शं

श्री शंकराष्टकं

संपादन: अद्यतन
स्तोत्रशिव
0 व्यूज़

श्री शंकराष्टकं

शीर्षजटागणभारं गरलाहारं समस्तसंहारं |
कैलासाद्रिविहारं पारं भववारिधेरहं वंदे || 1 ||

चंद्रकलोज्ज्वलफालं कंठव्यालं जगत्त्रयीपालं |
कृतनरमस्तकमालं कालं कालस्य कोमलं वंदे || 2 ||

कोपेक्षणहतकामं स्वात्मारामं नगेंद्रजावामं |
संसृतिशोकविरामं श्यामं कंठेन कारणं वंदे || 3 ||

कटितटविलसितनागं खंडितयागं महाद्भुतत्यागं |
विगतविषयरसरागं भागं यज्ञेषु बिभ्रतं वंदे || 4 ||

त्रिपुरादिकदनुजांतं गिरिजाकांतं सदैव संशांतं |
लीलाविजितकृतांतं भांतं स्वांतेषु देवानां वंदे || 5 ||

सुरसरिदाप्लुतकेशं त्रिदशकुलेशं हृदालयावेशं |
विगताशेषक्लेशं देशं सर्वेष्टसंपदां वंदे || 6 ||

करतलकलितपिनाकं विगतजलाकं सुकर्मणां पाकं |
परपदवीतवराकं नाकंगमपूगवंदितं वंदे || 7 ||

भूतविभूषितकायं दुस्तरमायं विवर्जितापायं |
प्रमथसमूहसहायं सायं प्रातर्निरंतरं वंदे || 8 ||

यस्तु पदाष्टकमेतद्ब्रह्मानंदेन निर्मितं नित्यं |
पठति समाहितचेताः प्राप्नोत्यंते स शैवमेव पदं || 9 ||

इति श्रीमत्परमहंस स्वामिब्रह्मानंदविरचितं श्रीशंकराष्टकं |

अर्थ

श्री शंकराष्टकं स्वामी ब्रह्मानंद द्वारा रचित एक अद्भुत स्तोत्र है, जो भगवान शिव के विभिन्न रूपों और गुणों का महिमामंडन करता है। यह शैव सिद्धांत के गहरे भावों से ओतप्रोत है और भक्तों को परमेश्वर की दिव्य उपस्थिति में ले जाता है। प्रत्येक श्लोक "वंदे" (मैं नमन करता हूँ) शब्द के साथ समाप्त होता है, जो भगवान के प्रति पूर्ण शरणागति का भाव व्यक्त करता है। यह स्तोत्र शिव की अनंत शक्ति, करुणा और समस्त कल्याणकारी गुणों की प्रशंसा करता है।

यह स्तोत्र शिव के रौद्र, शांत, योगी और तांडव रूपों का मनोहारी वर्णन करता है। यह केवल बाहरी चित्रण नहीं है, बल्कि शिव के सृष्टि, स्थिति, लय कार्यों के साथ-साथ उनके कालतीत और परमात्मा स्वरूप को भी दर्शाता है। भक्त इस स्तोत्र का पाठ संसार सागर से मुक्ति पाने, दुखों का निवारण करने और अंततः शिव पद को प्राप्त करने के लिए करते हैं। यह अज्ञान का नाश करने वाले, दुखों को हरने वाले और सभी प्राणियों के दिव्य रक्षक भगवान शिव की स्तुति करता है।

पहले श्लोक में, जिनके जटाजूट में गंगा प्रवाहित होती है, जिन्होंने हलाहल विष को कंठ में धारण कर समस्त संसार का संहार किया है, जो कैलाश पर्वत पर विहार करते हैं और भवसागर से पार उतारते हैं, उन परमेश्वर को नमन किया जाता है। दूसरे श्लोक में, जिनके ललाट पर चंद्रमा की किरणें चमकती हैं, कंठ में सर्पमाला धारण किए हुए हैं, तीनों लोकों के पालक हैं, राक्षसों के मुंडों की माला धारण करते हैं, काल के भी काल हैं, ऐसे कोमल होते हुए भी भयंकर शिव की वंदना की जाती है। तीसरा श्लोक कामदेव को भस्म करने वाले, आत्मानंद में लीन रहने वाले, पार्वती देवी के साथ नित्य आनंदित रहने वाले, मनुष्यों के सांसारिक दुखों को दूर करने वाले नीलकंठ महेश्वर की स्तुति करता है।

चौथा श्लोक कमर में नागों के आभूषण धारण किए हुए, यज्ञों की रक्षा करने वाले धर्म स्वरूप, इंद्रिय आसक्तियों से मुक्त, महान त्यागी शिव का वर्णन करता है। पांचवें श्लोक में, त्रिपुरासुरों का संहार करने वाले, गिरिजा के स्वामी, अंतःकरण में सदैव शांति प्रदान करने वाले, देवताओं के हृदयों में प्रकाशमान देवेश्वर की वंदना की जाती है। छठा श्लोक जिनके केश गंगा नदी से भीगे हुए हैं, जो देवताओं के राजा हैं, भक्तों के हृदय में निवास करते हैं, क्लेशों को दूर कर समस्त संपत्तियों को प्रदान करने वाले शंभू को नमन करता है।

सातवां श्लोक हाथ में पिनाक धनुष धारण करने वाले, लोकों को कल्याण प्रदान करने वाले, देवताओं द्वारा पूजित, परमपद ही जिनका निवास स्थान है, उन शिव की वंदना करता है। अंत में, आठवां श्लोक भूतगणों के अधिपति, माया से परे स्थित शुद्ध स्वरूप, सभी आपदाओं से रक्षा करने वाले, प्रातःकाल और सायंकाल में निरंतर प्रार्थना किए जाने वाले शिव को नमन करता है।

प्रयोजन (Benefits):

  • पाप क्षय और क्लेश निवृत्ति: इस अष्टकम का नियमित पाठ करने से सभी पाप नष्ट होते हैं और मानसिक तथा शारीरिक क्लेश दूर होते हैं।
  • आंतरिक शांति और दिव्य सुरक्षा: शिव के विभिन्न रूपों का स्मरण करने से भक्तों को आंतरिक स्थिरता, शांति प्राप्त होती है और सभी बाधाओं से दिव्य सुरक्षा मिलती है।
  • आध्यात्मिक प्रगति: यह आध्यात्मिक अनुशासन को मजबूत करता है और भक्तों को मोक्ष के मार्ग पर ले जाता है, जिससे वे शिव की कृपा के पात्र बनते हैं।
  • समस्त संपत्ति और समृद्धि: शंभू की स्तुति करने से भक्तों को लौकिक संपत्ति, समृद्धि और मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं।
  • मोक्ष प्राप्ति: अंततः, इस स्तोत्र का निरंतर पाठ शिव की अनुग्रह प्राप्त कर शैवपद प्राप्ति अर्थात् मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री शंकराष्टकं क्या है?
श्री शंकराष्टकं स्वामी ब्रह्मानंद द्वारा भगवान शिव के विभिन्न रूपों, महिमा और गुणों की स्तुति में रचित आठ श्लोकों का एक भक्तिमय स्तोत्र है। यह शैव सिद्धांत के गहरे भावों को समाहित करता है।
श्री शंकराष्टकं का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस अष्टकम का पाठ प्रतिदिन सुबह और शाम शुद्ध मन से, भगवान शिव का ध्यान करते हुए करना उत्तम है। स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण कर पाठ करने से अधिक फलदायी होता है।
श्री शंकराष्टकं के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
इसके पाठ से पापों का नाश होता है, सांसारिक दुख दूर होते हैं, आंतरिक शांति मिलती है, दिव्य सुरक्षा प्राप्त होती है और अंततः शिव की कृपा से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
श्री शंकराष्टकं का पाठ कौन कर सकता है?
भगवान शिव में भक्ति और श्रद्धा रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। यह लिंग, जाति या आयु के भेद के बिना सभी के लिए खुला है।
श्री शंकराष्टकं का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
नियमित रूप से प्रतिदिन एक या तीन बार पाठ करना उत्तम है। भक्ति की गहराई के आधार पर अधिक बार भी पाठ किया जा सकता है, लेकिन निरंतरता महत्वपूर्ण है।
श्री शंकराष्टकं का मूल या रचयिता कौन हैं?
श्री शंकराष्टकं की रचना स्वामी ब्रह्मानंद ने की है। यह भगवान शिव के विविध रूपों और उनकी महिमा का मनोहारी वर्णन करता है।

टिप्पणियाँ

टिप्पणी लिखने के लिए लॉगिन करें

टिप्पणियाँ लोड हो रही हैं...