श्री शंभुदेव प्रार्थन
जय फालनयन श्रितलोलनयन सितशैलनयन शर्वा |
जय कालकाल जय मृत्युमृत्यु जय देवदेव शंभो || 1 ||
जय चंद्रमौळि नमदिंद्रमौळि मणिसांद्रहेळि चरणा |
जय योगमार्ग जितरागदुर्ग मुनियागभाग भर्गा || 2 ||
जय स्वर्गवासि मतिवर्गभासि प्रतिसर्गसर्ग कल्पा |
जय बंधुजीव सुमबंधुजीव समसांध्य राग जूटा || 3 ||
जय चंडचंडतर तांडवोग्रभर कंपमान भुवना |
जय हार हीर घनसार सारतर शारदाभ्ररूपा || 4 ||
जय शृंगि शृंगि श्रुति भृंगि भृंगि भृति नंदि नंदि विनुती |
जय कालकंठ कलकंठकंठ सुरसुंदरीस्तुत श्री || 5 ||
जय भावजात समभावजात सुकळाजित प्रियाह्री |
जय दग्धभाव भव स्निग्धभाव भव मुग्धभाव भवना || 6 ||
जय रुंडमालि जय रूक्षवीक्ष रुचिरुंद्ररूप रुद्रा |
जय नासिकाग्र नयनोग्र दृष्टि जनिताग्नि भुग्न विभवा || 7 ||
जय घोर घोरतरतापजाप तप उग्ररूप विजिता |
जय कांतिमालि जय क्रांतिकेलि जय शांतिशालि शूली || 8 ||
जय सूर्यचंद्रशिखि सूचनाग्र नयलोचनाग्र उग्रा |
जय ब्रह्म विष्णु पुरुहूत मुख्य सुरसन्नुतांघ्रि युग्मा || 9 ||
जय फालनेत्र जय चंद्रशीर्ष जय नागभूष शूली |
जय कालकाल जय मृत्युमृत्यु जय देवदेव शंभो || 10 ||
अर्थ
श्री शंभुदेव प्रार्थन स्तोत्र भगवान शिव की महिमा, उनके संरक्षक स्वरूप और उनके विश्वरूप का अत्यंत काव्यात्मक रूप से स्तुति करने वाला एक पवित्र भजन है। इस स्तोत्र का प्रत्येक श्लोक 'जय' शब्द से शुरू होता है, जो शिव की प्रत्येक शक्ति, रूप और ब्रह्मांड की सृष्टि-लय के कर्तव्यों की प्रशंसा करता है। यह भक्तों को भय, दुख और अज्ञान से मुक्ति प्रदान कर आंतरिक शांति और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है।
यह प्रार्थना शिव के अनंत गुणों का गहराई से वर्णन करती है। पहला श्लोक शिव को फालनेत्रधारी, हृदय के रक्षक, देवताओं के देव, काल के भी काल और मृत्यु के भी मृत्यु के रूप में चित्रित करता है। यह अटूट विश्वास दिलाता है कि यदि शिव की कृपा हो तो मृत्यु भी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। दूसरा श्लोक शिव के मस्तक पर चंद्रमा की शोभा, इंद्र द्वारा पूजे जाने वाले उनके चरण, योग मार्ग के प्रदर्शक और राग-द्वेष को जीतने वाले शुद्ध चैतन्य स्वरूप की प्रशंसा करता है। यह बताता है कि शिव केवल एक भौतिक रूप नहीं, बल्कि शुद्ध ज्ञान और चेतना के प्रतीक हैं।
अगले श्लोक शिव के विश्व रूप को उजागर करते हैं। तीसरा श्लोक शिव को तीनों लोकों के रक्षक, युग के अंत में प्रकृति का पुन: सृजन करने वाले नित्य कर्ता और ज्ञान के मार्ग को प्रकाशित करने वाली दिव्य ज्योति के रूप में चित्रित करता है। चौथा श्लोक शिव के तांडव नृत्य के भयानक रूप का वर्णन करता है, जिससे ब्रह्मांड कांप उठता है। यह कहता है कि उनके हार और दिव्य रूप शरद ऋतु के बादलों की तरह चमकते हैं। पांचवां श्लोक गंधर्वों, नंदी और भृंगी जैसे शिव के प्रमुख भक्तों का स्मरण करता है और शिव को कालकंठ, विषनाशक और देवताओं द्वारा पूजे जाने वाले कांतिमान स्वरूप के रूप में स्तुति करता है।
छठा श्लोक बताता है कि सृष्टि की सभी भावनाएं शिव से ही उत्पन्न होती हैं और वे भक्तों पर स्नेह बरसाकर उनकी रक्षा करते हैं। सातवां श्लोक शिव के रूक्ष, उग्र, रुद्र रूप का वर्णन करता है, जो दुष्टों का संहार करने और पापों को जलाने के लिए अग्नि की तरह कार्य करता है। आठवां श्लोक शिव को भयानक तापों को दूर करने वाले देव के रूप में, शांति, शक्ति और विजय प्रदान करने वाले शूलपाणि के रूप में पूजता है। नौवां श्लोक कहता है कि सूर्य, चंद्रमा और अग्नि की ज्योति शिव की दृष्टि में निहित है और वे ब्रह्मा, विष्णु और इंद्र से भी श्रेष्ठ एकमात्र परमेश्वर हैं। दसवां श्लोक फालनेत्र, नागाभरण, शूलपाणि शिव को काल के भी काल और मृत्यु के भी मृत्यु के रूप में दोहराता है और देवताओं के देव शंभु को शाश्वत शरण प्रदान करने की बात कहता है।
लाभ (Benefits):
- भय और आपदाओं का निवारण: इस स्तोत्र के पाठ से भक्तों के मन से भय, चिंता और सभी प्रकार की आपदाएं दूर होती हैं, और अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है।
- मानसिक शांति और साहस: शिव की महिमा का गुणगान करने से मन को अपार शांति, स्थिरता और किसी भी चुनौती का सामना करने का साहस प्राप्त होता है।
- परिवार की रक्षा और स्वास्थ्य: यह प्रार्थना परिवार के सदस्यों को सुरक्षा, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु प्रदान करती है, और शुभता लाती है।
- पाप क्षय और शिवानुग्रह: नियमित पाठ से संचित पापों का नाश होता है, और भक्त भगवान शिव की विशेष कृपा के पात्र बनते हैं, जो मोक्ष के मार्ग को सुगम बनाता है।
- आध्यात्मिक विकास: योग मार्ग में प्रगति करने, आंतरिक शुद्धता प्राप्त करने और शिव के साथ गहरा आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने में यह स्तोत्र सहायक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री शंभुदेव प्रार्थन क्या है?
श्री शंभुदेव प्रार्थन का पाठ कब करना चाहिए?
इस स्तोत्र के पाठ के प्रमुख लाभ क्या हैं?
इस प्रार्थना का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री शंभुदेव प्रार्थन स्तोत्र का मूल क्या है?
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