श्री रामदूत (आंजनेय) स्तोत्रं
रं रं रं रक्तवर्णं दिनकरवदनं तीक्ष्णदंष्ट्राकराळं
रं रं रं रम्यतेजं गिरिचलनकरं कीर्तिपंचादि वक्त्रं |
रं रं रं राजयोगं सकलशुभनिधिं सप्तभेताळभेद्यं
रं रं रं राक्षसांतं सकलदिशयशं रामदूतं नमामि || 1 ||
खं खं खं खड्गहस्तं विषज्वरहरणं वेदवेदांगदीपं
खं खं खं खड्गरूपं त्रिभुवननिलयं देवतासुप्रकाशं |
खं खं खं कल्पवृक्षं मणिमयमकुटं माय मायास्वरूपं
खं खं खं कालचक्रं सकलदिशयशं रामदूतं नमामि || 2 ||
इं इं इं इंद्रवंद्यं जलनिधिकलनं सौम्यसाम्राज्यलाभं
इं इं इं सिद्धियोगं नतजनसदयं आर्यपूज्यार्चितांगं |
इं इं इं सिंहनादं अमृतकरतलं आदिअंत्यप्रकाशं
इं इं इं चित्स्वरूपं सकलदिशयशं रामदूतं नमामि || 3 ||
सं सं सं साक्षिभूतं विकसितवदनं पिंगलाक्षं सुरक्षं
सं सं सं सत्यगीतं सकलमुनिनुतं शास्त्रसंपत्करीयं |
सं सं सं सामवेदं निपुण सुललितं नित्यतत्त्वस्वरूपं
सं सं सं सावधानं सकलदिशयशं रामदूतं नमामि || 4 ||
हं हं हं हंसरूपं स्फुटविकटमुखं सूक्ष्मसूक्ष्मावतारं
हं हं हं अंतरात्मं रविशशिनयनं रम्यगंभीरभीमं |
हं हं हं अट्टहासं सुरवरनिलयं ऊर्ध्वरोमं कराळं
हं हं हं हंसहंसं सकलदिशयशं रामदूतं नमामि || 5 ||
इति श्री रामदूत स्तोत्रं ||
अर्थ
यह "श्री रामदूत (आंजनेय) स्तोत्रं" हनुमान जी की अपार शक्ति, ज्ञान, रक्षकत्व और उनकी अटूट रामभक्ति की महिमा का वर्णन करने वाला एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है। यह स्तोत्र भक्तों को भय, रोग, शत्रु और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा प्रदान करता है, साथ ही साहस, विवेक और विजय प्रदान करता है। हनुमान जी को रामदूत के रूप में, पराक्रमी वीर के रूप में, संकटमोचक के रूप में और सभी शुभता प्रदान करने वाले देवता के रूप में इस स्तोत्र में पूजा जाता है।
प्रत्येक श्लोक में विशिष्ट बीजाक्षरों (रं, खं, इं, सं) का उपयोग करके, हनुमान जी के विभिन्न दिव्य रूपों, आयुधों, शक्तियों और उनके रक्षात्मक स्वभाव को व्यक्त किया जाता है। यह स्तोत्र हनुमान जी को रामदूत के रूप में, भयानक शत्रुओं का संहार करने वाले, भक्तों की गहराई से रक्षा करने वाले, ज्ञान प्रदान करने वाले और कालचक्र को नियंत्रित करने वाले महापराक्रमी के रूप में चित्रित करता है। इन बीजाक्षरों का उपयोग स्तोत्र को एक विशेष कंपन शक्ति प्रदान करता है, जिससे भक्तों को आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं।
पहला श्लोक 'रं' बीजाक्षर से प्रारंभ होकर हनुमान जी के रक्तवर्णीय तेज, पर्वतों को हिलाने वाले पौरुष, राक्षसों का वध करने की शक्ति, उनके पंचमुखी स्वरूप और सभी दिशाओं में फैली उनकी कीर्ति का सम्मान करता है। 'खं' बीजाक्षर से युक्त दूसरा श्लोक उनके खड्गधारी रूप, विषज्वर को दूर करने की शक्ति, वेद-वेदांगों को प्रकाशित करने वाले ज्ञान, कल्पवृक्ष के समान दानशीलता, मणिमय मुकुट धारण करने वाले, माया को नियंत्रित करने की क्षमता और कालचक्र के अधिपति होने का संकेत देता है। इंद्र द्वारा वंदनीय हनुमान जी को 'इं' बीजाक्षर का तीसरा श्लोक समुद्र की लहरों को चीर कर पार करने वाले वीरत्व को, सिंहनाद से शत्रुओं को जीतने वाले रूप को, भक्तों पर सदैव दया करने वाले स्वभाव को और चिदानंद स्वरूपत्व को प्रशंसित करता है। चौथा श्लोक 'सं' बीजाक्षर से हनुमान जी को सब कुछ के साक्षी के रूप में, शास्त्रों को समझने की विद्वत्ता से युक्त, नित्य तत्व स्वरूप के रूप में और पिंगलाक्ष के रूप में भक्तों की सदैव रक्षा करने वाले के रूप में दर्शाता है।
यह स्तोत्र हनुमान जी को उनके अनेक दिव्य रूपों में पूजता है और भक्तों को भय, रोगों, शत्रुओं, अशुभ ग्रह दोषों और सभी बाधाओं को दूर करने की दिव्य शक्ति प्रदान करता है। इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करने से मन में शांति, साहस और आत्मविश्वास बढ़ता है। हनुमान जी की कृपा से जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए आवश्यक शक्ति और विवेक प्राप्त होता है, जिससे भक्त सुखी और सफल जीवन जी पाते हैं।
लाभ (Benefits):
- अत्यंत शक्तिशाली सुरक्षा: इस स्तोत्र के नियमित पाठ से बुरी शक्तियों, शत्रुओं और नकारात्मक प्रभावों से पूर्ण सुरक्षा प्राप्त होती है।
- साहस और आत्मविश्वास में वृद्धि: हनुमान जी के पराक्रम की स्तुति करने से भक्तों में साहस, निर्भयता और आत्मविश्वास बढ़ता है, जो किसी भी चुनौती का सामना करने में सहायक होता है।
- रोग और दोषों का निवारण: विषज्वर, ग्रह दोष और अन्य बीमारियों से मुक्ति मिलती है, तथा स्वास्थ्य में सुधार होता है।
- ज्ञान और बुद्धिमत्ता: चूंकि हनुमान जी ज्ञानी और विद्वान हैं, यह स्तोत्र विद्या, वाक्पटुता और बुद्धिमत्ता प्रदान करता है।
- संकट निवारण और सफलता: जीवन में आने वाले सभी संकट, बाधाएं दूर होती हैं, और सभी कार्यों में सफलता तथा शुभ फल प्राप्त होते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री रामदूत (आंजनेय) स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ करने के प्रमुख लाभ क्या हैं?
किसे इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए?
इस स्तोत्र का कितनी बार पाठ करना चाहिए?
इस स्तोत्र का उद्गम या स्रोत क्या है?
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