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श्री शिवकेशव स्तुतिः (यम कृतं)

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स्तोत्रशिव
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श्री शिवकेशव स्तुतिः (यम कृतं)

ध्यानं |
माधवोमाधवावीशौ सर्वसिद्धिविहायिनौ |
वंदे परस्परात्मानौ परस्परनुतिप्रियौ ||

स्तोत्रं |
गोविंद माधव मुकुंद हरे मुरारे
शंभो शिवेश शशिशेखर शूलपाणे |
दामोदराऽच्युत जनार्दन वासुदेव
त्याज्याभटाय इति संततमामनंति || 1

गंगाधरांधकरिपो हर नीलकंठ
वैकुंठकैटभरिपो कमठाब्जपाणे |
भूतेश खंडपरशो मृड चंडिकेश
त्याज्याभटाय इति संततमामनंति || 2

विष्णो नृसिंह मधुसूदन चक्रपाणे
गौरीपते गिरिश शंकर चंद्रचूड |
नारायणाऽसुरनिबर्हण शार्ङ्गपाणे
त्याज्याभटाय इति संततमामनंति || 3

मृत्युंजयोग्र विषमेक्षण कामशत्रो
श्रीकंठ पीतवसनांबुदनीलशौरे |
ईशान कृत्तिवसन त्रिदशैकनाथ
त्याज्याभटाय इति संततमामनंति || 4

लक्ष्मीपते मधुरिपो पुरुषोत्तमाद्य
श्रीकंठ दिग्वसन शांत पिनाकपाणे |
आनंदकंद धरणीधर पद्मनाभ
त्याज्याभटाय इति संततमामनंति || 5

सर्वेश्वर त्रिपुरसूदन देवदेव
ब्रह्मण्यदेव गरुडध्वज शंखपाणे |
त्र्यक्षोरगाभरण बालमृगांकमौळे
त्याज्याभटाय इति संततमामनंति || 6

श्रीराम राघव रमेश्वर रावणारे
भूतेश मन्मथरिपो प्रमथाधिनाथ |
चाणूरमर्दन हृषीकपते मुरारे
त्याज्याभटाय इति संततमामनंति || 7

शूलिन् गिरीश रजनीशकळावतंस
कंसप्रणाशन सनातन केशिनाश |
भर्ग त्रिनेत्र भव भूतपते पुरारे
त्याज्याभटाय इति संततमामनंति || 8

गोपीपते यदुपते वसुदेवसूनो
कर्पूरगौर वृषभध्वज फालनेत्र |
गोवर्धनोद्धरण धर्मधुरीण गोप
त्याज्याभटाय इति संततमामनंति || 9

स्थाणो त्रिलोचन पिनाकधर स्मरारे
कृष्णाऽनिरुद्ध कमलाकर कल्मषारे |
विश्वेश्वर त्रिपथगार्द्रजटाकलाप
त्याज्याभटाय इति संततमामनंति || 10

अष्टोत्तराधिकशतेन सुचारुनाम्नां
संधर्भितां ललितरत्नकदंबकेन |
सन्नामकां दृढगुणां द्विजकंठगां यः
कुर्यादिमां स्रजमहो स यमं न पश्येत् || 11

इति यमकृत श्री शिवकेशव स्तुतिः  |

अर्थ

"श्री शिवकेशव स्तुति" यमराज द्वारा रचित एक अद्भुत स्तोत्र है, जो भगवान शिव और भगवान केशव (विष्णु) के एकात्म स्वरूप का गुणगान करता है। यह स्तोत्र इस गहन आध्यात्मिक सत्य को उजागर करता है कि यद्यपि वे विभिन्न नामों और रूपों में प्रकट होते हैं, तात्विक रूप से वे एक ही परब्रह्म के दो स्वरूप हैं। यह भक्ति और ज्ञान से परिपूर्ण स्तोत्र सनातन धर्म के अद्वैत दर्शन का एक सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है, जो सांप्रदायिक मतभेदों को मिटाकर दिव्य एकता को स्थापित करता है।

इस स्तोत्र का मूल भाव यह है कि शिव और विष्णु एक दूसरे के पूरक हैं, और वे एक दूसरे की महिमा को सहर्ष स्वीकार करते हुए परस्पर पूर्णता भरते हैं। प्रत्येक श्लोक में विष्णु के नाम जैसे गोविन्द, माधव, मुकुन्द, नारायण आदि शिव के नामों जैसे शम्भो, शिवेश, गंगाधर, नीलकण्ठ, पिनाकपाणि आदि के साथ वैकल्पिक रूप से प्रवाहित होते हैं। यह उन्हें द्वंद्व रहित, परस्पर प्रेम से पूजित दोहरे स्वरूप वाले परमात्मा के रूप में दर्शाता है। यह दर्शाता है कि दोनों देवता ब्रह्मांड के सृजन, पालन और संहार के कार्यों में एकात्मक रूप से भाग लेते हैं, उनके अविभाज्य संबंध पर जोर देते हैं।

यह स्तोत्र केवल नामों की सूची नहीं है, बल्कि दोनों देवताओं की दिव्य लीलाओं, अवतारों, दैत्य संहारों और ब्रह्मांड की रक्षा सेवाओं का वर्णन भी करता है। विष्णु को लोकपालक, भक्तों के शरणागत प्रतिपालक के रूप में वर्णित किया गया है, जबकि शिव संहारक, योगियों के अधिदेव और भक्तों के दुखों को दूर करने वाले के रूप में प्रकट होते हैं। यमराज प्रत्येक श्लोक के अंत में "त्याज्याभटाय इति संततमामनंति" (अर्थात् 'वे निरंतर पापों का नाश करने वाले' कहे जाते हैं) का बार-बार उच्चारण करते हैं। यह इस बात पर जोर देता है कि दोनों देवता भक्तों के पापों को दूर करने और उन्हें सभी प्रकार की बुराइयों से बचाने में समान भूमिका निभाते हैं, उनकी समान करुणा और साझा दिव्य उद्देश्य को उजागर करते हैं।

यह स्तोत्र शिव-केशव की एकता को अत्यंत सुंदरता से प्रतिपादित करता है: शिव के रौद्र और शांत स्वरूप, विष्णु के रक्षक, पालक और शरणागत प्रतिपालक गुण, दोनों देवताओं में 'भक्तानुकूलता' (भक्तों के प्रति अनुकूलता), दैत्यों का विरोध, कर्म-विमोचन, और सृष्टि-स्थिति-लय क्रियाओं में उनकी एकता—ये सभी यहाँ स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। पुराणों के अनुसार, इस स्तोत्र के पाठ से शिव और केशव दोनों का अनुग्रह एक साथ प्राप्त होता है, जिससे भय, कर्म-बंधन और मोह का नाश होता है, और आत्मा को आध्यात्मिक उत्थान मिलता है।

लाभ (Benefits):

  • पाप-निवारण और धर्म-बल वृद्धि: इस स्तोत्र के निरंतर पाठ से संचित पापों का नाश होता है और धर्म का बल बढ़ता है, जिससे आंतरिक शुद्धि और नैतिक शक्ति प्राप्त होती है।
  • शिव-विष्णु अनुग्रह द्वारा भय-निवारण: भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों की संयुक्त कृपा से सभी प्रकार के भय, विशेषकर मृत्यु का भय दूर होता है, मानसिक शांति और साहस प्रदान करता है।
  • पारिवारिक शांति, स्वास्थ्य और आर्थिक समृद्धि: इस स्toत्र का पाठ घर में शांति, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिरता लाता है, परिवार के समग्र कल्याण को बढ़ाता है।
  • भक्ति, ज्ञान और संयम-शक्ति में वृद्धि: भक्तों में भक्ति भावना, आध्यात्मिक ज्ञान और मानसिक संयम की शक्ति को बढ़ाता है, आंतरिक स्पष्टता और आध्यात्मिक विकास में सहायक होता है।
  • यमलोक के कष्टों से मुक्ति: स्वयं यमराज द्वारा रचित होने के कारण, इस स्तोत्र का पाठ करने वाले को यमलोक की पीड़ाओं या भय का सामना नहीं करना पड़ता, ऐसा स्वयं यमराज ने आश्वासन दिया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री शिवकेशव स्तुति क्या है?
यह यमराज द्वारा रचित एक स्तोत्र है जो भगवान शिव और भगवान विष्णु (केशव) दोनों को एक ही परमब्रह्म के दो स्वरूपों के रूप में पूजता है, उनकी एकता पर जोर देता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन, विशेषकर सुबह स्नान के बाद शुद्ध मन से करना चाहिए। किसी भी शुभ दिन से इसका पाठ आरंभ करना शुभ माना जाता है।
श्री शिवकेशव स्तुति के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इसके पाठ से पापों का निवारण होता है, शिव-विष्णु की संयुक्त कृपा मिलती है, सभी प्रकार के भय दूर होते हैं, परिवार में शांति, स्वास्थ्य, आर्थिक समृद्धि और भक्ति व ज्ञान में वृद्धि होती है।
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
जो शिव और विष्णु दोनों की पूजा करते हैं, जो दिव्य एकता में विश्वास रखते हैं, पापों से मुक्ति चाहते हैं और मानसिक शांति की तलाश में हैं, वे सभी इसका पाठ कर सकते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
सामान्यतः प्रतिदिन 11, 21, 51 या 108 बार इसका पाठ किया जा सकता है। महत्वपूर्ण यह है कि इसे पूरी श्रद्धा और एकाग्रता के साथ पढ़ा जाए।
इस स्तोत्र का उद्गम या स्रोत क्या है?
पुराणों के अनुसार, यह स्तोत्र स्वयं यमराज द्वारा रचित है, जिन्होंने शिव और विष्णु की अद्वैत शक्ति को प्रकट करने के लिए इसकी रचना की।

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