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श्री आंजनेय दंडकं

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स्तोत्रहनुमान
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श्री आंजनेय दंडकं


श्री आंजनेयं प्रसन्नांजनेयं प्रभादिव्यकायं प्रकीर्ति प्रदायं भजे वायुपुत्रं भजे वालगात्रं भजेहं पवित्रं
भजे सूर्यमित्रं भजे रुद्ररूपं भजे ब्रह्मतेजं बटंचुन् प्रभातंबु सायंत्रमुन् नीनामसंकीर्तनल् जेसि
नी रूपु वर्णिंचि नीमीद ने दंडकं बॊक्कटिन् जेय नी मूर्तिगाविंचि नीसुंदरं बॆंचि नी दासदासुंडवै
रामभक्तुंडनै निन्नु नेगॊल्चॆदन् नी कटाक्षंबुनन् जूचिते वेडुकल् चेसिते ना मॊरालिंचिते नन्नु रक्षिंचिते
अंजनादेवि गर्भान्वया देव निन्नॆंच नेनॆंतवाडन् दयाशालिवै जूचियुन् दातवै ब्रोचियुन् दग्गरन् निल्चियुन् दॊल्लि
सुग्रीवुकुन्-मंत्रिवै स्वामि कार्यार्थमै येगि श्रीराम सौमित्रुलं जूचि वारिन्विचारिंचि सर्वेशु बूजिंचि यब्भानुजुं बंटु गाविंचि
वालिनिन् जंपिंचि काकुत्थ्स तिलकुन् कृपादृष्टि वीक्षिंचि किष्किंधकेतॆंचि श्रीराम कार्यार्थमै लंक केतॆंचियुन्
लंकिणिन् जंपियुन् लंकनुन् गाल्चियुन्य भ्भूमिजं जूचि यानंदमुप्पॊंगि यायुंगरंबिच्चि
यारत्नमुन् दॆच्चि श्रीरामुनकुन्निच्चि संतोषमुन्जेसि सुग्रीवुनिन् यंगदुन् जांबवंतु न्नलुन्नीलुलन् गूडि
यासेतुवुन् दाटि वानरुल्मूकलै पॆन्मूकलै यादैत्युलन् द्रुंचगा रावणुंडंत कालाग्नि रुद्रुंडुगा वच्चि
ब्रह्मांडमैनट्टि या शक्तिनिन्वैचि यालक्षणुन् मूर्छनॊंदिंपगानप्पुडे नीवु संजीविनिन्दॆच्चि सौमित्रिकिन्निच्चि प्राणंबु रक्षिंपगा
कुंभकर्णादुल न्वीरुलं बोर श्रीराम बाणाग्नि वारंदरिन् रावणुन् जंपगा नंत लोकंबु लानंदमै युंड
नव्वेळनु न्विभीषुणुन् वेडुकन् दोडुकन् वच्चि पट्टाभिषेकंबु चेयिंचि, सीतामहादेविनिन् दॆच्चि श्रीरामुकुन्निच्चि,
यंतन्नयोध्यापुरिन्जॊच्चि पट्टाभिषेकंबु संरंभमैयुन्न नीकन्न नाकॆव्वरुन् गूर्मि लेरंचु मन्निंचि श्रीरामभक्त प्रशस्तंबुगा
निन्नु सेविंचि नी कीर्तनल् चेसिनन् पापमुल्ल्बायुने भयमुलुन् दीरुने भाग्यमुल् गल्गुने साम्राज्यमुल् गल्गु संपत्तुलुन् कल्गुनो
वानराकार योभक्त मंदार योपुण्य संचार योधीर योवीर नीवे समस्तंबुगा नॊप्पि यातारक ब्रह्म मंत्रंबु पठियिंचुचुन् स्थिरम्मुगन् वज्रदेहंबुनुन् दाल्चि श्रीराम श्रीरामयंचुन् मनःपूतमैन ऎप्पुडुन् तप्पकन् तलतुना जिह्वयंदुंडि नी दीर्घदेहम्मु त्रैलोक्य संचारिवै राम नामांकितध्यानिवै ब्रह्मतेजंबुनन् रौद्रनीज्वाल कल्लोल हावीर हनुमंत ओंकार शब्दंबुलन् भूत प्रेतंबुलन् बॆन् पिशाचंबुलन् शाकिनी ढाकिनीत्यादुलन् गालिदय्यंबुलन् नीदु वालंबुनन् जुट्टि नेलंबडं गॊट्टि नीमुष्टि घातंबुलन्
बाहुदंडंबुलन् रोमखंडंबुलन् द्रुंचि कालाग्नि रुद्रुंडवै नीवु ब्रह्मप्रभाभासितंबैन नीदिव्य तेजंबुनुन् जूचि
रारोरि नामुद्दु नरसिंह यन्चुन् दयादृष्टि वीक्षिंचि नन्नेलु नास्वामियो यांजनेया नमस्ते सदा ब्रह्मचारी
नमस्ते नमोवायुपुत्रा नमस्ते नमः

 

अर्थ

श्री आंजनेय दंडकं भगवान आंजनेय स्वामी की महिमा, शक्ति और श्रीरामभक्ति को उजागर करने वाला एक अद्भुत स्तोत्र है। यह वायुपुत्र हनुमान के दिव्य रूप, अद्वितीय शौर्य और लोक कल्याण हेतु उनके द्वारा किए गए कार्यों का वर्णन करता है। इस दंडक का पाठ करने से भक्तों को साहस, धैर्य और सुरक्षा प्राप्त होती है, यह एक अटल विश्वास है। दंडक के आरंभ में, भक्त आंजनेय स्वामी के प्रसन्न रूप, प्रभासमान दिव्य शरीर और कीर्ति प्रदान करने वाले स्वभाव की स्तुति करता है। वायुपुत्र हनुमान जो पवित्र हैं, सूर्य के मित्र हैं, रुद्र के स्वरूप हैं और ब्रह्मतेज से युक्त हैं, उनका नाम स्मरण भक्त के हृदय में सदैव निवास करता है।

यह दंडक हनुमान की जीवनगाथा का गुणगान करता है, जिसमें बताया गया है कि कैसे उन्होंने सुग्रीव के श्रेष्ठ मंत्री के रूप में श्रीरामचंद्र के कार्य को सिद्ध करने के लिए निष्ठापूर्वक कार्य किया। उन्होंने श्रीराम और लक्ष्मण से भेंट की, उनके दुख का निवारण किया, सुग्रीव को श्रीराम का मित्र बनाया और धर्मपरायण सुग्रीव की सहायता कर बालि का संहार करवाया, जिससे धर्म की पुनः स्थापना हुई। ये घटनाएँ हनुमान की कूटनीति, बुद्धिमत्ता और अटूट निष्ठा को दर्शाती हैं।

तत्पश्चात्, श्रीराम की आज्ञा से सीता माता की खोज में लंका की यात्रा करने, लंकिनी का संहार करने, लंका दहन करने, सीता देवी से भेंट कर श्रीराम की मुद्रिका समर्पित करने और उनका संदेश पहुँचाने के पराक्रम का यहाँ वर्णन किया गया है। समुद्र लाँघकर लंका पहुँचने की हनुमान की असाधारण शक्ति और साहस भक्तों के लिए प्रेरणादायक है। राक्षसों का नाश और धर्म की रक्षा के लिए उनके द्वारा किए गए कार्य उनकी अजेय शक्ति और दिव्य सामर्थ्य के प्रतीक हैं।

युद्ध में जब लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे, तब संजीवनी पर्वत लाकर उनके प्राण बचाने वाले हनुमान की करुणा और त्वरित कार्य को यह दंडक स्मरण करता है। हनुमान भक्तों के पापों का नाश करते हैं, भय को दूर करते हैं, और धैर्य, भाग्य, साम्राज्य तथा धन-संपदा प्रदान करते हैं। उनके नाम का स्मरण करने से मन स्थिर होता है, दुष्ट शक्तियाँ दूर होती हैं और बाधाएँ मिट जाती हैं। उनका वज्रदेह, रौद्र तेज, राम नाम से भरी जिह्वा और भक्तों की रक्षा के लिए सदैव जागरूक स्वरूप — ये सभी इस दंडक में अद्भुत रूप से चित्रित किए गए हैं।

अंत में, भक्त स्वयं को पूर्णतः समर्पित करते हुए कहता है, "हे आंजनेय, नरसिंहसम, दयामूर्ति, ब्रह्मचारी, वायुपुत्र — आपको सदा नमस्कार है।" श्री आंजनेय दंडकं केवल एक स्तोत्र नहीं है, यह भक्त के हृदय से भय को मिटाकर, विश्वास को बढ़ाकर, और रामभक्ति की सर्वोच्च स्थिति तक पहुँचने में सहायता करने वाला एक महिमामय मार्ग है।

लाभ (Benefits):

  • भय मुक्ति: आंजनेय स्वामी के स्मरण से सभी प्रकार के भय दूर होते हैं और मन को शांति मिलती है।
  • साहस और आत्मविश्वास में वृद्धि: इस दंडक का पाठ करने से भक्तों में साहस, धैर्य और किसी भी चुनौती का सामना करने का आत्मविश्वास बढ़ता है।
  • सुरक्षा और विजय: दुष्ट शक्तियों और बाधाओं से सुरक्षा मिलती है, तथा जीवन के सभी क्षेत्रों में विजय प्राप्त होती है।
  • स्वास्थ्य और धन: उत्तम स्वास्थ्य, धन और समृद्धि आंजनेय स्वामी की कृपा से प्राप्त होती है।
  • रामभक्ति का विकास: हनुमान परम रामभक्त हैं, अतः इस दंडक का पाठ भक्तों में रामभक्ति को बढ़ाता है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री आंजनेय दंडकं क्या है?
श्री आंजनेय दंडकं भगवान हनुमान की महिमा, शक्ति और श्रीरामभक्ति का वर्णन करने वाला एक अद्भुत स्तोत्र है। यह उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं और दिव्य गुणों की स्तुति करता है।
श्री आंजनेय दंडकं का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस दंडक का पाठ प्रतिदिन सुबह और शाम, स्नान के बाद, शुद्ध मन से करना उत्तम है। हनुमान की तस्वीर या मूर्ति के सामने बैठकर भक्तिपूर्वक पाठ किया जा सकता है।
श्री आंजनेय दंडकं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस दंडक के पाठ से भय दूर होता है, साहस और आत्मविश्वास बढ़ता है, दुष्ट शक्तियों से रक्षा मिलती है और जीवन में सफलता तथा समृद्धि प्राप्त होती है।
श्री आंजनेय दंडकं का पाठ कौन कर सकता है?
कोई भी भक्त, जो आंजनेय स्वामी की कृपा प्राप्त करना चाहता है, इस दंडक का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से संकट में पड़े लोग, भयभीत व्यक्ति और आत्मविश्वास बढ़ाना चाहने वाले इसका पाठ कर सकते हैं।
इस दंडक का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
दिन में कम से कम एक बार पाठ करना शुभ माना जाता है। पूर्ण फल के लिए 11, 21, 51 या 108 बार भी पाठ किया जा सकता है। यह भक्त की श्रद्धा और समय पर निर्भर करता है।
श्री आंजनेय दंडकं का मूल या इतिहास क्या है?
यह दंडक प्राचीन काल से प्रचलित स्तोत्र है, जिसे हनुमान के पराक्रम की स्तुति में अनेक संतों और कवियों द्वारा रचा गया है। इसका सटीक मूल किसी एक व्यक्ति से संबंधित नहीं है, बल्कि यह भक्ति परंपरा का एक हिस्सा है।

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