- ॐ अनंताय नमः
- ॐ वासुदेवाख्याय नमः
- ॐ तक्षकाय नमः
- ॐ विश्वतोमुखाय नमः
- ॐ कार्कोटकाय नमः
- ॐ महापद्माय नमः
- ॐ पद्माय नमः
- ॐ शंखाय नमः
- ॐ शिवप्रियाय नमः
- ॐ धृतराष्ट्राय नमः 10
- ॐ शंखपालाय नमः
- ॐ गुलिकाय नमः
- ॐ इष्टदायिने नमः
- ॐ नागराजाय नमः
- ॐ पुराणपुरूषाय नमः
- ॐ अनघाय नमः
- ॐ विश्वरूपाय नमः
- ॐ महीधारिणे नमः
- ॐ कामदायिने नमः
- ॐ सुरार्चिताय नमः 20
- ॐ कुंदप्रभाय नमः
- ॐ बहुशिरसे नमः
- ॐ दक्षाय नमः
- ॐ दामोदराय नमः
- ॐ अक्षराय नमः
- ॐ गणाधिपाय नमः
- ॐ महासेनाय नमः
- ॐ पुण्यमूर्तये नमः
- ॐ गणप्रियाय नमः
- ॐ वरप्रदाय नमः 30
- ॐ वायुभक्षाय नमः
- ॐ विश्वधारिणे नमः
- ॐ विहंगमाय नमः
- ॐ पुत्रप्रदाय नमः
- ॐ पुण्यरूपाय नमः
- ॐ पन्नगेशाय नमः
- ॐ बिलेशयाय नमः
- ॐ परमेष्ठिने नमः
- ॐ पशुपतये नमः
- ॐ पवनाशिने नमः 40
- ॐ बलप्रदाय नमः
- ॐ दैत्यहंत्रे नमः
- ॐ दयारूपाय नमः
- ॐ धनप्रदाय नमः
- ॐ मतिदायिने नमः
- ॐ महामायिने नमः
- ॐ मधुवैरिणे नमः
- ॐ महोरगाय नमः
- ॐ भुजगेशाय नमः
- ॐ भूमरूपाय नमः 50
- ॐ भीमकायाय नमः
- ॐ भयापहृते नमः
- ॐ शुक्लरूपाय नमः
- ॐ शुद्धदेहाय नमः
- ॐ शोकहारिणे नमः
- ॐ शुभप्रदाय नमः
- ॐ संतानदायिने नमः
- ॐ सर्पेशाय नमः
- ॐ सर्वदायिने नमः
- ॐ सरीसृपाय नमः 60
- ॐ लक्ष्मीकराय नमः
- ॐ लाभदायिने नमः
- ॐ ललिताय नमः
- ॐ लक्ष्मणाकृतये नमः
- ॐ दयाराशये नमः
- ॐ दाशरथये नमः
- ॐ दमाश्रयाय नमः
- ॐ रम्यरूपाय नमः
- ॐ रामभक्ताय नमः
- ॐ रणधीराय नमः 70
- ॐ रतिप्रदाय नमः
- ॐ सौमित्रये नमः
- ॐ सोमसंकाशाय नमः
- ॐ सर्पराजाय नमः
- ॐ सतांप्रियाय नमः
- ॐ कर्बुराय नमः
- ॐ काम्यफलदाय नमः
- ॐ किरीटिने नमः
- ॐ किन्नरार्चिताय नमः
- ॐ पातालवासिने नमः 80
- ॐ परमाय नमः
- ॐ फणामंडलमंडिताय नमः
- ॐ बाहुलेयाय नमः
- ॐ भक्तनिधये नमः
- ॐ भूमिधारिणे नमः
- ॐ भवप्रियाय नमः
- ॐ नारायणाय नमः
- ॐ नानारूपाय नमः
- ॐ नतप्रियाय नमः
- ॐ काकोदराय नमः 90
- ॐ काम्यरूपाय नमः
- ॐ कल्याणाय नमः
- ॐ कामितार्थदाय नमः
- ॐ हतासुराय नमः
- ॐ हल्यहीनाय नमः
- ॐ हर्षदाय नमः
- ॐ हरभूषणाय नमः
- ॐ जगदादये नमः
- ॐ जराहीनाय नमः
- ॐ जातिशून्याय नमः 100
- ॐ जगन्मयाय नमः
- ॐ वंध्यात्वदोषशमनाय नमः
- ॐ वरपुत्रफलप्रदाय नमः
- ॐ बलभद्ररूपाय नमः
- ॐ श्रीकृष्णपूर्वजाय नमः
- ॐ विष्णुतल्पाय नमः
- ॐ बल्वलध्नाय नमः
- ॐ भूधराय नमः 108
|| इति श्री नागराजाष्टोत्तरशतनामावलिः संपूर्णं ||
अर्थ
श्री नागराज अष्टोत्तरशतनामावलिः दिव्य सर्पों के राजा, नागराज को समर्पित 108 पवित्र नामों का एक स्तोत्र है। हिंदू धर्म में सर्पों को विशेष स्थान प्राप्त है; वे सृष्टि, स्थिति और संहार के प्रतीक माने जाते हैं। यह नामावलि अनंत, वासुकी, तक्षक, कर्कोटक जैसे प्रमुख नाग देवताओं की शक्ति और गुणों की स्तुति करती है। यह स्तोत्र नाग देवताओं की कृपा प्राप्त करने और सभी दोषों से मुक्ति पाने का एक अत्यंत शक्तिशाली माध्यम है।
हिंदू संस्कृति में, नाग केवल प्राणी नहीं हैं, बल्कि दिव्य शक्तियों के प्रतीक हैं। वे भगवान विष्णु के शयन के रूप में अनंत (शेषनाग), भगवान शिव के आभूषण के रूप में वासुकी, और सागर मंथन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नाग के रूप में पूजे जाते हैं। नागराज अष्टोत्तरशतनामावलि का पाठ करने से कुंडलिनी शक्ति की जागृति, प्रकृति के साथ सामंजस्य और कालचक्र की समझ विकसित होती है। यह न केवल भौतिक सुरक्षा प्रदान करता है, बल्कि आध्यात्मिक उत्थान भी करता है।
इस नामावलि का प्रत्येक नाम नागराज के एक विशेष गुण या शक्ति को दर्शाता है। 'ॐ अनंताय नमः' आदिशेष की अखंडता और अनंतता को इंगित करता है। 'ॐ महीधारिणे नमः' पृथ्वी को धारण करने की उनकी क्षमता को व्यक्त करता है। 'ॐ कामदायिने नमः' भक्तों की इच्छाओं को पूरा करने की उनकी दयालुता को दर्शाता है। 'ॐ शिवप्रियाय नमः' भगवान शिव के प्रिय होने के उनके स्थान को उजागर करता है। ये नाम नागराज की सर्वव्यापकता, सुरक्षात्मक शक्ति और भक्तों के प्रति उनके वात्सल्य को स्पष्ट करते हैं। वे नाग देवताओं के विभिन्न रूपों, कार्यों और दिव्य गुणों का स्मरण कराकर भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
लाभ (Benefits):
- सर्प दोष निवारण: कुंडली में मौजूद सर्प दोष, कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं।
- सुरक्षा और निर्भयता: सर्पों से होने वाले भय और आकस्मिक खतरों से सुरक्षा मिलती है। यह मानसिक शांति और साहस प्रदान करता है।
- संतान प्राप्ति: संतानहीन दंपत्तियों को नागदेव की कृपा से संतान सुख प्राप्त होता है, ऐसी मान्यता है।
- समृद्धि और ऐश्वर्य: नागदेवता धन और समृद्धि के अधिपति माने जाते हैं, इसलिए इस नामावलि का पाठ करने से धन-संपत्ति में वृद्धि होती है।
- स्वास्थ्य और दीर्घायु: नागदेव के आशीर्वाद से उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री नागराज अष्टोत्तरशतनामावलिः क्या है?
इस नामावलि का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
नागराज अष्टोत्तरशतनामावलि के पाठ के मुख्य लाभ क्या हैं?
यह स्तोत्र किसे पढ़ना चाहिए?
इस नामावलि का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल या उद्गम क्या है?
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