राम नवमी चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को आती है, चैत्र नवरात्रि का आख़िरी दिन। इस दिन घरों और मंदिरों में भगवान श्रीराम का जन्मोत्सव मनाया जाता है, और यह उत्सव सुबह या रात को नहीं, ठीक दोपहर को होता है। 2026 में राम नवमी 26 मार्च को थी और 2027 में यह 15 अप्रैल को है। मध्याह्न मुहूर्त का सटीक समय हर साल राम नवमी पृष्ठ पर दिया जाता है।
मध्याह्न में राम जन्म
वाल्मीकि रामायण के बालकांड में लिखा है कि श्रीराम का जन्म चैत्र मास की नवमी को, पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न में हुआ, जब पाँच ग्रह उच्च के थे। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में इसी क्षण को इन पंक्तियों में बाँधा है:
नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता॥ मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा॥
यानी पवित्र मधुमास (चैत्र) की शुक्ल नवमी, भगवान को प्रिय अभिजित मुहूर्त, दिन का मध्य भाग, न ज़्यादा ठंड, न धूप। इसीलिए राम नवमी की मुख्य पूजा मध्याह्न में होती है। जिस साल नवमी तिथि दोपहर को न मिले या दो दिन पड़े, उस साल पंचांग देखकर वही दिन चुना जाता है जिसके मध्याह्न में नवमी हो। वैष्णव संप्रदाय कभी-कभी स्मार्त परंपरा से एक दिन अलग मनाते हैं; अपने मंदिर या कुल की परंपरा मानें।
सामग्री
- श्रीराम दरबार की तस्वीर या बाल राम (राम लला) की छोटी मूर्ति
- छोटा पालना या झूला, उसके लिए पीला या लाल कपड़ा और फूलों की सजावट
- पंचामृत: दूध, दही, घी, शहद और शक्कर
- गंगाजल, साफ़ पानी, लोटा
- पीले वस्त्र, मुकुट या छोटी पगड़ी, फूलमाला
- चंदन, रोली, अक्षत, पीले फूल, तुलसी दल
- धूप, घी का दीपक, कपूर, शंख, घंटी
- भोग: धनिये की पंजीरी, खीर, फल, केला, पंचामृत, मिठाई
- रामचरितमानस या सुंदरकांड की पुस्तक
कुछ न मिले तो: पालना न हो तो एक साफ़ थाली में कपड़ा बिछाकर बाल राम को उस पर रखें। मूर्ति न हो तो तस्वीर पर ही फूल और तुलसी चढ़ाकर पूजा पूरी करें। पंजीरी न बनी हो तो गुड़-चना या मिश्री का भोग भी उतना ही मान्य है।
राम नवमी पूजा विधि
- सुबह स्नान करके घर और पूजा स्थान साफ़ करें, द्वार पर आम के पत्तों का बंदनवार लगाएँ। व्रत रखना हो तो हाथ में जल लेकर संकल्प लें।
- चैत्र नवरात्रि चल रही है, इसलिए सुबह पहले माँ सिद्धिदात्री की पूजा, हवन और कन्या पूजन करें। इसकी विधि कन्या पूजन विधि में है।
- दोपहर से पहले चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर राम दरबार की तस्वीर रखें और पालना सजाएँ।
- मध्याह्न मुहूर्त शुरू होने से थोड़ा पहले परिवार इकट्ठा हो जाए। गणेश जी का ध्यान करके दीपक जलाएँ।
- ठीक जन्म के समय शंख बजाएँ, घंटी बजाएँ और "भए प्रगट कृपाला दीनदयाला" का पाठ या गायन करें।
- बाल राम को पहले जल, फिर पंचामृत, फिर शुद्ध जल से स्नान कराएँ और पोंछकर पीले वस्त्र और मुकुट पहनाएँ।
- चंदन, रोली, अक्षत, पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें। तुलसी के बिना भगवान विष्णु के अवतार का भोग अधूरा माना जाता है।
- बाल राम को पालने में बिठाकर झुलाएँ, फूल बरसाएँ और सोहर गाएँ।
- पंजीरी, खीर, फल और पंचामृत का भोग लगाएँ, हर भोग में एक तुलसी पत्ता रखें।
- श्री राम जी की आरती करें और फिर हनुमान जी को भी प्रणाम करें, क्योंकि राम पूजा उनके बिना पूरी नहीं मानी जाती।
- पंचामृत और प्रसाद पूरे परिवार और पड़ोस में बाँटें।
पालना और सोहर
राम नवमी असल में एक घर में बच्चे के जन्म जैसा उत्सव है। अवध, बनारस और भोजपुर के इलाक़े में जन्म के समय महिलाएँ सोहर गाती हैं, वही बधाई गीत जो घर में बेटा या बेटी होने पर गाए जाते हैं: "अवध में आनंद भयो, जय रघुबर लाल की"। मंदिरों में पालना झुलाने के लिए लाइन लगती है। बच्चों को इस दिन राम के बाल रूप की कहानियाँ सुनाएँ; तुलसीदास का भजन ठुमक चलत रामचंद्र बच्चों के साथ गाने के लिए बहुत सुंदर है। शाम को कई घरों में श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन का पाठ होता है।
रामचरितमानस पाठ
राम नवमी से जुड़ी सबसे प्यारी परंपरा "नवाह्न पारायण" है: चैत्र प्रतिपदा से पूरी रामचरितमानस को नौ हिस्सों में बाँटकर रोज़ एक हिस्सा पढ़ा जाता है और नवमी को पाठ पूरा होता है। इतना समय न हो तो:
- केवल बालकांड का राम जन्म वाला प्रसंग नवमी की दोपहर पढ़ें।
- या सुंदरकांड का पाठ करें, जिसमें लगभग डेढ़-दो घंटे लगते हैं।
- या परिवार के साथ बैठकर 108 बार "श्री राम जय राम जय जय राम" का जप करें।
कई मोहल्लों में राम नवमी पर अखंड रामायण पाठ होता है, जो 24 घंटे चलता है और बारी-बारी से लोग पढ़ते हैं।
राम नवमी व्रत
राम नवमी का व्रत ज़्यादातर फलाहारी होता है। अनाज, नमक (सेंधा नमक चलता है), प्याज़ और लहसुन नहीं लिए जाते। कुछ लोग जन्मोत्सव और भोग के बाद दोपहर में ही प्रसाद लेकर व्रत खोल देते हैं, जबकि कई परिवार अगले दिन दशमी को पारण करते हैं। जो लोग नवरात्रि के नौ व्रत रख रहे हैं, वे आम तौर पर कन्या पूजन के बाद उसी दिन पारण कर लेते हैं।
अयोध्या में राम नवमी
अयोध्या में राम नवमी का अपना ही रंग है। सुबह से सरयू में स्नान करने वालों की भीड़ रहती है, फिर लोग हनुमानगढ़ी, कनक भवन और श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के दर्शन करते हैं। जन्मभूमि मंदिर में दोपहर को सूर्य की किरणें दर्पण और लेंस की व्यवस्था से राम लला के माथे पर तिलक की तरह पड़ती हैं, जिसे "सूर्य तिलक" कहते हैं और देश भर में लोग इसे टीवी पर देखते हैं। इस दिन भीड़ बहुत ज़्यादा होती है और दर्शन, पास और रास्तों की व्यवस्था हर साल बदलती है, इसलिए जाने से पहले मंदिर ट्रस्ट और ज़िला प्रशासन की ताज़ा सूचना ज़रूर देखें। यात्रा की तैयारी के लिए अयोध्या राम मंदिर दर्शन गाइड पढ़ें।

