श्री शिव मानसिक पूजा स्तोत्रं
अनुचितमनुलपितं मे त्वयि शंभो शिव तदागसश्शांत्यै |
अर्चां कथमपि विहितामंगीकुरु सर्वमंगलोपेत || 1 ||
ध्यायामि कथमिव त्वां धीवर्त्मविदूर दिव्यमहिमानं |
आवाहनं विभोस्ते देवाग्र्य भवेत्प्रभो कुतः स्थानात् || 2 ||
कियदासनं प्रकल्प्यं कृतासनस्येह सर्वतोऽपि सह |
पाद्यं कुतोऽर्घ्यमपि वा पाद्यं सर्वत्रपाणिपादस्य || 3 ||
आचमनं ते स्यादधिभगवन् ते सर्वतोमुखस्य कथं |
मधुपर्को वा कथमिह मधुवैरिणि दर्शितप्रसादस्य || 4 ||
स्नानेन किं विधेयं सलिलकृतेनेह नित्यशुद्धस्य |
वस्त्रेणापि न कार्यं देवाधिपते दिगंबरस्येह || 5 ||
स्फुरति हि सर्पाभरणं सर्वांगे सर्वमंगलाकार |
अतिवर्णाश्रमिणस्तेऽस्त्युपवीतेनेह कश्चिदुत्कर्षः || 6 ||
गंधवती हि तनुस्ते गंधाः किं नेश पौनरुक्ताय |
पुष्कलफलदातारं पुष्करकुसुमेन पूजयामि त्वां || 7 ||
शमधनमूलधनं त्वां सकलेश्वर भवसि धूपितः केन |
दीपः कथं शिखावान् दीप्येत पुरः स्वयंप्रकाशस्य || 8 ||
अमृतात्मकमपि भगवन्नशनं किन्नाम नित्यतृप्तस्य |
त्वय्याम्रेडितमेतत्तांबूलं यदिह सुमुखरागाय || 9 ||
उपहारीभूयादिदमुमेश यन्मे विचेष्टितमशेषं |
नीराजयामि तमिमं नानात्मानं सहाखिलैः करणैः || 10 ||
सुमनश्शेखर भव ते सुमनोऽञ्जलिरेष को भवेच्छंभो |
छत्रं द्युमन् द्युमार्धन् चामरमपि किं जितश्रमस्य तव || 11 ||
नृत्यं प्रथतां कथमिव नाथ तवाग्रे महानटस्येह |
गीतं किं पुरवैरिन् गीतागममूलदेशिकस्य पुरः || 12 ||
वाद्यं डमरु भृतस्ते वादयितुं ते पुरोऽस्ति का शक्तिः |
अपरिच्छिन्नस्य भवेदखिलेश्वर कः प्रदक्षिणविधिस्ते || 13 ||
स्युस्ते नमांसि कथमिव शंकर परितोऽपि विद्यमानस्य |
वाचामगोचरे त्वयि वाक्प्रसरो मे कथं सुसंभवतु || 14 ||
नित्यानंदाय नमो निर्मलविज्ञानविग्रहाय नमः |
निरवधिकरुणाय नमो निरवधिविभवाय तेजसेऽस्तु नमः || 15 ||
सरसिजविपक्षचूडः सगरतनूजन्मसुकृतमूर्धाऽसौ |
दृक्कूलंकषकरुणो दृष्टिपथे मेऽस्तु धवलिमा कोऽपि || 16 ||
जगदाधारशरासं जगदुत्पादप्रवीणयंतारं |
जगदवनकर्मठशरं जगदुद्धारं श्रयामि चित्सारं || 17 ||
कुवलयसहयुध्वगलैः कुलगिरिकूटस्थकवचितार्धांगैः |
कलुषविदूरैश्चेतः कबलितमेतत्कृपारसैः किंचित् || 18 ||
वसनवतेकत्कृत्त्या वासवते रजतशैलशिखरेण |
वलयवते भोगभृता वनितार्धांगाय वस्तुनेऽस्तु नमः || 19 ||
सरसिजकुवलय-जागरसंवेशन जागरूकलोचनतः |
सकृदपि नाहं जाने सुतरांतं भाष्यकारमंजीरात् || 20 ||
आपाटलजूटाना-मानीलच्छायकंधरा-सीम्नां |
आपांडुविग्रहाणामाद्रुहिणं किंकरा वयं महसां || 21 ||
मुषितस्मरावलेपे मुनितनयायुर्वदान्यपदपद्मे |
महसि मनो रमतां मे मनसि दयापूरमेदुरापांगे || 22 ||
शर्मणि जगतां गिरिजानर्मणि सप्रेमहृदयपरिपाके |
ब्रह्मणि विनमद्रक्षणकर्मणि तस्मिन्नुदेतु भक्तिर्मे || 23 ||
कस्मिन्नपि समये मम कंठच्छायाविधूतकालाभ्रं |
अस्तु पुरो वस्तु किमप्यर्धांगेदरमुन्मिषन्निटलं || 24 ||
जटिलाय मौलिभागे जलधर नीलाय कंधराभोगे |
धवलाय वपुषि निखिले धाम्नेस्स्यान्मानसे नमोवाकः || 25 ||
अकरविराजत्सुमृगै-रवृषतुरंगै-रमौलिधृतगंगैः |
अकृतमनोभवभंगैरलमन्यैर्जगति दैवतं मन्यैः || 26 ||
कस्मै वच्मि दशां मे कस्येदृग्घृदयमस्ति शक्तिर्वा |
कस्य बलं चोद्धर्तुं क्लेशात्त्वामंतरा दयासिंधो || 27 ||
याचे ह्यनभिनवं ते चंद्रकलोत्तंस किंचिदपि वस्तु |
मह्यं प्रदेहि भगवन् मदीयमेव स्वरूपमानंदं || 28 ||
भगवन्बालतया वाऽभक्त्या वाऽप्यापदाकुलतया वा |
मोहाविष्टतया वा माऽस्तु च ते मनसि यद्दुरुक्तं मे || 29 ||
यदि विश्वाधिकता ते यदि निगमागमपुराणयाथार्थ्यं |
यदि वा भक्तेषु दया तदिह महेशाशु पूर्णकामस्स्यां || 30 ||
इति शिवानंदावधूतरचित शिवमानसिकपूजास्तोत्रं |
अर्थ
श्री शिव मानसिक पूजा स्तोत्र एक अद्वितीय और उत्कृष्ट स्तोत्र है जो भौतिक पूजा सामग्री के अभाव में भी शुद्ध हृदय और मन से भगवान शिव की पूजा करने का मार्गदर्शन करता है। आदि शंकराचार्य द्वारा रचित यह स्तोत्र बताता है कि बाहरी अनुष्ठानों की तुलना में आंतरिक भावना और भक्ति अधिक महत्वपूर्ण है। यह उस भक्त की स्थिति का वर्णन करता है जो यह समझता है कि भगवान सर्वव्यापी और सभी सीमाओं से परे हैं, और इसलिए वह अपने मन को ही नैवेद्य के रूप में अर्पित करता है। यह स्तोत्र भक्त की अहंकार रहित प्रार्थना और पूर्ण समर्पण की भावना को दर्शाता है।
इस स्तोत्र का प्रत्येक श्लोक भक्त के आंतरिक चिंतन को व्यक्त करता है। भक्त विनम्रतापूर्वक प्रार्थना करता है, "हे शंभु, मैं जो कुछ भी कहता या करता हूँ वह अपूर्ण हो सकता है, कृपया उसे अपनी करुणा से स्वीकार करें।" वह सोचता है कि वह अनंत, सर्वव्यापी शिव का ध्यान कैसे कर सकता है। जब शिव का रूप पूरे ब्रह्मांड को समाहित करता है, तो भक्त सोचता है कि उसे कहाँ आसन देना चाहिए, कैसे पाद्य या अर्घ्य अर्पित करना चाहिए, स्नान, वस्त्र, धूप, दीप या भोजन कैसे देना चाहिए। वह महसूस करता है कि शिव स्वयं प्रकाशमान, नित्य शुद्ध हैं और किसी भी अनुष्ठानिक भेंट से परे हैं।
भक्त को यह एहसास होता है कि उसके पास भगवान को अर्पित करने के लिए अपने मन, हृदय, कर्म और श्वास के अलावा और कुछ नहीं है। वह मानसिक रूप से आरती करता है, मानसिक रूप से फूल चढ़ाता है, और शुद्ध चेतना के माध्यम से मानसिक रूप से सभी नैवेद्य अर्पित करता है। यहाँ, बाहरी रूप की तुलना में आंतरिक भावना को अधिक महत्व दिया जाता है। इस स्तोत्र का सार यह है कि मन से अर्पित की गई प्रत्येक पूजा सामग्री भगवान शिव की दिव्य उपस्थिति में स्वीकार्य होती है।
अंत में, भक्त केवल एक ही बात मांगता है: "हे शिव, आपके प्रति मेरी भक्ति मेरे हृदय में सदा बनी रहे।" यह भौतिक धन की तुलना में आध्यात्मिक धन को, और बाहरी अनुष्ठानों की तुलना में आंतरिक भक्ति को अधिक महत्व देता है। यह स्तोत्र आगम और पुराणों में वर्णित "मनसा पूजा - उत्तम पूजा" (मानसिक पूजा ही श्रेष्ठ पूजा है) के सिद्धांत का एक जीवंत प्रतीक है।
लाभ (Benefits):
- हृदय की पवित्रता: इस स्तोत्र का पाठ मन को शुद्ध करता है और हृदय में दिव्य प्रेम और भक्ति भरता है।
- कर्म दोषों का निवारण: मानसिक रूप से शिव की पूजा करने से पिछले कर्मों के दोष दूर होते हैं और आत्मा को मुक्ति मिलती है।
- पाप क्षय: भगवान शिव की मानसिक पूजा पापों का नाश करती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाती है।
- मानसिक शांति: आंतरिक भक्ति के साथ शिव का ध्यान करने से मन को शांति, स्थिरता और समभाव प्राप्त होता है।
- शिव भक्ति की स्थिरता: यह स्तोत्र भक्त के मन में शिव के प्रति भक्ति को मजबूत करता है और उसे आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने में मदद करता है।
- आत्म-साक्षात्कार की ओर प्रगति: बाहरी अनुष्ठानों से परे आंतरिक संबंध स्थापित करने से, भक्त आत्म-साक्षात्कार की दिशा में प्रगति कर सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री शिव मानसिक पूजा स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
श्री शिव मानसिक पूजा स्तोत्रं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
इस स्तोत्र का मूल या रचयिता कौन हैं?
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