श्री वैद्यनाथाष्टकं
श्रीरामसौमित्रिजटायुवेद
षडाननादित्य कुजार्चिताय |
श्रीनीलकंठाय दयामयाय
श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय || 1 ||
गंगाप्रवाहेंदु जटाधराय
त्रिलोचनाय स्मर कालहंत्रे |
समस्त देवैरभिपूजिताय
श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय || 2 ||
भक्तप्रियाय त्रिपुरांतकाय
पिनाकिने दुष्टहराय नित्यं |
प्रत्यक्षलीलाय मनुष्यलोके
श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय || 3 ||
प्रभूतवातादि समस्तरोग-
-प्रणाशकर्त्रे मुनिवंदिताय |
प्रभाकरेंद्वग्निविलोचनाय
श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय || 4 ||
वाक्श्रोत्रनेत्रांघ्रि विहीनजंतोः
वाक्श्रोत्रनेत्रांघ्रि सुखप्रदाय |
कुष्ठादिसर्वोन्नतरोगहंत्रे
श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय || 5 ||
वेदांतवेद्याय जगन्मयाय
योगीश्वरध्येयपदांबुजाय |
त्रिमूर्तिरूपाय सहस्रनाम्ने
श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय || 6 ||
स्वतीर्थमृद्भस्मभृतांगभाजां
पिशाचदुःखार्तिभयापहाय |
आत्मस्वरूपाय शरीरभाजां
श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय || 7 ||
श्रीनीलकंठाय वृषध्वजाय
स्रक्गंधभस्माद्यभिशोभिताय |
सुपुत्रदारादि सुभाग्यदाय
श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय || 8 ||
बालांबिकेश वैद्येश भवरोगहरेति च |
जपेन्नामत्रयं नित्यं महारोगनिवारणं || 9 ||
इति श्री वैद्यनाथाष्टकं |
अर्थ
"श्री वैद्यनाथाष्टकं" भगवान शिव को दिव्य वैद्य के रूप में स्तुति करने वाला एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है। यह अष्टक भगवान वैद्यनाथ की करुणा, शक्ति और सभी प्राणियों पर उनके अनुग्रह को दर्शाता है। भगवान का यह यह रूप केवल शारीरिक बीमारियों को ही नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक कष्टों को भी दूर करने की महान शक्ति रखता है। इस स्तोत्र का पाठ भक्तों को संपूर्ण स्वास्थ्य, शांति और समृद्धि प्रदान करता है।
इस स्तोत्र में, भगवान वैद्यनाथ को श्रीराम, सुमित्रानंदन (लक्ष्मण), जटायु, षडानन (कार्तिकेय), आदित्य (सूर्य), और कुज (मंगल) जैसे देवताओं द्वारा पूजित बताया गया है। वे नीलकंठ हैं, करुणा के सागर हैं, और सभी रोगों का नाश करने वाले दिव्य चिकित्सक के रूप में भक्तों के समक्ष प्रकट होते हैं। वे गंगा के प्रवाह को अपनी जटाओं में धारण करने वाले त्रिलोचन (तीन नेत्रों वाले) हैं, कामदेव को भस्म करने वाले और काल का भी हनन करने वाले महाकाल हैं। समस्त देवताओं द्वारा भक्तिपूर्वक पूजे जाने वाले महादेव पृथ्वी पर भी प्रत्यक्ष कृपा से जीवों की रक्षा करते हैं। भक्तों के प्रिय, त्रिपुरारी (त्रिपुरासुर का संहार करने वाले) शूलपाणि, दुष्टों का नित्य नाश करने वाले शक्ति स्वरूप हैं।
यह स्तोत्र भगवान शिव को वात, पित्त और कफ से उत्पन्न होने वाले सभी रोगों का नाश करने वाला बताता है। महर्षियों द्वारा वंदित वे प्रभाकर (सूर्य), इंदु (चंद्र) और अग्नि को अपने नेत्रों के रूप में धारण करते हैं। वाणी, श्रवण, नेत्र और पैर से विहीन जीवों को भी वाणी, श्रवण, नेत्र और पैरों का सुख प्रदान करने वाले दयामूर्ति हैं। कुष्ठ रोग से लेकर अत्यंत कठिन से कठिन रोगों को भी दूर करने वाले वे वैद्यराज हैं। वे वेदांत से ज्ञात होने वाले परमात्मा हैं, योगेश्वरों द्वारा ध्यान किए जाने वाले चरणकमलों वाले हैं, त्रिमूर्ति स्वरूप हैं और सहस्रनामों से युक्त हैं। संपूर्ण जगत् में व्याप्त वे सभी प्राणियों के आत्मस्वरूप हैं।
अपने पवित्र तीर्थ की मिट्टी और भस्म को धारण करने वाले भक्तों के लिए वे पिशाच बाधाओं, दुष्ट शक्तियों, भय और रोगों को दूर करने वाले संकटहारी हैं। नीलकंठ और वृषभध्वज के साथ बिल्व, गंध और भस्म धारण करके प्रकाशित होने वाले वैद्यनाथ, संतान, पति-पत्नी को शुभ फल और पारिवारिक ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। अंत में, यह स्तोत्र बताता है कि "बालांबिकेश, वैद्येश, भवरोगहर" इन तीन पवित्र नामों का प्रतिदिन जप करने से महारोग दूर होते हैं और पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त होता है।
लाभ (Benefits):
- शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य: इस स्तोत्र का पाठ शरीर और मन से संबंधित सभी रोगों और दोषों को दूर करता है, तथा स्वास्थ्य और दीर्घायु को बढ़ाता है।
- दुष्ट शक्तियों से सुरक्षा: पिशाच बाधाओं, नकारात्मक शक्तियों और सभी प्रकार के भयों से मुक्ति दिलाता है, भक्तों को सुरक्षा प्रदान करता है।
- संतान एवं पारिवारिक समृद्धि: संतान प्राप्ति, परिवार की उन्नति और समृद्धि प्रदान करता है, जीवन में शुभ फल देता है।
- आध्यात्मिक शांति: भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है, जिससे आध्यात्मिक शांति, संतोष और अंततः भवसागर से मुक्ति मिलती है।
- निर्भीकता और आत्मविश्वास: सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति दिलाकर जीवन में साहस और आत्मविश्वास भरता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री वैद्यनाथाष्टकं क्या है?
श्री वैद्यनाथाष्टकं का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री वैद्यनाथाष्टकं के पाठ से क्या मुख्य लाभ प्राप्त होते हैं?
कौन श्री वैद्यनाथाष्टकं का पाठ कर सकता है?
श्री वैद्यनाथाष्टकं का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री वैद्यनाथाष्टकं का उद्गम क्या है?
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