सकट चौथ माघ महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को रखा जाने वाला व्रत है, जिसे माताएँ संतान की लंबी उम्र और संकटों से रक्षा के लिए करती हैं। दिन भर निर्जल या फलाहार व्रत रखा जाता है, शाम को गणेश जी और सकट माता की पूजा होती है, तिलकुट का भोग लगता है और रात में चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है।
सकट चौथ कब: माघ कृष्ण चतुर्थी
उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में यह माघ कृष्ण चतुर्थी है। जो पंचांग अमावस्या पर महीना बदलते हैं, उनमें यही तिथि पौष कृष्ण चतुर्थी कहलाती है, इसलिए गुजरात-महाराष्ट्र के कैलेंडर देखकर उलझन में न पड़ें। साल की चौबीस संकष्टी चतुर्थियों में यह सबसे बड़ी मानी जाती है और इसे लंबोदर संकष्टी भी कहते हैं। अलग-अलग इलाकों में इसके नाम हैं: सकट चौथ, तिलकुट चौथ, तिलवा चौथ, संकट चौथ और माघी चौथ।
नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार 2026 में यह 6 जनवरी को थी और 2027 में 25 जनवरी को है। चंद्रोदय का समय और पूजा मुहूर्त हर साल सकट चौथ पृष्ठ पर देखें। हर महीने की संकष्टी की सूची संकष्टी चतुर्थी कैलेंडर में है।
पूजा सामग्री
सकट की पूजा सादी होती है, ज़्यादातर चीज़ें रसोई में ही मिल जाती हैं:
- गणेश जी की छोटी मूर्ति या तस्वीर, लकड़ी की चौकी, लाल या पीला कपड़ा
- रोली, हल्दी, अक्षत (साबुत चावल), मौली, जनेऊ, सुपारी
- दूर्वा (दूब) की 21 गाँठें और लाल फूल
- सफेद तिल, गुड़ या चीनी — तिलकुट बनाने के लिए
- उबली शकरकंद, जहाँ यह रिवाज है; कई घरों में गाजर, बेर और गन्ना भी रखते हैं
- घी का दीपक, धूप, कपूर
- चंद्र अर्घ्य के लिए लोटा, जिसमें जल, थोड़ा दूध, तिल और अक्षत
- कलश, और कथा के समय हाथ में लेने के लिए तिल-चावल
अगर दूर्वा न मिले तो गणेश जी को लाल फूल और अक्षत से पूजा पूरी मानी जाती है। शकरकंद न हो तो तिलकुट ही मुख्य भोग है, उसकी जगह कुछ नहीं चाहिए।
तिलकुट और तिल का बकरा काटने की रस्म
तिलकुट बनाने के लिए सफेद तिल को हल्का भूनकर ठंडा करें और गुड़ के साथ ओखली या मिक्सी में कूट लें। कुछ घरों में इसमें खोया या घी भी मिलाते हैं। इसी कुटे हुए तिल से छोटे लड्डू बनते हैं, और कई घरों में इसका एक "बकरा" भी बनाया जाता है।
पश्चिमी और मध्य यूपी, दिल्ली और हरियाणा के कई परिवारों में पूजा के बाद घर का बेटा या देवर तिलकुट के इस बकरे को दूब की तिनकी, चाँदी के सिक्के या चाकू से "काटता" है। फिर उसके टुकड़े प्रसाद के रूप में सबको बाँटे जाते हैं। बुज़ुर्ग इसे बलि की पुरानी प्रथा की जगह सात्विक प्रतीक बताते हैं। यह रस्म हर इलाके में नहीं होती; पूर्वांचल और बिहार में आम तौर पर तिलकुट के लड्डू और तिल-गुड़ का भोग ही लगता है। अपने घर की रीति ही निभाएँ।
सकट चौथ पूजा विधि
- सुबह संकल्प: स्नान के बाद गणेश जी के सामने हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर बोलें कि "मैं अपनी संतान की रक्षा और सुख के लिए सकट चौथ का व्रत रख रही हूँ"।
- दिन भर व्रत: परंपरा में निर्जल व्रत है। जिनकी तबीयत साथ न दे, वे पानी या फलाहार ले सकती हैं; कई घरों में बुज़ुर्ग खुद यह छूट देते हैं।
- शाम की तैयारी: सूर्यास्त के बाद चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर गणेश जी और कलश स्थापित करें। कुछ घरों में दीवार या थाली पर गेरू-हल्दी से सकट माता का चित्र बनाया जाता है।
- पूजा: गणेश जी को रोली, अक्षत, जनेऊ, दूर्वा, फूल चढ़ाएँ। तिलकुट, शकरकंद और फल का भोग लगाएँ।
- कथा: हाथ में तिल-चावल लेकर सकट चौथ व्रत कथा सुनें। सबसे प्रचलित कथा कुम्हार के आँवे और बुढ़िया के बेटे की है: बलि के लिए आँवे में बैठाया गया बालक माँ के सकट व्रत के प्रताप से सुरक्षित निकल आया। कुछ घरों में साथ में संकष्टी चतुर्थी की कथा भी पढ़ी जाती है।
- आरती: जय गणेश जय गणेश देवा की आरती करें। समय हो तो गणेश चालीसा का पाठ भी करें।
- चंद्रोदय की प्रतीक्षा: इसके बाद चाँद निकलने तक का इंतज़ार होता है, जो इस मौसम में रात देर से होता है और कोहरे में कभी-कभी दिखता भी नहीं।
चंद्र अर्घ्य और पारण
चाँद दिखने पर लोटे में जल, थोड़ा दूध, तिल और अक्षत लेकर चंद्रमा को अर्घ्य दें और मन में संतान की कुशलता की प्रार्थना करें। कई महिलाएँ "ॐ सोमाय नमः" बोलती हैं। अर्घ्य के बाद गणेश जी का भोग लगा तिलकुट और शकरकंद खाकर व्रत खोला जाता है। फिर सामान्य भोजन किया जाता है, जिसमें अक्सर तिल की चीज़ें ही रहती हैं।
उत्तर भारत में जनवरी की रातों में घना कोहरा आम है। अगर चंद्रोदय के समय चाँद न दिखे, तो पंचांग में दिए चंद्रोदय समय के बाद उसी दिशा में मुँह करके अर्घ्य दे सकते हैं। यह परंपरा में मान्य है।
संतान के लिए व्रत के नियम
- व्रत वाले दिन किसी से कड़वी बात न करें; यह व्रत संकट हरने का है, मन शांत रखें।
- तिल इस दिन का मुख्य अन्न है, इसलिए दान में भी तिल-गुड़ दें।
- पहली बार व्रत रख रही हैं तो घर की बड़ी महिलाओं से पूजा का क्रम एक बार समझ लें, क्योंकि हर कुल की छोटी-छोटी रीतियाँ अलग होती हैं।
- गर्भवती महिलाएँ और बीमार व्यक्ति निर्जल व्रत न रखें; पूजा और कथा से ही व्रत का भाव पूरा होता है।
- कई परिवारों में बेटे और बेटी दोनों के लिए यह व्रत रखा जाता है। माँ के न रहने पर दादी या बड़ी बहन भी इसे निभाती हैं।
- जो महिलाएँ हर महीने की संकष्टी रखती हैं, वे अक्सर सकट चौथ से ही यह व्रत शुरू करती हैं और कुछ साल बाद इसी तिथि पर उद्यापन करती हैं।

