्ध है और इसे सभी मंत्रों में उत्तम माना जाता है। इस कवच के ऋषि ब्रह्मा, छंद त्रिष्टुभ्, देवता अन्नपूर्णेश्वरी, बीज 'ह्रीं', शक्ति 'स्वाहा' और कीलक 'भगवती' कहे गए हैं। इस कवच का मुख्य प्रयोजन धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति कराना है, जिससे भक्त भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की समृद्धि प्राप्त कर सकें।
इस कवच का मूल मंत्र 'ॐ ह्रीं भगवति माहेश्वरी अन्नपूर्णायै स्वाहा' है। इस मंत्र का नित्य जाप करने से समस्त संपदा, उत्तम स्वास्थ्य, यश और धन-धान्य की प्रचुरता प्राप्त होती है। जो भक्त इस मंत्र में लीन रहते हैं, वे संपूर्ण जगत को अपने वश में करने की क्षमता प्राप्त करते हैं। देवी का ध्यान स्वरूप रक्तवर्ण का है, उनके मस्तक पर नवचंद्रमा का मुकुट है, वे अन्न प्रदान करती हुई, सभी आभूषणों से सुसज्जित होकर नृत्य करती हुई शोभायमान होती हैं, और भव-दुःखों का नाश करती हैं। इस रूप का ध्यान करने से भक्तों को मानसिक शांति और आध्यात्मिक बल मिलता है।
माला मंत्र के भाग में, देवी को चंद्रकला से सुशोभित मुकुट धारण किए हुए, स्वर्ण कलश (दर्वी) और खीर के पात्र को हाथों में लिए हुए माँ के रूप में वर्णित किया गया है। यह प्रार्थना की जाती है कि हे श्रीमान शंभु की प्रिया गिरिजा, नित्य अन्नदान करने वाली माँ, मुझे भिक्षा दो, मेरी भूख को शांत करो, और मेरे हृदय में करुणा बरसाओ। गंधर्वों, ऋषियों, नारद, व्यास आदि मुनियों द्वारा स्तुत यह देवी अपनी शक्ति से ही सृष्टि, स्थिति और लय के कार्यों को संचालित करती हैं। शिव की अर्धांगिनी होने के नाते, वे दरिद्रता, भय और दुःखों का हरण करती हैं। इस संसार के लिए तुम्हारे अतिरिक्त और कौन दत्तक माँ हो सकती है?
समस्त प्राणी और देवता भी तुम्हारे अन्न-अनुग्रह की कामना करते हैं। जो भक्त तुम्हारी श्रद्धा रखते हैं, उन्हें तुम धन-धान्य की समृद्धि प्रदान करती हो। ब्रह्मादि देवताओं को भी तुम ही श्रेय प्रदान करने वाली हो। जो भक्त तुम्हारी शरण में आता है, उसे कभी किसी वस्तु का अभाव नहीं होता। हे महेश्वर की प्राणेश्वरी, कामाक्षी, जगत् की रक्षक! इन दस श्लोकों (दशश्लोक) का भक्तिपूर्वक पाठ करने वालों को केवल भोजन और धन-समृद्धि ही नहीं, बल्कि मोक्ष का मार्ग भी प्राप्त होता है। अन्नपूर्णा माता प्रसन्न होकर उनके सभी मनोरथों को पूर्ण करती हैं। यह कवच ज्ञान, धन-धान्य की समृद्धि, दरिद्रता निवारण और भक्ति के लिए एक सुरक्षा कवच के समान है। इसे भक्तिपूर्वक पाठ करने वालों को अन्नदात्री माँ अन्नपूर्णेश्वरी सदैव आश्रय प्रदान करती हैं। वे शरण में आए सभी भक्तों को भौतिक और आध्यात्मिक भोजन – अन्न और ज्ञान दोनों – प्रदान करती हैं।
लाभ (Benefits):
- समस्त संपदा और समृद्धि: इस कवच का पाठ करने से भक्तों को धन, धान्य, उत्तम स्वास्थ्य और यश की प्राप्ति होती है।
- दरिद्रता निवारण: अन्नपूर्णा देवी की कृपा से सभी प्रकार की दरिद्रता, भय और दुख दूर होते हैं।
- आध्यात्मिक उन्नति: भौतिक सुखों के साथ-साथ, यह कवच मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है और आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करता है।
- सभी मनोकामनाओं की पूर्ति: अन्नपूर्णा माता प्रसन्न होकर भक्तों की सभी इच्छाओं और मनोरथों को पूर्ण करती हैं।
- सर्व रक्षा: यह एक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है, जो भक्तों को नकारात्मक शक्तियों और कठिनाइयों से बचाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री अन्नपूर्णा कवचम् क्या है?
इस कवच का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री अन्नपूर्णा कवचम् के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
इस कवच का पाठ किसे करना चाहिए?
इस कवच का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री अन्नपूर्णा कवचम् का उद्गम या स्रोत क्या है?
टिप्पणियाँ
टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें
टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...
