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श्री रुद्र स्तुतिः

संपादन: अद्यतन
स्तोत्रशिव
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श्री रुद्र स्तुतिः

नमो देवाय महते देवदेवाय शूलिने |
त्र्यंबकाय त्रिनेत्राय योगिनां पतये नमः || 1 ||

नमोऽस्तु देवदेवाय महादेवाय वेधसे |
शंभवे स्थाणवे नित्यं शिवाय परमात्मने || 2 ||

नमः सोमाय रुद्राय महाग्रासाय हेतवे |
प्रपद्येहं विरूपाक्षं शरण्यं ब्रह्मचारिणं || 3 ||

महादेवं महायोगमीशानं त्वंबिकापतिं |
योगिनां योगदाकारं योगमायासमाहृतं || 4 ||

योगिनां गुरुमाचार्यं योगगम्यं सनातनं |
संसारतारणं रुद्रं ब्रह्माणं ब्रह्मणोऽधिपं || 5 ||

शाश्वतं सर्वगं शांतं ब्रह्माणं ब्राह्मणप्रियं |
कपर्दिनं कळामूर्तिममूर्तिममरेश्वरं || 6 ||

एकमूर्तिं महामूर्तिं वेदवेद्यं सतां गतिं |
नीलकंठं विश्वमूर्तिं व्यापिनं विश्वरेतसं || 7 ||

कालाग्निं कालदहनं कामिनं कामनाशनं |
नमामि गिरिशं देवं चंद्रावयवभूषणं || 8 ||

त्रिलोचनं लेलिहानमादित्यं परमेष्ठिनं |
उग्रं पशुपतिं भीमं भास्करं तमसः परं || 9 ||

इति श्रीकूर्मपुराणे व्यासोक्त रुद्रस्तुतिः ||

अर्थ

श्री रुद्र स्तुतिः, कूर्म पुराण से उद्भूत महर्षि व्यास द्वारा रचित भगवान शिव की एक अत्यंत शक्तिशाली और विस्तृत स्तुति है। इस स्तोत्र में व्यास जी महादेव को परब्रह्म स्वरूप, योगियों के अधिपति, काल के संहारक और समस्त जगत के मूल कारण के रूप में महिमामंडित करते हैं। प्रत्येक श्लोक में शिव के एक अद्वितीय दिव्य रूप, शक्ति और तत्व का स्पष्ट प्रतिबिंब दिखाई देता है, जो भक्तों को उनकी असीम महिमा का अनुभव कराता है।

यह स्तोत्र भगवान शिव को देवादिदेव, त्रिशूलधारी, त्रिनेत्रधारी, योगियों के स्वामी और समस्त लोकों के नायक के रूप में संबोधित करते हुए प्रारंभ होता है। दूसरे श्लोक में, उन्हें शंभु, स्थाणु, परमात्मा और नित्यमूर्ति के रूप में स्मरण किया जाता है। सोम-विभूषण, विरूपाक्ष, शरणागतों के रक्षक और ब्रह्मचारी के रूप में वर्णित शिव, सभी प्रकार के भय से मुक्ति प्रदान करने वाले परम आश्रय दाता के रूप में प्रकट होते हैं। वे महान योगी, अंबिकापति, योग मार्ग के पथप्रदर्शक और योगमाया को नियंत्रित करने वाले परमेश्वर हैं।

आगे, शिव को योगियों के गुरु, आचार्य, सनातन तत्व और संसार सागर से उद्धार करने वाले रुद्र के रूप में स्तुति किया जाता है। वे ब्रह्मा स्वरूप, ब्राह्मणों के प्रिय, शाश्वत और अचल स्वरूप हैं। उन्हें कपर्दी, कलामूर्ति, अमूर्ति और अमरेशवर (देवताओं के स्वामी) के रूप में भी वर्णित किया गया है। वे एक मूर्ति होते हुए भी महामूर्ति के रूप में विस्तारित हैं – वेदों द्वारा जानने योग्य, सत्पुरुषों की गति, नीलकंठ, विश्वमूर्ति और विश्वरेतस (समस्त सृष्टि का बीज तत्व) हैं।

वे कालाग्नि, कालदहन – समस्त काल को भस्म करने वाली शक्ति के प्रतीक हैं। कामदेव के अहंकार को नष्ट करने वाले कामनाशक भी वही हैं। चंद्रमा से सुशोभित, त्रिलोचन, आदि-मध्य-अंत रहित परमेश्वर। पशुपति, भीम, उग्र और भास्वर तेज से युक्त शिव की स्तुति करने से शरणागतों को पूर्ण सुरक्षा प्राप्त होती है। स्तोत्र के अंत में कूर्म पुराण यह घोषणा करता है कि रुद्र स्तुति का पाठ करना महापुण्यदायक है, जो जीवन में शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है।

लाभ (Benefits):

  • बाधाओं, भयों और पापों का नाश: इस स्तोत्र के पाठ से जीवन की सभी बाधाएँ, भय और संचित पाप नष्ट होते हैं, जिससे मन को शांति मिलती है।
  • योग शक्ति और साहस में वृद्धि: भगवान शिव योगियों के अधिपति हैं, अतः इस स्तुति का पाठ योग अभ्यासियों को योग शक्ति, आंतरिक साहस और मानसिक स्थिरता प्रदान करता है।
  • शिव कृपा और सुरक्षा: महादेव की पूर्ण कृपा प्राप्त होती है, जिससे सभी प्रकार के खतरों से सुरक्षा, शांति और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
  • आध्यात्मिक उन्नति: यह स्तोत्र सांसारिक बंधनों को ढीला कर आध्यात्मिक ज्ञान और आत्मोन्नति के मार्ग पर प्रगति में सहायक होता है।
  • विजय, स्वास्थ्य और कल्याण: नीलकंठ के आशीर्वाद से भक्त जीवन के सभी क्षेत्रों में विजय, उत्तम स्वास्थ्य और संपूर्ण कल्याण प्राप्त करते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री रुद्र स्तुतिः क्या है?
श्री रुद्र स्तुतिः कूर्म पुराण में महर्षि व्यास द्वारा रचित भगवान शिव की महिमा का वर्णन करने वाला एक शक्तिशाली स्तोत्र है। यह शिव को परब्रह्म स्वरूप और योगियों के अधिपति के रूप में प्रस्तुत करता है।
श्री रुद्र स्तुतिः का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तुति का पाठ प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद, शुद्ध मन और भक्ति के साथ करना चाहिए। विशेष रूप से सोमवार या शिवरात्रि के दिन इसका पाठ अधिक फलदायी माना जाता है।
इस स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ मिलते हैं?
श्री रुद्र स्तुति के पाठ से बाधाएं, भय और पाप दूर होते हैं। यह योग शक्ति, साहस, शांति, ऐश्वर्य, शिव कृपा और आध्यात्मिक प्रगति प्रदान करता है।
श्री रुद्र स्तुतिः का पाठ किसे करना चाहिए?
भगवान शिव के भक्त, योग अभ्यास करने वाले, आध्यात्मिक साधक और जीवन में शांति, सुरक्षा तथा समृद्धि चाहने वाले कोई भी व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।
श्री रुद्र स्तुतिः का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
आमतौर पर, प्रतिदिन एक या तीन बार पाठ करना शुभ माना जाता है। विशेष अवसरों पर 11, 21, या 108 बार भी पाठ किया जा सकता है। आप अपनी सुविधा के अनुसार पाठ की संख्या निर्धारित कर सकते हैं।
श्री रुद्र स्तुतिः का मूल स्रोत क्या है?
यह स्तोत्र हिंदू धर्म के प्रमुख पुराणों में से एक, कूर्म पुराण से लिया गया है। महर्षि व्यास को इसका रचयिता माना जाता है।

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