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श्री शिव स्तुतिः (नारायणाचार्य कृतं)

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स्तोत्रशिव
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श्री शिव स्तुतिः (नारायणाचार्य कृतं)

स्फुटं स्फटिकसप्रभं स्फुटितहारकश्रीजटं
शशांकदलशेखरं कपिलफुल्लनेत्रत्रयं |
तरक्षुवरकृत्तिमद्भुजगभूषणं भूतिम-
त्कदा नु शितिकंठ ते वपुरवेक्षते वीक्षणं || 1 ||

त्रिलोचन विलोचने लसति ते ललामायिते
स्मरो नियमघस्मरो नियमिनामभूद्भस्मसात् |
स्वभक्तिलतया वशीकृतपती सतीयं सती
स्वभक्तवशतो भवानपि वशी प्रसीद प्रभो || 2 ||

महेश महितोऽसि तत्पुरुष पूरुषाग्र्यो भवा-
नघोररिपुघोर तेऽनवम वामदेवांजलिः |
नमस्सपदि जात ते त्वमिति पंचरूपोचित-
प्रपंचचयपंचवृन्मम मनस्तमस्ताडय || 3 ||

रसाघनरसानलानिलवियद्विवस्वद्विधु-
प्रयष्टृषु निविष्टमित्यज भजामि मूर्त्यष्टकं |
प्रशांतमुत भीषणं भुवनमोहनं चेत्यहो
वपूंषि गुणभूषितेहमहमात्मनोऽहं भिदे || 4 ||

विमुक्तिपरमाध्वनां तव षडध्वनामास्पदं
पदं निगमवेदिनो जगति वामदेवादयः |
कथंचिदुपशिक्षिता भगवतैव संविद्रते
वयं तु विरलांतराः कथमुमेश तन्मन्महे || 5 ||

कठोरितकुठारया ललितशूलया वाहया
रणड्डमरुणा स्फुरद्धरिणया सखट्वांगया |
चलाभिरचलाभिरप्यगणिताभिरुन्मृत्यत-
श्चतुर्दश जगंति ते जयजयेत्ययुर्विस्मयं || 6 ||

पुरा त्रिपुररंधनं विविधदैत्यविध्वंसनं
पराक्रमपरंपरा अपि परा न ते विस्मयः |
अमर्षिबलहर्षितक्षुभितवृत्तनेत्रोज्ज्वल-
ज्ज्वलज्ज्वलनहेलया शलभितं हि लोकत्रयं || 7 ||

सहस्रनयनो गुहस्सहसहस्ररश्मिर्विधुः
बृहस्पतिरुताप्पतिस्ससुरसिद्धविद्याधराः |
भवत्पदपरायणाश्श्रियमिमां ययुः प्रार्थितां
भवान् सुरतरुर्भृशं शिव शिवां शिवावल्लभां || 8 ||

तव प्रियतमादतिप्रियतमं सदैवांतरं
पयस्युपहितं घृतं स्वयमिव श्रियो वल्लभं |
विबुद्ध्य लघुबुद्धयस्स्वपरपक्षलक्ष्यायितं
पठंति हि लुठंति ते शठहृदश्शुचा शुंठिताः || 9 ||

निवासनिलयाचिता तव शिरस्ततिर्मालिका
कपालमपि ते करे त्वमशिवोऽस्यनंतर्धियां |
तथापि भवतः पदं शिवशिवेत्यदो जल्पता-
मकिंचन न किंचन वृजिनमस्ति भस्मी भवेत् || 10 ||

त्वमेव किल कामधुक्सकलकाममापूरयन्
सदा त्रिनयनो भवान्वहसि चात्रिनेत्रोद्भवं |
विषं विषधरांदधत्पिबसि तेन चानंदवा-
न्निरुद्धचरितोचिता जगदधीश ते भिक्षुता || 11 ||

नमः शिवशिवा शिवाशिव शिवार्थ कृंताशिवं
नमो हरहरा हराहर हरांतरीं मे दृशं |
नमो भवभवा भवप्रभवभूतये मे भवा-
न्नमो मृड नमो नमो नम उमेश तुभ्यं नमः || 12 ||

सतां श्रवणपद्धतिं सरतु सन्नतोक्तेत्यसौ
शिवस्य करुणांकुरात्प्रतिकृतात्मदा सोचिता |
इति प्रथितमानसो व्यथित नाम नारायणः
शिवस्तुतिमिमां शिवां लिकुचिसूरिसूनुस्सुधीः || 13 ||

इति श्रीलिकुचिसूरिसूनु नारायणाचार्यविरचिता श्री शिवस्तुतिः |

अर्थ

"श्री शिव स्तुतिः (नारायणाचार्य कृतं)" परम पूज्य नारायणचार्य द्वारा रचित एक अत्यंत गहन दार्शनिक और भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। इस स्तोत्र में, कवि ने भगवान शिव के अनंत स्वरूप, उनकी महिमा और उनके तत्वज्ञान को अत्यंत गहरी भक्ति और काव्यात्मक शैली में स्तुति की है। स्तोत्र का प्रत्येक श्लोक शिव के गुणों, उनके विश्वरूप और मोक्ष के मार्ग को काव्यमय ढंग से प्रतिबिंबित करता है। यह केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि भक्त की आंतरिक ज्ञान-यात्रा का प्रतीक है।

पहले श्लोक में, कवि नारायणचार्य शिव के दिव्य रूप का वर्णन करते हुए, उनके स्फटिक के समान तेजोमय शरीर, चंद्रमा से सुशोभित मस्तक, तीनों नेत्रों से फूटती हुई दिव्य ज्योति, जटाओं में छिपे सर्प आभूषणों और भस्म से अलंकृत देह को देखने की तीव्र इच्छा व्यक्त करते हैं। वे भक्तिपूर्वक प्रार्थना करते हैं, "हे नीलकंठ! कब मेरी आँखें आपके इस दिव्य रूप का दर्शन कर पाएँगी?" दूसरे श्लोक में, त्रिलोचन भगवान शिव की प्रचंड दृष्टि का चित्रण किया गया है, जिसने कामदेव को भस्म कर दिया था। परंतु कवि यह भी बताते हैं कि शिव अपने भक्तों के लिए शांत और करुणा के सागर हैं, ठीक वैसे ही जैसे देवी सती ने अपनी भक्ति से शिव को वश में किया था, वैसे ही भक्तों के प्रेम से भी वे वश में हो जाते हैं।

तीसरे श्लोक में शिव के पंचमुखी स्वरूपों – तत्पुरुष, अघोर, वामदेव, सद्योजात और ईशान – का वर्णन किया गया है। ये पंचब्रह्म तत्व सृष्टि के पाँच पहलुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। कवि प्रार्थना करते हैं, "ये पंचरूप मेरे अज्ञान के अंधकार को चीर दें," और मन में व्याप्त अज्ञानता को दूर करने की याचना करते हैं। चौथे श्लोक में, शिव के अष्टमूर्ति रूपों – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चंद्रमा और यज्ञकर्ता – का ध्यान किया गया है। कवि सुंदर ढंग से शिव की शांत, रौद्र और मोहिनी रूपों की स्तुति करते हैं, यह दर्शाते हुए कि शिव इन सभी रूपों में पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त हैं और उसका पालन-पोषण करते हैं।

पाँचवें श्लोक में, कवि कहते हैं कि मोक्ष की ओर ले जाने वाले छह मार्ग (षडध्व) भी शिव तत्व में ही निहित हैं। वेद भी अंततः शिव तत्व का ही प्रतिपादन करते हैं। वे विनम्रतापूर्वक कहते हैं, "हम अल्पज्ञानी हैं; ऐसे परम तत्व को आपकी कृपा के बिना कैसे समझ सकते हैं?" छठे श्लोक में, शिव के त्रिशूल, खट्वांग, भयानक डमरू और भस्म आभूषणों का वर्णन किया गया है, जो समस्त लोकों की रक्षा करने वाली शिव शक्ति को दर्शाते हैं। शिव का रौद्र रूप भी विश्व की रक्षा के लिए ही है। सातवें श्लोक में त्रिपुरा दहन की घटना का अद्भुत वर्णन किया गया है, जिसमें शिव का अत्यंत उग्र रूप और देवताओं को भयभीत करने वाले दैत्यों का विनाश दर्शाया गया है। कवि कहते हैं कि शिव की आँखों में उग्र ज्वालाएँ चमकती हैं, फिर भी भक्त उन्हें परम करुणावान के रूप में देखते हैं। आठवें श्लोक में बताया गया है कि इंद्र, सूर्य, चंद्रमा, बृहस्पति, कार्तिकेय और अनेक सिद्ध व विद्याधर शिव की चरण सेवा से ही कल्याण प्राप्त कर सके। इस प्रकार, शिव को सच्चा कल्पवृक्ष बताया गया है। नौवें श्लोक में, कवि उन अज्ञानियों का उल्लेख करते हैं जो शिव की महिमा को समझे बिना उनकी आलोचना करते हैं, लेकिन उनके भक्त शिव की सच्ची महिमा को पहचानकर भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करते हैं। यह स्तोत्र यह संदेश देता है कि शिव ही परम तत्व हैं, जो सभी से परे और सर्वोपरि हैं।

लाभ (Benefits):

  • मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति: इस स्तोत्र के नियमित पाठ से मन को शांति मिलती है और आध्यात्मिक ज्ञान के साथ-साथ भगवान शिव के प्रति भक्ति बढ़ती है।
  • अज्ञान का नाश और ज्ञान की प्राप्ति: स्तोत्र में अज्ञान के नाश की प्रार्थना की गई है, अतः इसके पाठ से अज्ञान दूर होता है और ज्ञान का प्रकाश फैलता है।
  • संकटों से मुक्ति और सुरक्षा: भगवान शिव के विभिन्न रौद्र और शांत रूपों की स्तुति करने से भक्तों को सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति मिलती है और अकाल मृत्यु से रक्षा होती है।
  • मनोकामना पूर्ति: शिव को कल्पवृक्ष के रूप में वर्णित किया गया है, इसलिए इस स्तोत्र के भक्तिपूर्ण पाठ से भक्तों की सभी सद्कामनाएँ पूर्ण होती हैं।
  • मोक्ष की प्राप्ति: स्तोत्र में शिव तत्व को मोक्ष का मार्ग बताया गया है, अतः इसका निष्ठापूर्वक पाठ करने से अंततः मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री शिव स्तुति (नारायणाचार्य कृतं) क्या है?
श्री शिव स्तुति (नारायणाचार्य कृतं) परम पूज्य नारायणचार्य द्वारा रचित एक भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। यह भगवान शिव के दिव्य रूपों, गुणों, महिमा और उनके दार्शनिक महत्व का गहराई से वर्णन करता है, जो भक्तों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन प्रातः स्नान के पश्चात् शुद्ध मन से करना उत्तम माना जाता है। सोमवार और शिवरात्रि के दिन इसका पाठ विशेष रूप से फलदायी होता है।
श्री शिव स्तुति के पाठ के प्रमुख लाभ क्या हैं?
इस स्तोत्र के पाठ से मानसिक शांति, अज्ञान का नाश, संकटों से मुक्ति, मनोकामनाओं की पूर्ति और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह आध्यात्मिक उन्नति में सहायक है।
यह स्तोत्र किसे पढ़ना चाहिए?
भगवान शिव के भक्त, आध्यात्मिक ज्ञान की तलाश करने वाले, तथा मानसिक शांति और सुरक्षा चाहने वाले सभी व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं। इसके लिए कोई आयु या लिंग का प्रतिबंध नहीं है।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन कम से कम एक बार या अपनी श्रद्धा के अनुसार 11, 21, या 108 बार किया जा सकता है। नियमित पाठ से सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त होते हैं।
इस स्तोत्र का उद्गम या रचनाकार कौन हैं?
इस स्तोत्र के रचनाकार "नारायणाचार्य" हैं। उनका नाम स्तोत्र के शीर्षक में ही स्पष्ट रूप से उल्लिखित है।

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