कौसल्या सुप्रजाराम पूर्वसंध्या प्रवर्तते ।
उत्तिष्ठ नरशार्दूल कर्तव्यं दैवमान्हिकं ॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ लक्ष्मीश निंबाद्रिनिलयाच्युत ।
उत्तिष्ठ नरहर्यक्ष त्रैलोक्यं मंगलं कुरु ॥
मातर्विरंचिमुख विश्वचराचराणां
वैकुंठमंदिर मनोहर दीपरेखे ।
वंदारुभक्तजनवांछितदानशौंडे
निंबाद्रिनाथ दयिते तव सुप्रभातं ॥ 1॥
तव सुप्रभातमखिलार्थसाधिके
मधुवैरिपलिजलजातपुत्रिके ।
नवपुंडरीकदलदीर्घनेत्रिके
वर निंबशैलपतिभाग्यजीविके ॥ 2॥
वसिष्ठ कुंभभवभव्यतपःप्रभाव
कौंडिण्यसिद्धऋषयः कृतकल्यकृत्या ।
नैहीं तनुं तव विलोकयितुं प्रविष्टाः
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 3॥
प्रह्लादनारदमुखाः परतत्त्वविज्ञाः
प्रातर्विधि परिसमाप्य समागतास्ते ।
पंकेरुहैस्तव पदौ परिपूजनाय
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 4॥
सेनेशशेषगरूडादिसमस्तनित्याः
दिव्यानि भूरि विरजा जलजानि नीत्त्वा ।
प्राप्तास्त्वदीय पदपंकजपूजनाय
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 5॥
सन्निंबवृक्षसमुसंगि समीरडिंभाः
शीतैर्लतांतमकरंदकणैश्च युक्ताः ।
मंदं प्रवाति तव कंदरमंदिरांते
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 6॥
मार्तंडमंगलकरस्फुटपद्ममध्यात्
भृंगाः प्रकर्षमधुपानविशेषमत्ताः ।
गच्छंति पुष्पमनुपुष्पमदभ्रगीत्या
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 7॥
त्वं क्षेत्रगोत्रपरितस्थितघोषयोषाः
मध्नंति मंगलरवं दधिचंद्रिकाभं ।
तध्वांतमुक्ततमसः ककुभः प्रभांति
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 8॥
श्रीनिंबशैलवरकंदरमंदिरांतः
विद्योतमान रमणीय रमाश्रितांक ।
राकासुधाकरसहश्च निभास्य शोभा
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 9॥
पद्मालया सरसि नित्य कृतावगाहा
शुद्धश्च वासवमुखा सुरभक्तसंघाः ।
तिष्ठंति दार्वि तव भैरवभक्तरुद्धाः
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 10॥
श्रीनिंबशैल पिचुमर्थक पुण्यभूभृ
निंबाद्रि निंबगिरिमालक गोत्रनाम्ना ।
नित्यं वदंति निपुणास्तव गोत्रराजं
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 11॥
दुष्टं स्वपुत्ररिपुमुद्धतगर्वमत्तं
स्तंभे रमं कनककश्यपु नामधेयं ।
हर्तुं नृसिंहवपुषा सुषुषाविराज
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 12॥
भक्तस्य वागवितथं सततं प्रकर्तुं
सर्वेषु वस्तुषु च नित्यमदभृवृत्तिं ।
संदर्शयन् दनुजनालकृतावतार
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 13॥
आदित्यसोमकुजसौम्य सुरार्यशुक्र
स्वर्भानुकेतुमुखदिव्यनवग्रहास्ते ।
तिष्ठंति दास्यमिह कर्तुमतंद्रभावाः
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 14॥
मालूररूपधर कालहारौ च वायु
रिंद्रोथ नैऋतिमुखाः ककुभीशदेवाः ।
तद्वास्थदंडहतिमंडितशीर्षदेशाः
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 15॥
त्वत्कंदरोपरि लसच्छिखराग्रभागं
दृष्टवा प्रहृष्टमनसो भवभीतिबाधान् ।
त्यक्त्वा भजंति भवदीय नगाधिराजं
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 16॥
श्री धर्मपालनृपविप्र विरंचिरुद्र
त्रैशंकुसंगत महाषु विनाशकारिन् ।
भक्तैकभोग्य गुणमंगल धामनामन्
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 17॥
लक्ष्मीनृसिंह नखरायुध वीरसिंह
गीर्वाणसिंह गिरिशाषुविभंगवहः ।
दैत्येयजिह करिकुंभ विघातसिंह
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 18॥
प्रह्लादपालक परात्परपापनाश
पिंगाक्ष पुण्यजन पीवर तुंगभंग ।
पद्मालयार्चित पवित्रपदारविंद
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 19॥
श्रीमान् श्रितार्तिहरसिंधुसुतामनोब्ज
लोलंब पत्ररथशंखरथांगपाणे ।
वात्सल्यपूर्ण वरदायक वासुदेव
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 20॥
श्रीमान्नृसिंह सुसटाब्द वृताब्जवक्त्रा
दंष्ट्रोरुदंतनखशस्त्रधरत्रिनेत्र ।
चंचल्लगुद्रसनगर्जितनिर्जितारे
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 21॥
वैकुंठसीम्नि वितता विरजा सुधोद्या
लीलाविभूतिमधिगम्य पदाश्रिता ते ।
मोक्षप्रदेति विदिता रुचिरप्रवाह
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 22॥
श्रीबेमुगल्पुरसमागतवेदरूपाः
ते माध्ववैष्णवगणाः शतशो वसंति ।
नेत्त्वा पयोद्य कमलालमला करीय्यं
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 23॥
लक्ष्मीपते नरहरे नखदंष्ट्रशालिन्
दारिद्रयदावदहन क्षमकालमेघ ।
भक्तार्तिभंजन बहुप्रदशेषशायिन्
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 24॥
प्रह्लादकारिज यतींद्र नरादि मौनि
नारायणानिल तनुजवरैश्च लक्ष्म्या ।
ताक्षर्येण भैरवमुनींद्रगणैश्च सेव्य
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 25॥
कल्याणरूप कमलाश्रितवत्सभाग
कंदर्पकोटि सुकुमार करालदंष्ट्रा ।
कारुण्यपूर्ण घनकौस्तुभरत्नहार
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 26॥
कार्तिकमासशरदिंदु विकासपूर्ण
राकातिथौ तव रथोत्सवसेवनाय ।
प्रत्यब्दमब्जभव वृंदमितोभियाति
निंबाद्रिनाथ नृहरे तव सुप्रभातं ॥ 27॥
श्रीनिंबशैल नृहरेरिह सुप्रभातं
लिंगापुरीनिलय लक्ष्मणनामकेन ।
भक्त्याकृतं प्रतिदिनं सरसं पठंति
तेषां ददाति नृहरिर्धनपुत्रभोगान् ॥ 28॥
इति श्रीनिंबाद्रीलक्ष्मीनृसिंह सुप्रभातं संपूर्णं ।
श्रीलक्ष्मीनृसिंहार्पणमस्तु ।
अर्थ
श्री निंबाद्री लक्ष्मीनृसिंह सुप्रभातम एक दिव्य प्रातःकालीन स्तोत्र है जो भगवान लक्ष्मीनृसिंह को जगाने और ब्रह्मांड को आशीर्वाद देने के लिए समर्पित है। 'कौसल्या सुप्रजा राम' जैसे पारंपरिक श्लोक से शुरू होकर, यह सुप्रभातम भगवान विष्णु के उग्र और सौम्य रूपों के संगम, भगवान नृसिंह से प्रार्थना करता है कि वे संसार के अंधकार को दूर करें और शुभ प्रभात प्रदान करें। निंबाद्री क्षेत्र में निवास करने वाले भगवान अपने भक्तों को अभय प्रदान करने वाले दयालु हैं। निंबाद्री केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं है, बल्कि भगवान की दिव्य उपस्थिति से पवित्र एक पुण्य क्षेत्र है।
यह सुप्रभातम केवल भगवान को जगाने की प्रार्थना नहीं है, बल्कि भक्तों द्वारा अपने भीतर के अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान के प्रकाश का स्वागत करने का एक आध्यात्मिक अभ्यास भी है। प्रातःकाल शुभता का प्रतीक है। इस समय भगवान नृसिंह का आह्वान करने से मन और शरीर शुद्ध होते हैं और दिन भर सकारात्मक ऊर्जा से भरे रहते हैं। नृसिंह दुष्ट शक्तियों का नाश करने वाले और सज्जनों की रक्षा करने वाले देवता हैं। इसलिए, इस सुप्रभातम का पाठ करने से सभी बाधाएं दूर होती हैं और जीवन में शांति, समृद्धि और विजय प्राप्त होती है, ऐसी मान्यता है। इस स्तोत्र का प्रत्येक श्लोक भगवान की महिमा का स्मरण कराता है और भक्तों को आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है।
प्रत्येक श्लोक निंबाद्री लक्ष्मीनृसिंह की महिमा, रूप और गुणों का वर्णन करता है। सबसे पहले, लक्ष्मी के पति, निंबाद्री में निवास करने वाले अच्युत नृसिंह स्वामी को जगाने और तीनों लोकों के लिए मंगल करने की प्रार्थना की जाती है। ब्रह्मा सहित सभी देवता, वसिष्ठ, कौंडिन्य जैसे महर्षि, प्रह्लाद, नारद जैसे परम भक्त, गरुड़, आदिशेष जैसे नित्य सेवक स्वामी के सुप्रभातम दर्शन के लिए उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हैं, ऐसा वर्णन किया गया है। नीम के वृक्षों से आती सुगंधित हवाएं, उगता सूरज, खिले हुए कमल और भिनभिनाते भौंरे - पूरी प्रकृति ही भगवान को सुप्रभातम गा रही है। यह भगवान की सर्वव्यापकता को दर्शाता है।
निंबशैल की गुफा के भीतर लक्ष्मी सहित तेजस्वी रूप में प्रकाशित स्वामी, हिरण्यकशिपु का संहार कर प्रह्लाद की रक्षा करने वाले करुणावान हैं। उनके नख भक्तों के रक्षा कवच हैं और वे दरिद्रता को दूर करने वाले कालमेघ स्वरूप हैं। जिस प्रकार उन्होंने प्रह्लाद को अभय प्रदान किया, उसी प्रकार वे अपने भक्तों को भी सदैव रक्षा प्रदान करते हैं। लक्ष्मण नामक भक्त द्वारा रचित इस सुप्रभातम का पाठ करने से सभी शुभ फल प्राप्त होते हैं, यह स्तोत्र बताता है। निंबाद्री क्षेत्र पृथ्वी पर सबसे पवित्र स्थानों में से एक है, जहाँ भगवान की शाश्वत कीर्ति प्रवाहित होती है।
लाभ (Benefits):
- सभी संकटों का निवारण: श्री लक्ष्मीनृसिंह स्वामी का उग्र रूप दुष्ट शक्तियों, भय और बाधाओं को दूर करता है। इस सुप्रभातम का पाठ करने से जीवन में आने वाली कठिनाइयाँ, अरिष्ट दूर होते हैं और मन को शांति मिलती है।
- स्वास्थ्य और धन: देवी लक्ष्मी की उपस्थिति के कारण, यह सुप्रभातम उत्तम स्वास्थ्य, धन, धान्य और समृद्धि प्रदान करता है। दरिद्रता दूर होकर ऐश्वर्य की वृद्धि होती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
- मानसिक शांति और अभय: जिस प्रकार प्रह्लाद की रक्षा की, उसी प्रकार भक्तों को सभी प्रकार के भय और चिंताओं से मुक्त कर मानसिक शांति प्रदान करता है। बुरे विचार दूर होते हैं और मन निर्मल होता है, जिससे आंतरिक शक्ति बढ़ती है।
- ज्ञान और भक्ति की वृद्धि: परमतत्व स्वरूप नृसिंह स्वामी के स्मरण से ज्ञान की वृद्धि होती है और भगवान के प्रति भक्ति गहरी होती है। यह आध्यात्मिक प्रगति में सहायक है और जीवन के अंतिम लक्ष्य मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
- संतान और सौभाग्य: इस सुप्रभातम के नियमित पाठ से संतान सुख प्राप्त होता है और परिवार में सौभाग्य आता है, ऐसा माना जाता है। यह पारिवारिक जीवन में सामंजस्य और प्रसन्नता लाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री निंबाद्री लक्ष्मीनृसिंह सुप्रभातम क्या है?
इस सुप्रभातम का पाठ कब करना चाहिए?
श्री निंबाद्री लक्ष्मीनृसिंह सुप्रभातम के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
यह सुप्रभातम कौन पाठ कर सकता है?
इस सुप्रभातम का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
श्री निंबाद्री लक्ष्मीनृसिंह सुप्रभातम का उद्गम क्या है?
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