श्री शिव पंचाक्षरी मंत्रः
आचमनम् –
ॐ शंभवे स्वाहा |
ॐ शंकराय स्वाहा |
ॐ शांताय स्वाहा |
ॐ शाश्वताय नमः |
शिव, स्थाणो, भवानीपते, भूतेश, त्रिपुरांतक, त्रिनयन, श्रीकंठ, कालांतक, शर्व, उग्र, अभव, भर्ग, भीम, जगतां नाथ, अक्षय, श्रीनिधे, रुद्र, ईशान, महेश, महादेवाय नमः ||
विनियोगः –
अस्य श्री शिव पंचाक्षरी मंत्रस्य वामदेव ऋषि पंक्तिश्छंद ईशानो देवता, ॐ बीजं, नमः शक्तिः, शिवायेति कीलकं चतुर्विध पुरुषार्थ सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः |
ऋष्यादिन्यासः –
ॐ वामदेवर्षये नमः शिरसि |
पंक्ति छंदसे नमः मुखे |
ईशानदेवतायै नमः हृदये |
ॐ बीजाय नमः गुह्ये |
नमः शक्तये नमः पादयोः |
शिवायेति कीलकाय नमः नाभौ |
विनियोगाय नमः सर्वांगे |
करन्यासः –
ॐ ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः |
ॐ नं तर्जनीभ्यां नमः |
ॐ मं मध्यमाभ्यां नमः |
ॐ शिं अनामिकाभ्यां नमः |
ॐ वां कनिष्ठिकाभ्यां नमः |
ॐ यं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः |
हृदयादिन्यासः –
ॐ ॐ हृदयाय नमः |
ॐ नं शिरसे स्वाहा |
ॐ मं शिखायै वषट् |
ॐ शिं कवचाय हुम् |
ॐ वां नेत्रत्रयाय वौषट् |
ॐ यं अस्त्राय फट् |
पंचमूर्ति न्यासः –
ॐ नं तत्पुरुषाय नमः तर्जन्याम् |
ॐ मं अघोराय नमः मध्यमायाम् |
ॐ शिं सद्योजाताय नमः कनिष्ठिकायाम् |
ॐ वां वामदेवाय नमः अनामिकायाम् |
ॐ ईशानाय नमः इत्यंगुष्ठयोः |
ॐ नं तत्पुरुषाय नमः मुखे |
ॐ मं अघोराय नमः हृदये |
ॐ शिं सद्योजाताय नमः पादयोः |
ॐ वां वामदेवाय नमः गुह्ये |
ॐ यं ईशानाय नमः मूर्ध्नि |
ध्यानम् –
ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं
रत्नाकल्पोज्ज्वलांगं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम् |
पद्मासीनं समंतात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं
विश्वाद्यं विश्ववंद्यं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम् ||
मंत्रः –
ॐ नमः शिवाय |
हृदयादिन्यासः –
ॐ ॐ हृदयाय नमः |
ॐ नं शिरसे स्वाहा |
ॐ मं शिखायै वषट् |
ॐ शिं कवचाय हुम् |
ॐ वां नेत्रत्रयाय वौषट् |
ॐ यं अस्त्राय फट् |
अर्थ
“श्री शिव पंचाक्षरी मंत्रः (न्यास सहितं)” शिव आराधना में अत्यंत शक्तिशाली और संपूर्ण विधि है। इसमें ‘ॐ नमः शिवाय’ नामक पंचाक्षर मंत्र का जप केवल मौखिक नहीं, बल्कि न्यास के माध्यम से पूरे शरीर में शिव शक्ति की स्थापना के साथ किया जाता है। यह प्रक्रिया भक्त के शरीर, मन और आत्मा को शुद्ध करती है, आंतरिक ऊर्जा को जागृत करती है, भक्ति को सुदृढ़ करती है और उपासक को शिव की चेतना के साथ जोड़ती है। यह भक्त को मंत्र की ध्वनि के साथ-साथ उसके गहन आध्यात्मिक सार से भी अवगत कराता है।
इस पूजा की शुरुआत आचमन से होती है, जहाँ शिव के दिव्य नामों का स्मरण करके मन, वाणी और शरीर को पवित्र किया जाता है। इसके पश्चात्, विनियोग का उच्चारण किया जाता है, जो मंत्र जप के उद्देश्य को स्पष्ट करता है – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष नामक चार पुरुषार्थों की प्राप्ति। ऋष्यादि न्यास के माध्यम से मंत्र के आधारभूत ऋषि, छंद और देवता को शरीर में स्थापित किया जाता है, जिससे मंत्र को दैवी आधार प्राप्त होता है। करन्यास द्वारा पंचाक्षर मंत्र के प्रत्येक अक्षर को उंगलियों पर स्थापित किया जाता है, जिससे सभी कर्मों में मंत्र शक्ति का संचार होता है।
हृदयादि न्यास में शिव की शक्तियों – हृदय, सिर, शिखा, कवच, त्रिनेत्र और अस्त्र – को शरीर के प्रमुख आध्यात्मिक केंद्रों में स्थापित किया जाता है। यह भक्त को पूर्ण सुरक्षा और आंतरिक बल प्रदान करता है। पंचमूर्ति न्यास के माध्यम से शिव के पाँच ब्रह्मांडीय स्वरूपों – तत्पुरुष, अघोर, सद्योजात, वामदेव और ईशान – को शरीर में प्रतिष्ठित किया जाता है, जिससे भक्त शिव की सर्वव्यापकता का अनुभव अपने भीतर कर पाता है।
ध्यान के चरण में, भक्त महेश्वर के भव्य रूप का ध्यान करता है – चंद्रमा के समान प्रकाशित, पंचवक्त्र (पाँच मुख वाले), त्रिनेत्र (तीन आँखों वाले), शांत मुद्रा में बैठे हुए, व्याघ्रचर्म धारण किए हुए, परशु (कुल्हाड़ी) और मृग (हिरण) धारण किए हुए, और अभय मुद्रा में विराजमान। अंत में, 'ॐ नमः शिवाय' – शुद्ध चेतना का सारभूत मंत्र – का जप किया जाता है। यह अहंकार को गलाता है, कर्मों को शुद्ध करता है और आध्यात्मिक जागृति प्रदान करता है, जिससे भक्त शिव के सान्निध्य को प्राप्त करता है।
लाभ (Benefits):
- शारीरिक और मानसिक शुद्धि: पवित्र न्यास प्रक्रिया के माध्यम से शरीर और मन की गहन शुद्धि होती है, जिससे आंतरिक शांति और सद्भाव बढ़ता है।
- शक्तिशाली सुरक्षा कवच: पंचाक्षर मंत्र नकारात्मकता और बाधाओं से एक शक्तिशाली सुरक्षा कवच का कार्य करता है।
- आध्यात्मिक जागरूकता में वृद्धि: एकाग्रता, ध्यान और आध्यात्मिक चेतना को बढ़ाता है, जिससे चिदानंद की अनुभूति होती है।
- पापों और कर्मों का क्षय: यह पापों, कर्म-बंधनों को दूर करता है और आत्मा को मोक्ष मार्ग पर अग्रसर करता है।
- चतुर्विध पुरुषार्थों की सिद्धि: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – जीवन के चारों लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायक होता है।
- शिव सामीप्य और कृपा: शिव के सामीप्य और उनकी असीम कृपा को प्राप्त करने में मदद करता है, जिससे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री शिव पंचाक्षरी मंत्रः (न्यास सहितं) क्या है?
इस मंत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस मंत्र के जप से क्या प्रमुख लाभ होते हैं?
इस मंत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस मंत्र का कितनी बार जप करना चाहिए?
इस मंत्र का उद्गम या पृष्ठभूमि क्या है?
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