अस्य श्रीअष्टलक्ष्मीमालामंत्रस्य - भृगु ऋषिः - अनुष्टुप् छंदः -
महालक्ष्मीर्देवता - श्रीं बीजं - ह्रीं शक्तिः - ऐं कीलकं -
श्रीअष्टलक्ष्मीप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।
ॐ नमो भगवत्यै लोकवशीकरमोहिन्यै,
ॐ ईं ऐं क्षीं, श्री आदिलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, गजलक्ष्मी,
धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी,
वीरलक्ष्मी, ऐश्वर्यलक्ष्मी, अष्टलक्ष्मी इत्यादयः मम हृदये
दृढतया स्थिता सर्वलोकवशीकराय, सर्वराजवशीकराय,
सर्वजनवशीकराय सर्वकार्यसिद्धिदे, कुरु कुरु, सर्वारिष्टं
जहि जहि, सर्वसौभाग्यं कुरु कुरु,
ॐ नमो भगवत्यै श्रीमहालाक्ष्म्यै ह्रीं फट् स्वाहा ।।
इति श्रीअष्टलक्ष्मीमालामंत्रं संपूर्णं ।
अर्थ
श्री अष्टलक्ष्मी माला मंत्र, देवी महालक्ष्मी के आठ दिव्य स्वरूपों - आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, वीर लक्ष्मी और ऐश्वर्यलक्ष्मी का सामूहिक रूप से स्तवन करने वाला एक अत्यंत शक्तिशाली और व्यापक मंत्र है। इस मंत्र की रचना भृगु ऋषि द्वारा की गई है और यह अनुष्टुप छंद में निबद्ध है। महालक्ष्मी इस मंत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। 'श्रीं' इसका बीज मंत्र है, 'ह्रीं' शक्ति है और 'ऐं' कीलक है। इस मंत्र का जप अष्टलक्ष्मी के प्रसाद और सिद्धियों की प्राप्ति के लिए किया जाता है, जिससे भक्तों के जीवन में पूर्णता आती है।
यह माला मंत्र केवल भौतिक समृद्धि ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उत्थान, आनंद और सर्वांगीण सफलता प्रदान करने की क्षमता रखता है। यह भक्तों के हृदय में अष्टलक्ष्मी की दिव्य ऊर्जा को स्थापित करता है, जिससे उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। अष्टलक्ष्मी आठ प्रकार की संपत्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं: आदिलक्ष्मी (आदिम या मूल धन), धनलक्ष्मी (धन), धान्यलक्ष्मी (अन्न), गजलक्ष्मी (शक्ति और शाही वैभव), संतानलक्ष्मी (संतान), विजयलक्ष्मी (विजय), वीर लक्ष्मी (साहस और शक्ति) और ऐश्वर्यलक्ष्मी (समृद्धि और ऐश्वर्य)।
मंत्र की शुरुआत "ॐ नमो भगवत्यै लोकवशीकरमोहिन्यै" के साथ होती है, जिसमें महालक्ष्मी को 'लोकवशीकर मोहिनी' के रूप में स्तुति किया जाता है। इसका अर्थ है कि वह दिव्य शक्ति जो समस्त लोकों को अपने वश में कर लेती है और सभी को मोहित करती है। इसके पश्चात् 'ईं ऐं क्षीं' जैसे बीजाक्षरों के साथ आदिलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, वीर लक्ष्मी, ऐश्वर्यलक्ष्मी - इन अष्टलक्ष्मी देवियों का स्मरण किया जाता है। मंत्र में प्रार्थना की जाती है कि ये अष्टलक्ष्मी भक्त के हृदय में दृढ़ता से निवास करें और समस्त लोकों, राजाओं तथा लोगों को वशीभूत करें, जिससे साधक को समाज में सम्मान और प्रभाव प्राप्त होता है।
इस माला मंत्र का एक महत्वपूर्ण भाग "सर्वकार्यसिद्धिदे, कुरु कुरु, सर्वारिष्टं जहि जहि, सर्वसौभाग्यं कुरु कुरु" है। यह देवी से सभी कार्यों में सिद्धि प्रदान करने, सभी बाधाओं और दुर्भाग्य को नष्ट करने और समस्त शुभता प्रदान करने की प्रार्थना है। अंत में "ॐ नमो भगवत्यै श्रीमहालक्ष्म्यै ह्रीं फट् स्वाहा" के साथ महालक्ष्मी के मूल मंत्र के साथ पूजा संपन्न होती है। यह माला मंत्र भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि के बीच संतुलन स्थापित करने, जीवन में पूर्ण संपन्नता और आनंद लाने में अत्यंत सहायक है।
लाभ (Benefits):- सर्वांगीण सौभाग्य की प्राप्ति: इस मंत्र का निष्ठापूर्वक जप करने से भक्तों को पूर्ण सौभाग्य, समृद्धि और आनंद की प्राप्ति होती है। अष्टलक्ष्मी के संयुक्त आशीर्वाद से जीवन में किसी भी प्रकार की कमी नहीं रहती।
- धन और धान्य की वृद्धि: धनलक्ष्मी और धान्यलक्ष्मी की कृपा से आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है। धन और अन्न-धान्य की प्रचुरता बढ़ती है, जिससे गरीबी का निवारण होता है और जीवन में स्थिरता आती है।
- संतान और परिवार का कल्याण: संतानलक्ष्मी के अनुग्रह से उत्तम संतान की प्राप्ति होती है। परिवार में शांति, सुख और सामंजस्य बना रहता है, तथा परिवार के सदस्यों का कल्याण होता है।
- विजय और साहस: विजयलक्ष्मी और वीर लक्ष्मी के आशीर्वाद से सभी प्रयासों में सफलता मिलती है। बाधाओं का सामना करने के लिए साहस और आत्मविश्वास बढ़ता है, जिससे व्यक्ति चुनौतियों का सामना कर पाता है।
- सभी कार्यों में सिद्धि और अरिष्ट निवारण: यह मंत्र सभी कार्यों में सफलता प्रदान करता है और सभी प्रकार की बुरी शक्तियों, बाधाओं, रोगों और दुर्भाग्य को दूर करता है, जिससे जीवन सुचारु रूप से चलता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
यह श्री अष्टलक्ष्मी माला मंत्रं क्या है?
इस मंत्र का जाप कब और कैसे करना चाहिए?
श्री अष्टलक्ष्मी माला मंत्र के जाप से क्या लाभ होते हैं?
कौन इस मंत्र का जाप कर सकता है?
इस मंत्र का जाप कितनी बार करना चाहिए?
इस मंत्र का मूल या पृष्ठभूमि क्या है?
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