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श्री लक्ष्मी सहस्रनाम स्तोत्रं

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सहस्रनामलक्ष्मी देवी
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नाम्नां साष्टसहस्रं च ब्रूहि गार्ग्य महामते |
महालक्ष्म्या महादेव्याः भुक्तिमुक्त्यर्थसिद्धये || 1 ||

गार्ग्य उवाच |
सनत्कुमारमासीनं द्वादशादित्यसन्निभं |
अपृच्छन्योगिनो भक्त्या योगिनामर्थसिद्धये || 2 ||

सर्वलौकिककर्मभ्यो विमुक्तानां हिताय वै |
भुक्तिमुक्तिप्रदं जप्यमनुब्रूहि दयानिधे || 3 ||

सनत्कुमार भगवन् सर्वज्ञोऽसि विशेषतः |
आस्तिक्यसिद्धये नॄणां क्षिप्रधर्मार्थसाधनं || 4 ||

खिद्यंति मानवास्सर्वे धनाभावेन केवलं |
सिद्ध्यंति धनिनोऽन्यस्य नैव धर्मार्थकामनाः || 5 ||

दारिद्र्यध्वंसिनी नाम केन विद्या प्रकीर्तिता |
केन वा ब्रह्मविद्याऽपि केन मृत्युविनाशिनी || 6 ||

सर्वासां सारभूतैका विद्यानां केन कीर्तिता |
प्रत्यक्षसिद्धिदा ब्रह्मन् तामाचक्ष्व दयानिधे || 7 ||

सनत्कुमार उवाच |
साधु पृष्टं महाभागाः सर्वलोकहितैषिणः |
महतामेष धर्मश्च नान्येषामिति मे मतिः || 8 ||

ब्रह्मविष्णुमहादेवमहेंद्रादिमहात्मभिः |
संप्रोक्तं कथयाम्यद्य लक्ष्मीनामसहस्रकं || 9 ||

यस्योच्चारणमात्रेण दारिद्र्यान्मुच्यते नरः |
किं पुनस्तज्जपाज्जापी सर्वेष्टार्थानवाप्नुयात् || 10 ||

अस्य श्रीलक्ष्मीदिव्यसहस्रनामस्तोत्र महामंत्रस्य आनंदकर्दमचिक्लीतेंदिरासुतादयो महात्मानो महर्षयः अनुष्टुप्छंदः विष्णुमाया शक्तिः महालक्ष्मीः परादेवता श्रीमहालक्ष्मी प्रसादद्वारा सर्वेष्टार्थसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः | श्रीमित्यादि षडंगन्यासः |

ध्यानं |
पद्मनाभप्रियां देवीं पद्माक्षीं पद्मवासिनीं |
पद्मवक्त्रां पद्महस्तां वंदे पद्मामहर्निशं || 1 ||

पूर्णेंदुवदनां दिव्यरत्नाभरणभूषितां |
वरदाभयहस्ताढ्यां ध्यायेच्चंद्रसहोदरीं || 2 ||

इच्छारूपां भगवतस्सच्चिदानंदरूपिणीं |
सर्वज्ञां सर्वजननीं विष्णुवक्षस्स्थलालयां |
दयाळुमनिशं ध्यायेत्सुखसिद्धिस्वरूपिणीं || 3 ||

स्तोत्रं –
ॐ नित्यागतानंतनित्या नंदिनी जनरंजनी |
नित्यप्रकाशिनी चैव स्वप्रकाशस्वरूपिणी || 1 ||

महालक्ष्मीर्महाकाळी महाकन्या सरस्वती |
भोगवैभवसंधात्री भक्तानुग्रहकारिणी || 2 ||

ईशावास्या महामाया महादेवी महेश्वरी |
हृल्लेखा परमा शक्तिर्मातृकाबीजरूपिणी || 3 ||

नित्यानंदा नित्यबोधा नादिनी जनमोदिनी |
सत्यप्रत्ययनी चैव स्वप्रकाशात्मरूपिणी || 4 ||

त्रिपुरा भैरवी विद्या हंसा वागीश्वरी शिवा |
वाग्देवी च महारात्रिः कालरात्रिस्त्रिलोचना || 5 ||

भद्रकाळी कराळी च महाकाळी तिलोत्तमा |
काळी कराळवक्त्रांता कामाक्षी कामदा शुभा || 6 ||

चंडिका चंडरूपेशा चामुंडा चक्रधारिणी |
त्रैलोक्यजयिनी देवी त्रैलोक्यविजयोत्तमा || 7 ||

सिद्धलक्ष्मीः क्रियालक्ष्मीर्मोक्षलक्ष्मीः प्रसादिनी |
उमा भगवती दुर्गा चांद्री दाक्षायणी शिवा || 8 ||

प्रत्यंगिरा धरा वेला लोकमाता हरिप्रिया |
पार्वती परमा देवी ब्रह्मविद्याप्रदायिनी || 9 ||

अरूपा बहुरूपा च विरूपा विश्वरूपिणी |
पंचभूतात्मिका वाणी पंचभूतात्मिका परा || 10 ||

काळी मा पंचिका वाग्मी हविःप्रत्यधिदेवता |
देवमाता सुरेशाना देवगर्भाऽंबिका धृतिः || 11 ||

संख्या जातिः क्रियाशक्तिः प्रकृतिर्मोहिनी मही |
यज्ञविद्या महाविद्या गुह्यविद्या विभावरी || 12 ||

ज्योतिष्मती महामाता सर्वमंत्रफलप्रदा |
दारिद्र्यध्वंसिनी देवी हृदयग्रंथिभेदिनी || 13 ||

सहस्रादित्यसंकाशा चंद्रिका चंद्ररूपिणी |
गायत्री सोमसंभूतिस्सावित्री प्रणवात्मिका || 14 ||

शांकरी वैष्णवी ब्राह्मी सर्वदेवनमस्कृता |
सेव्यदुर्गा कुबेराक्षी करवीरनिवासिनी || 15 ||

जया च विजया चैव जयंती चाऽपराजिता |
कुब्जिका काळिका शास्त्री वीणापुस्तकधारिणी || 16 ||

सर्वज्ञशक्तिः श्रीशक्तिर्ब्रह्मविष्णुशिवात्मिका |
इडापिंगळिकामध्यमृणाळीतंतुरूपिणी || 17 ||

यज्ञेशानी प्रथा दीक्षा दक्षिणा सर्वमोहिनी |
अष्टांगयोगिनी देवी निर्बीजध्यानगोचरा || 18 ||

सर्वतीर्थस्थिता शुद्धा सर्वपर्वतवासिनी |
वेदशास्त्रप्रमा देवी षडंगादिपदक्रमा || 19 ||

शिवा धात्री शुभानंदा यज्ञकर्मस्वरूपिणी |
व्रतिनी मेनका देवी ब्रह्माणी ब्रह्मचारिणी || 20 ||

एकाक्षरपरा तारा भवबंधविनाशिनी |
विश्वंभरा धराधारा निराधाराऽधिकस्वरा || 21 ||

राका कुहूरमावास्या पूर्णिमाऽनुमतिर्द्युतिः |
सिनीवाली शिवाऽवश्या वैश्वदेवी पिशंगिला || 22 ||

पिप्पला च विशालाक्षी रक्षोघ्नी वृष्टिकारिणी |
दुष्टविद्राविणी देवी सर्वोपद्रवनाशिनी || 23 ||

शारदा शरसंधाना सर्वशस्त्रस्वरूपिणी |
युद्धमध्यस्थिता देवी सर्वभूतप्रभंजनी || 24 ||

अयुद्धा युद्धरूपा च शांता शांतिस्वरूपिणी |
गंगा सरस्वतीवेणीयमुनानर्मदापगा || 25 ||

समुद्रवसनावासा ब्रह्मांडश्रेणिमेखला |
पंचवक्त्रा दशभुजा शुद्धस्फटिकसन्निभा || 26 ||

रक्ता कृष्णा सिता पीता सर्ववर्णा निरीश्वरी |
काळिका चक्रिका देवी सत्या तु बटुकास्थिता || 27 ||

तरुणी वारुणी नारी ज्येष्ठादेवी सुरेश्वरी |
विश्वंभराधरा कर्त्री गलार्गलविभंजनी || 28 ||

संध्यारात्रिर्दिवाज्योत्स्ना कलाकाष्ठा निमेषिका |
उर्वी कात्यायनी शुभ्रा संसारार्णवतारिणी || 29 ||

कपिला कीलिकाऽशोका मल्लिकानवमल्लिका |
देविका नंदिका शांता भंजिका भयभंजिका || 30 ||

कौशिकी वैदिकी देवी सौरी रूपाधिकाऽतिभा |
दिग्वस्त्रा नववस्त्रा च कन्यका कमलोद्भवा || 31 ||

श्रीस्सौम्यलक्षणाऽतीतदुर्गा सूत्रप्रबोधिका |
श्रद्धा मेधा कृतिः प्रज्ञा धारणा कांतिरेव च || 32 ||

श्रुतिः स्मृतिर्धृतिर्धन्या भूतिरिष्टिर्मनीषिणी |
विरक्तिर्व्यापिनी माया सर्वमायाप्रभंजनी || 33 ||

माहेंद्री मंत्रिणी सिंही चेंद्रजालस्वरूपिणी |
अवस्थात्रयनिर्मुक्ता गुणत्रयविवर्जिता || 34 ||

ईषणत्रयनिर्मुक्ता सर्वरोगविवर्जिता |
योगिध्यानांतगम्या च योगध्यानपरायणा || 35 ||

त्रयीशिखा विशेषज्ञा वेदांतज्ञानरूपिणी |
भारती कमला भाषा पद्मा पद्मवती कृतिः || 36 ||

गौतमी गोमती गौरी ईशाना हंसवाहिनी |
नारायणी प्रभाधारा जाह्नवी शंकरात्मजा || 37 ||

चित्रघंटा सुनंदा श्रीर्मानवी मनुसंभवा |
स्तंभिनी क्षोभिणी मारी भ्रामिणी शत्रुमारिणी || 38 ||

मोहिनी द्वेषिणी वीरा अघोरा रुद्ररूपिणी |
रुद्रैकादशिनी पुण्या कल्याणी लाभकारिणी || 39 ||

देवदुर्गा महादुर्गा स्वप्नदुर्गाऽष्टभैरवी |
सूर्यचंद्राग्निरूपा च ग्रहनक्षत्ररूपिणी || 40 ||

बिंदुनादकळातीता बिंदुनादकळात्मिका |
दशवायुजयाकारा कळाषोडशसंयुता || 41 ||

काश्यपी कमलादेवी नादचक्रनिवासिनी |
मृडाधारा स्थिरा गुह्या देविका चक्ररूपिणी || 42 ||

अविद्या शार्वरी भुंजा जंभासुरनिबर्हिणी |
श्रीकाया श्रीकला शुभ्रा कर्मनिर्मूलकारिणी || 43 ||

आदिलक्ष्मीर्गुणाधारा पंचब्रह्मात्मिका परा |
श्रुतिर्ब्रह्ममुखावासा सर्वसंपत्तिरूपिणी || 44 ||

मृतसंजीवनी मैत्री कामिनी कामवर्जिता |
निर्वाणमार्गदा देवी हंसिनी काशिका क्षमा || 45 ||

सपर्या गुणिनी भिन्ना निर्गुणा खंडिताशुभा |
स्वामिनी वेदिनी शक्या शांबरी चक्रधारिणी || 46 ||

दंडिनी मुंडिनी व्याघ्री शिखिनी सोमसंहतिः |
चिंतामणिश्चिदानंदा पंचबाणप्रबोधिनी || 47 ||

बाणश्रेणिस्सहस्राक्षी सहस्रभुजपादुका |
संध्यावलिस्त्रिसंध्याख्या ब्रह्मांडमणिभूषणा || 48 ||

वासवी वारुणीसेना कुलिका मंत्ररंजनी |
जितप्राणस्वरूपा च कांता काम्यवरप्रदा || 49 ||

मंत्रब्राह्मणविद्यार्था नादरूपा हविष्मती |
आथर्वणिः श्रुतिः शून्या कल्पनावर्जिता सती || 50 ||

सत्ताजातिः प्रमाऽमेयाऽप्रमितिः प्राणदा गतिः |
अवर्णा पंचवर्णा च सर्वदा भुवनेश्वरी || 51 ||

त्रैलोक्यमोहिनी विद्या सर्वभर्त्री क्षराऽक्षरा |
हिरण्यवर्णा हरिणी सर्वोपद्रवनाशिनी || 52 ||

कैवल्यपदवीरेखा सूर्यमंडलसंस्थिता |
सोममंडलमध्यस्था वह्निमंडलसंस्थिता || 53 ||

वायुमंडलमध्यस्था व्योममंडलसंस्थिता |
चक्रिका चक्रमध्यस्था चक्रमार्गप्रवर्तिनी || 54 ||

कोकिलाकुलचक्रेशा पक्षतिः पंक्तिपावनी |
सर्वसिद्धांतमार्गस्था षड्वर्णावरवर्जिता || 55 ||

शररुद्रहरा हंत्री सर्वसंहारकारिणी |
पुरुषा पौरुषी तुष्टिस्सर्वतंत्रप्रसूतिका || 56 ||

अर्धनारीश्वरी देवी सर्वविद्याप्रदायिनी |
भार्गवी याजुषीविद्या सर्वोपनिषदास्थिता || 57 || [भूजुषीविद्या]

व्योमकेशाखिलप्राणा पंचकोशविलक्षणा |
पंचकोशात्मिका प्रत्यक्पंचब्रह्मात्मिका शिवा || 58 ||

जगज्जराजनित्री च पंचकर्मप्रसूतिका |
वाग्देव्याभरणाकारा सर्वकाम्यस्थितास्थितिः || 59 ||

अष्टादशचतुष्षष्टिपीठिका विद्ययायुता |
कालिकाकर्षणश्यामा यक्षिणी किन्नरेश्वरी || 60 ||

केतकी मल्लिकाऽशोका वाराही धरणी ध्रुवा |
नारसिंही महोग्रास्या भक्तानामार्तिनाशिनी || 61 ||

अंतर्बला स्थिरा लक्ष्मीर्जरामरणनाशिनी |
श्रीरंजिता महाकाया सोमसूर्याग्निलोचना || 62 ||

अदितिर्देवमाता च अष्टपुत्राऽष्टयोगिनी |
अष्टप्रकृतिरष्टाष्टविभ्राजद्विकृताकृतिः || 63 ||

दुर्भिक्षध्वंसिनी देवी सीता सत्या च रुक्मिणी |
ख्यातिजा भार्गवी देवी देवयोनिस्तपस्विनी || 64 ||

शाकंभरी महाशोणा गरुडोपरिसंस्थिता |
सिंहगा व्याघ्रगा देवी वायुगा च महाद्रिगा || 65 ||

अकारादिक्षकारांता सर्वविद्याधिदेवता |
मंत्रव्याख्याननिपुणा ज्योतिश्शास्त्रैकलोचना || 66 ||

इडापिंगळिकामध्यसुषुम्ना ग्रंथिभेदिनी |
कालचक्राश्रयोपेता कालचक्रस्वरूपिणी || 67 ||

वैशारदी मतिश्रेष्ठा वरिष्ठा सर्वदीपिका |
वैनायकी वरारोहा श्रोणिवेला बहिर्वळिः || 68 ||

जंभिनी जृंभिणी जंभकारिणी गणकारिका | [जृंभ]
शरणी चक्रिकाऽनंता सर्वव्याधिचिकित्सकी || 69 ||

देवकी देवसंकाशा वारिधिः करुणाकरा |
शर्वरी सर्वसंपन्ना सर्वपापप्रभंजनी || 70 ||

एकमात्रा द्विमात्रा च त्रिमात्रा च तथा परा |
अर्धमात्रा परा सूक्ष्मा सूक्ष्मार्थार्थपराऽपरा || 71 ||

एकवीरा विशेषाख्या षष्ठीदेवी मनस्विनी |
नैष्कर्म्या निष्कलालोका ज्ञानकर्माधिका गुणा || 72 ||

सबंध्वानंदसंदोहा व्योमाकाराऽनिरूपिता |
गद्यपद्यात्मिका वाणी सर्वालंकारसंयुता || 73 ||

साधुबंधपदन्यासा सर्वौको घटिकावळिः |
षट्कर्मा कर्कशाकारा सर्वकर्मविवर्जिता || 74 ||

आदित्यवर्णा चापर्णा कामिनी वररूपिणी |
ब्रह्माणी ब्रह्मसंताना वेदवागीश्वरी शिवा || 75 ||

पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्रागमश्रुता |
सद्योवेदवती सर्वा हंसी विद्याधिदेवता || 76 ||

विश्वेश्वरी जगद्धात्री विश्वनिर्माणकारिणी |
वैदिकी वेदरूपा च कालिका कालरूपिणी || 77 ||

नारायणी महादेवी सर्वतत्त्वप्रवर्तिनी |
हिरण्यवर्णरूपा च हिरण्यपदसंभवा || 78 ||

कैवल्यपदवी पुण्या कैवल्यज्ञानलक्षिता |
ब्रह्मसंपत्तिरूपा च ब्रह्मसंपत्तिकारिणी || 79 ||

वारुणी वारुणाराध्या सर्वकर्मप्रवर्तिनी |
एकाक्षरपराऽऽयुक्ता सर्वदारिद्र्यभंजिनी || 80 ||

पाशांकुशान्विता दिव्या वीणाव्याख्याक्षसूत्रभृत् |
एकमूर्तिस्त्रयीमूर्तिर्मधुकैटभभंजिनी || 81 ||

सांख्या सांख्यवती ज्वाला ज्वलंती कामरूपिणी |
जाग्रंती सर्वसंपत्तिस्सुषुप्ता स्वेष्टदायिनी || 82 ||

कपालिनी महादंष्ट्रा भ्रुकुटीकुटिलानना |
सर्वावासा सुवासा च बृहत्यष्टिश्च शक्वरी || 83 ||

छंदोगणप्रतिष्ठा च कल्माषी करुणात्मिका |
चक्षुष्मती महाघोषा खड्गचर्मधराऽशनिः || 84 ||

शिल्पवैचित्र्यविद्योता सर्वतोभद्रवासिनी |
अचिंत्यलक्षणाकारा सूत्रभाष्यनिबंधना || 85 ||

सर्ववेदार्थसंपत्तिः सर्वशास्त्रार्थमातृका |
अकारादिक्षकारांतसर्ववर्णकृतस्थला || 86 ||

सर्वलक्ष्मीस्सदानंदा सारविद्या सदाशिवा |
सर्वज्ञा सर्वशक्तिश्च खेचरीरूपगोच्छ्रिता || 87 ||

अणिमादिगुणोपेता परा काष्ठा परा गतिः |
हंसयुक्तविमानस्था हंसारूढा शशिप्रभा || 88 ||

भवानी वासनाशक्तिराकृतिस्थाखिलाऽखिला |
तंत्रहेतुर्विचित्रांगी व्योमगंगाविनोदिनी || 89 ||

वर्षा च वार्षिका चैव ऋग्यजुस्सामरूपिणी |
महानदी नदीपुण्याऽगण्यपुण्यगुणक्रिया || 90 ||

समाधिगतलभ्यार्था श्रोतव्या स्वप्रिया घृणा |
नामाक्षरपरा देवी उपसर्गनखांचिता || 91 ||

निपातोरुद्वयीजंघा मातृका मंत्ररूपिणी |
आसीना च शयाना च तिष्ठंती धावनाधिका || 92 ||

लक्ष्यलक्षणयोगाढ्या ताद्रूप्यगणनाकृतिः |
सैकरूपा नैकरूपा सेंदुरूपा तदाकृतिः || 93 ||

समासतद्धिताकारा विभक्तिवचनात्मिका |
स्वाहाकारा स्वधाकारा श्रीपत्यर्धांगनंदिनी || 94 ||

गंभीरा गहना गुह्या योनिलिंगार्धधारिणी |
शेषवासुकिसंसेव्या चपला वरवर्णिनी || 95 ||

कारुण्याकारसंपत्तिः कीलकृन्मंत्रकीलिका |
शक्तिबीजात्मिका सर्वमंत्रेष्टाऽक्षयकामना || 96 ||

आग्नेयी पार्थिवा आप्या वायव्या व्योमकेतना |
सत्यज्ञानात्मिका नंदा ब्राह्मी ब्रह्म सनातनी || 97 ||

अविद्यावासना मायाप्रकृतिस्सर्वमोहिनी |
शक्तिर्धारणशक्तिश्च चिदचिच्छक्तियोगिनी || 98 ||

वक्त्रारुणा महामाया मरीचिर्मदमर्दिनी |
विराट् स्वाहा स्वधा शुद्धा निरुपास्तिस्सुभक्तिगा || 99 ||

निरूपिताद्वयी विद्या नित्यानित्यस्वरूपिणी |
वैराजमार्गसंचारा सर्वसत्पथदर्शिनी || 100 ||

जालंधरी मृडानी च भवानी भवभंजनी |
त्रैकालिकज्ञानतंतुस्त्रिकालज्ञानदायिनी || 101 ||

नादातीता स्मृतिः प्रज्ञा धात्रीरूपा त्रिपुष्करा |
पराजिता विधानज्ञा विशेषितगुणात्मिका || 102 ||

हिरण्यकेशिनी हेमब्रह्मसूत्रविचक्षणा |
असंख्येयपरार्धांतस्वरव्यंजनवैखरी || 103 ||

मधुजिह्वा मधुमती मधुमासोदया मधुः |
माधवी च महाभागा मेघगंभीरनिस्वना || 104 ||

ब्रह्मविष्णुमहेशादिज्ञातव्यार्थविशेषगा |
नाभौ वह्निशिखाकारा ललाटे चंद्रसन्निभा || 105 ||

भ्रूमध्ये भास्कराकारा सर्वताराकृतिर्हृदि |
कृत्तिकादिभरण्यंतनक्षत्रेष्ट्यर्चितोदया || 106 ||

ग्रहविद्यात्मिका ज्योतिर्ज्योतिर्विन्मतिजीविका |
ब्रह्मांडगर्भिणी बाला सप्तावरणदेवता || 107 ||

वैराजोत्तमसाम्राज्या कुमारकुशलोदया |
बगला भ्रमरांबा च शिवदूती शिवात्मिका || 108 ||

मेरुविंध्यादिसंस्थाना काश्मीरपुरवासिनी |
योगनिद्रा महानिद्रा विनिद्रा राक्षसाश्रिता || 109 ||

सुवर्णदा महागंगा पंचाख्या पंचसंहतिः |
सुप्रजाता सुवीरा च सुपोषा सुपतिश्शिवा || 110 ||

सुगृहा रक्तबीजांता हतकंदर्पजीविका |
समुद्रव्योममध्यस्था समबिंदुसमाश्रया || 111 ||

सौभाग्यरसजीवातुस्सारासारविवेकदृक् |
त्रिवल्यादिसुपुष्टांगा भारती भरताश्रिता || 112 ||

नादब्रह्ममयीविद्या ज्ञानब्रह्ममयीपरा |
ब्रह्मनाडी निरुक्तिश्च ब्रह्मकैवल्यसाधनं || 113 ||

कालिकेयमहोदारवीर्यविक्रमरूपिणी |
बडबाग्निशिखावक्त्रा महाकबलतर्पणा || 114 ||

महाभूता महादर्पा महासारा महाक्रतुः |
पंचभूतमहाग्रासा पंचभूताधिदेवता || 115 ||

सर्वप्रमाणा संपत्तिः सर्वरोगप्रतिक्रिया |
ब्रह्मांडांतर्बहिर्व्याप्ता विष्णुवक्षोविभूषिणी || 116 ||

शांकरी विधिवक्त्रस्था प्रवरा वरहेतुकी |
हेममाला शिखामाला त्रिशिखा पंचलोचना || 117 || [पंचमोचना]

सर्वागमसदाचारमर्यादा यातुभंजनी |
पुण्यश्लोकप्रबंधाढ्या सर्वांतर्यामिरूपिणी || 118 ||

सामगानसमाराध्या श्रोत्रकर्णरसायनं |
जीवलोकैकजीवातुर्भद्रोदारविलोकना || 119 ||

तटित्कोटिलसत्कांतिस्तरुणी हरिसुंदरी |
मीननेत्रा च सेंद्राक्षी विशालाक्षी सुमंगळा || 120 ||

सर्वमंगळसंपन्ना साक्षान्मंगळदेवता |
देहहृद्दीपिका दीप्तिर्जिह्मपापप्रणाशिनी || 121 ||

अर्धचंद्रोल्लसद्दंष्ट्रा यज्ञवाटीविलासिनी |
महादुर्गा महोत्साहा महादेवबलोदया || 122 ||

डाकिनीड्या शाकिनीड्या साकिनीड्या समस्तजुट् |
निरंकुशा नाकिवंद्या षडाधाराधिदेवता || 123 ||

भुवनज्ञानिनिःश्रेणी भुवनाकारवल्लरी |
शाश्वती शाश्वताकारा लोकानुग्रहकारिणी || 124 ||

सारसी मानसी हंसी हंसलोकप्रदायिनी |
चिन्मुद्रालंकृतकरा कोटिसूर्यसमप्रभा || 125 ||

सुखप्राणिशिरोरेखा सददृष्टप्रदायिनी |
सर्वसांकर्यदोषघ्नी ग्रहोपद्रवनाशिनी || 126 ||

क्षुद्रजंतुभयघ्नी च विषरोगादिभंजनी |
सदाशांता सदाशुद्धा गृहच्छिद्रनिवारिणी || 127 ||

कलिदोषप्रशमनी कोलाहलपुरस्थिता |
गौरी लाक्षणिकी मुख्या जघन्याकृतिवर्जिता || 128 ||

माया विद्या मूलभूता वासवी विष्णुचेतना |
वादिनी वसुरूपा च वसुरत्नपरिच्छदा || 129 ||

छांदसी चंद्रहृदया मंत्रस्वच्छंदभैरवी |
वनमाला वैजयंती पंचदिव्यायुधात्मिका || 130 ||

पीतांबरमयी चंचत्कौस्तुभा हरिकामिनी |
नित्या तथ्या रमा रामा रमणी मृत्युभंजिनी || 131 ||

ज्येष्ठा काष्ठा धनिष्ठांता शरांगी निर्गुणप्रिया |
मैत्रेया मित्रविंदा च शेष्यशेषकलाशया || 132 ||

वाराणसीवासरता चार्यावर्तजनस्तुता |
जगदुत्पत्तिसंस्थानसंहारत्रयकारणं || 133 ||

त्वमंब विष्णुसर्वस्वं नमस्तेऽस्तु महेश्वरि |
नमस्ते सर्वलोकानां जनन्यै पुण्यमूर्तये || 134 ||

सिद्धलक्ष्मीर्महाकाळि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते |
सद्योजातादिपंचाग्निरूपा पंचकपंचकं || 135 ||

यंत्रलक्ष्मीर्भवत्यादिराद्याद्ये ते नमो नमः |
सृष्ट्यादिकारणाकारवितते दोषवर्जिते || 136 ||

जगल्लक्ष्मीर्जगन्मातर्विष्णुपत्नि नमोऽस्तु ते |
नवकोटिमहाशक्तिसमुपास्यपदांबुजे || 137 ||

कनत्सौवर्णरत्नाढ्ये सर्वाभरणभूषिते |
अनंतनित्यमहिषी प्रपंचेश्वरनायकि || 138 ||

अत्युच्छ्रितपदांतस्थे परमव्योमनायकि |
नाकपृष्ठगताराध्ये विष्णुलोकविलासिनि || 139 ||

वैकुंठराजमहिषि श्रीरंगनगराश्रिते |
रंगनायकि भूपुत्रि कृष्णे वरदवल्लभे || 140 ||

कोटिब्रह्मादिसंसेव्ये कोटिरुद्रादिकीर्तिते |
मातुलुंगमयं खेटं सौवर्णचषकं तथा || 141 ||

पद्मद्वयं पूर्णकुंभं कीरं च वरदाभये |
पाशमंकुशकं शंखं चक्रं शूलं कृपाणिकां || 142 ||

धनुर्बाणौ चाक्षमालां चिन्मुद्रामपि बिभ्रती |
अष्टादशभुजे लक्ष्मीर्महाष्टादशपीठगे || 143 ||

भूमिनीलादिसंसेव्ये स्वामिचित्तानुवर्तिनि |
पद्मे पद्मालये पद्मि पूर्णकुंभाभिषेचिते || 144 ||

इंदिरेंदिंदिराभाक्षि क्षीरसागरकन्यके |
भार्गवि त्वं स्वतंत्रेच्छा वशीकृतजगत्पतिः || 145 ||

मंगळं मंगळानां त्वं देवतानां च देवता |
त्वमुत्तमोत्तमानां च त्वं श्रेयः परमामृतं || 146 ||

धनधान्याभिवृद्धिश्च सार्वभौमसुखोच्छ्रया |
आंदोळिकादिसौभाग्यं मत्तेभादिमहोदयः || 147 ||

पुत्रपौत्राभिवृद्धिश्च विद्याभोगबलादिकं |
आयुरारोग्यसंपत्तिरष्टैश्वर्यं त्वमेव हि || 148 ||

परमेशविभूतिश्च सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरा गतिः |
सदयापांगसंदत्तब्रह्मेंद्रादिपदस्थितिः || 149 ||

अव्याहतमहाभाग्यं त्वमेवाक्षोभ्यविक्रमः |
समन्वयश्च वेदानामविरोधस्त्वमेव हि || 150 ||

निःश्रेयसपदप्राप्तिसाधनं फलमेव च |
श्रीमंत्रराजराज्ञी च श्रीविद्या क्षेमकारिणी || 151 ||

श्रींबीजजपसंतुष्टा ऐं ह्रीं श्रीं बीजपालिका |
प्रपत्तिमार्गसुलभा विष्णुप्रथमकिंकरी || 152 ||

क्लींकारार्थसवित्री च सौमंगळ्याधिदेवता |
श्रीषोडशाक्षरीविद्या श्रीयंत्रपुरवासिनी || 153 ||

सर्वमंगळमांगळ्ये शिवे सर्वार्थसाधिके |
शरण्ये त्र्यंबके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते || 154 ||

पुनः पुनर्नमस्तेऽस्तु साष्टांगमयुतं पुनः |

सनत्कुमार उवाच |
एवं स्तुता महालक्ष्मीर्ब्रह्मरुद्रादिभिस्सुरैः |
नमद्भिरार्तैर्दीनैश्च निस्सत्वैर्भोगवर्जितैः || 1 ||

ज्येष्ठाजुष्टैश्च निःश्रीकैस्संसारात्स्वपरायणैः |
विष्णुपत्नी ददौ तेषां दर्शनं दृष्टितर्पणं || 2 ||

शरत्पूर्णेंदुकोट्याभधवळापांगवीक्षणैः |
सर्वान् सत्वसमाविष्टांश्चक्रे हृष्टा वरं ददौ || 3 ||

महालक्ष्मीरुवाच |
नाम्नां साष्टसहस्रं मे प्रमादाद्वापि यस्सकृत् |
कीर्तयेत्तत्कुले सत्यं वसाम्याचंद्रतारकं || 4 ||

किं पुनर्नियमाज्जप्तुर्मदेकशरणस्य च |
मातृवत्सानुकंपाहं पोषकी स्यामहर्निशं || 5 ||

मन्नाम स्तुवतां लोके दुर्लभं नास्ति चिंतितं |
मत्प्रसादेन सर्वेऽपि स्वस्वेष्टार्थमवाप्स्यथ || 6 ||

लुप्तवैष्णवधर्मस्य मद्व्रतेष्ववकीर्णिनः |
भक्तिप्रपत्तिहीनस्य वंद्यो नाम्नां जपोऽपि मे || 7 ||

तस्मादवश्यं तैर्दोषैर्विहीनः पापवर्जितः |
जपेत्साष्टसहस्रं मे नाम्नां प्रत्यहमादरात् || 8 ||

साक्षादलक्ष्मीपुत्रोऽपि दुर्भाग्योऽप्यलसोऽपि वा |
अप्रयत्नोऽपि मूढोऽपि विकलः पतितोऽपि च || 9 ||

अवश्यं प्राप्नुयाद्भाग्यं मत्प्रसादेन केवलं |
स्पृहेयमचिराद्देवा वरदानाय जापिनः |
ददामि सर्वमिष्टार्थं लक्ष्मीति स्मरतां ध्रुवं || 10 ||

सनत्कुमार उवाच |
इत्युक्त्वाऽंतर्दधे लक्ष्मीर्वैष्णवी भगवत्कला |
इष्टापूर्तं च सुकृतं भागधेयं च चिंतितं || 11 ||

स्वं स्वं स्थानं च भोगं च विजयं लेभिरे सुराः |
तदेतद्प्रवदाम्यद्य लक्ष्मीनामसहस्रकं |
योगिनः पठत क्षिप्रं चिंतितार्थानवाप्स्यथ || 12 ||

गार्ग्य उवाच |
सनत्कुमारयोगींद्र इत्युक्त्वा स दयानिधिः |
अनुगृह्य ययौ क्षिप्रं तांश्च द्वादशयोगिनः || 13 ||

तस्मादेतद्रहस्यं च गोप्यं जप्यं प्रयत्नतः |
अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां भृगुवासरे || 14 ||

पौर्णमास्याममायां च पर्वकाले विशेषतः |
जपेद्वा नित्यकार्येषु सर्वान्कामानवाप्नुयात् || 15 ||

इति श्रीस्कंदपुराणे सनत्कुमारसंहितायां लक्ष्मीसहस्रनामस्तोत्रं संपूर्णं ||

अर्थ

श्री लक्ष्मी सहस्रनाम स्तोत्रम, महालक्ष्मी के एक हजार (सहस्र) नामों का एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है। यह दिव्य स्तोत्र गार्ग्य महर्षि और सनत्कुमार के बीच एक संवाद के रूप में प्रस्तुत किया गया है। समस्त लोकों के कल्याण की कामना करने वाले योगी, जीवन के दुखों से मुक्ति पाने और भुक्ति (भौतिक सुख) तथा मुक्ति (मोक्ष) दोनों को प्राप्त करने के लिए किस जप का सहारा लें, यह जानने के लिए सनत्कुमार से प्रश्न करते हैं। इसके उत्तर में, सनत्कुमार महालक्ष्मी सहस्रनाम स्तोत्र के महत्व का वर्णन करते हैं। यह केवल धन प्राप्ति के लिए ही नहीं, बल्कि समग्र जीवन की उन्नति और आध्यात्मिक ज्ञान के लिए भी एक मार्गदर्शक है।

इस स्तोत्र का प्रत्येक नाम महालक्ष्मी के एक विशेष स्वरूप, गुण या शक्ति का वर्णन करता है। लक्ष्मी केवल धन की देवी नहीं हैं, बल्कि वे समस्त शुभता, सौंदर्य, ज्ञान, साहस, कीर्ति, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक समृद्धि का प्रतीक हैं। दरिद्रता से पीड़ित मनुष्य, केवल धन की कमी के कारण ही नहीं, बल्कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे चतुर्विध पुरुषार्थों को भी प्राप्त करने में असमर्थ रहते हैं। ऐसी स्थिति में, दरिद्रता का नाश करने वाली, ब्रह्मविद्या प्रदान करने वाली, मृत्यु का विनाश करने वाली, और सभी विद्याओं का सारभूत यह सहस्रनाम स्तोत्र अत्यंत प्रभावशाली साधन है।

सनत्कुमार इस स्तोत्र के महत्व को समझाते हुए कहते हैं कि इसकी पूजा ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, महेंद्र आदि देवताओं द्वारा भी की जाती है। सहस्रनाम का पाठ केवल स्तुति नहीं है, बल्कि यह देवी के साथ गहरा संबंध स्थापित करने का एक माध्यम है। जब प्रत्येक नाम का भक्तिपूर्वक उच्चारण किया जाता है, तो साधक देवी के गुणों को अपने भीतर आत्मसात करता है और दिव्य शक्ति को आकर्षित करता है। यह मन की शांति, नकारात्मक ऊर्जाओं के निवारण और सकारात्मक ऊर्जाओं के आकर्षण में सहायक है। नियमित पाठ से व्यक्ति आंतरिक और बाहरी समृद्धि का अनुभव करता है।

लक्ष्मी सहस्रनाम का नियमित पाठ अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश प्रदान करता है। यह केवल लौकिक इच्छाओं की पूर्ति ही नहीं करता, बल्कि आत्म-उन्नति और मोक्ष के मार्ग को भी सुगम बनाता है। महालक्ष्मी के असंख्य गुणों का स्मरण करके, भक्त देवी की कृपा का पात्र बनता है और जीवन में सभी सिद्धियाँ प्राप्त करता है। यह स्तोत्र कलियुग में मनुष्यों के लिए एक वरदान है, जो उन्हें कष्टों से मुक्ति दिलाकर शाश्वत आनंद प्राप्त करने का दिव्य साधन प्रदान करता है।

लाभ (Benefits):

  • दरिद्रता का नाश: इस स्तोत्र के नियमित पाठ से आर्थिक समस्याएं दूर होती हैं और धन-समृद्धि प्राप्त होती है। दरिद्रता केवल धन की कमी नहीं, बल्कि मन की दरिद्रता भी है, जिसे यह दूर करता है।
  • धन और समृद्धि की प्राप्ति: लक्ष्मी देवी धन की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिए इस सहस्रनाम का पाठ करने से स्थायी धन, धान्य, गौवंश, पुत्र और सभी प्रकार के शुभ फल प्राप्त होते हैं।
  • उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु: महालक्ष्मी की कृपा से उत्तम स्वास्थ्य, रोगों से मुक्ति और दीर्घायु प्राप्त होती है। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
  • ज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति: यह स्तोत्र ब्रह्मविद्या प्रदान करने की शक्ति रखता है। यह अज्ञान को दूर कर ज्ञान को बढ़ाता है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।
  • समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति: भक्तों की सभी न्यायसंगत इच्छाएँ और मनोकामनाएँ महालक्ष्मी की कृपा से पूर्ण होती हैं। यह जीवन में सभी शुभता लाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री लक्ष्मी सहस्रनाम स्तोत्रं क्या है?
यह महालक्ष्मी के एक हजार दिव्य नामों का एक शक्तिशाली स्तोत्र है। इन नामों के माध्यम से देवी के विभिन्न स्वरूपों और गुणों की स्तुति की जाती है, जो भक्तों को सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं।
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन, विशेषकर शुक्रवार या पूर्णिमा के दिन, स्नान करके शुद्ध मन से, लक्ष्मी देवी की प्रतिमा या चित्र के सामने करना चाहिए। संध्याकाल में पाठ करना अधिक शुभ माना जाता है।
श्री लक्ष्मी सहस्रनाम स्तोत्रं के पाठ से क्या प्रमुख लाभ मिलते हैं?
इसके पाठ से आर्थिक समृद्धि, दरिद्रता का नाश, उत्तम स्वास्थ्य, ज्ञान में वृद्धि और सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। यह मानसिक शांति और स्थिरता भी प्रदान करता है।
श्री लक्ष्मी सहस्रनाम स्तोत्रं का पाठ कौन कर सकता है?
कोई भी व्यक्ति, स्त्री-पुरुष, किसी भी जाति या मत का भेद किए बिना, शुद्ध भक्ति के साथ इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से आर्थिक संकट से जूझ रहे लोग और आध्यात्मिक उन्नति चाहने वाले इसका पाठ करें।
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
संभव हो तो प्रतिदिन एक बार पाठ करना उत्तम है। विशेष अवसरों पर, इसे 11, 21 या 108 बार भी पढ़ा जा सकता है। भक्ति और श्रद्धा से पाठ करना महत्वपूर्ण है।
श्री लक्ष्मी सहस्रनाम स्तोत्र का उद्गम कहाँ से हुआ है?
यह स्तोत्र स्कंद पुराण का एक भाग है। यह गार्ग्य महर्षि और सनत्कुमार के बीच एक संवाद के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जहाँ सनत्कुमार इन दिव्य नामों का वर्णन करते हैं।

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