रमणीयरमास्तनमंडलसंगतगंधसुगंधित सिंहतनो ।
करुणारुणदीर्घद्गब्ज हरे विजयी भव निंबागिरींद्रपते ॥1॥
हर पंकजजन्म सुरेंद्र महाविबुधाधिपसेवित देवमणे ।
नतभक्तमनस्तिमिरद्युमणे परिपालय निंबगिरीश हरे ॥2॥
मतिहीनतया वनितावदनस्तनलोभकृतैस्मरमोहशरैः ।
विवशं नृपशुं नरसिंह विभो कुरु मां तव पादसरोजवशं ॥3॥
वर निंबगिरींद्र दरीविहरत्सुरसिंह नृसिंह दयाजलधे ।
निगमांतनिबोधित कीर्तियुतान्नरसिंह विधेर्न पयं कलये ॥4॥
नखदंष्ट्रसुशोभित केसरभूल्ललितोरु सुफुल्लमुखाब्ज हरे ।
नतर क्षणदक्ष विवाशान्मां परिपालय निंबगिरींद्रपते ॥5॥
सुरवैरिविनाशक कोपवशात् कृतगर्जननिर्जित दैत्यगणं ।
सफलीकृत सर्वजगत्रितयं नरसिंह महामनसा कलये ॥6॥
वरदं नतभक्तमनोवशगं कमलापतिमंबुध नीलतनुं ।
धनदं च दयाकृतसिंहतनुं न कदापि धुनोमि ह्रदा नृहरिं ॥7॥
भुजशाखमभीष्टफलप्रकरं धनशंखसुदर्शनपुष्पधरं ।
कमलालतिकावृतकल्पतरुं नरसिंहं महामनसा कलये ॥8॥
हरिं निंबशैलेशमीशं विना मे गतिर्नैव गम्यं च नैवास्ति लोके ।
ततस्तत्पदांभोजयुग्मं भजेऽहं श्रियं नारसिंहः स्वयं मे ददातु ॥9॥
शरद्येकवारं हि निंबाद्रिनाथं श्रियाश्लिष्टरूपं गुहामंदिरस्थं ।
सुधासेवते यः समग्राब्दपुण्यं ददात्यैव निंबाद्रिलक्ष्मीनृसिंहः ॥10॥
महापराधयुक्तेन मया स्तोत्रं कृतं हरे ।
क्षमस्व शाब्दिकान् दोषान् निंबशैलदरीमणे ॥11॥
इति श्रीनिंबाद्रीलक्ष्मीनृसिंहस्तोत्रं संपूर्णं ।
अर्थ
श्री निंबाद्री लक्ष्मीनृसिंह स्तोत्रं भगवान नृसिंह देव की महिमा का गुणगान करने वाला एक अत्यंत शक्तिशाली और भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। यह स्तोत्र भक्तों को मन की शांति, सुरक्षा और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है। निंबाद्री एक पवित्र स्थान है जहाँ भगवान नृसिंह अपनी सहधर्मिणी लक्ष्मी देवी के साथ निवास करते हैं, और इस स्तोत्र के माध्यम से उन्हीं की आराधना की जाती है। यह स्तोत्र भगवान की करुणा, पराक्रम और भक्तवत्सलता को उजागर करता है।
भगवान नृसिंह विष्णु के उग्र रूपों में से एक हैं, फिर भी अपने भक्तों के लिए वे अत्यंत करुणामयी हैं। उन्होंने हिरण्यकशिपु जैसे दुष्टों का संहार कर प्रह्लाद जैसे भक्तों की रक्षा के लिए यह रूप धारण किया था। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्त अपने आंतरिक भय, अज्ञान और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति पाते हैं। यह केवल शब्दों का एक संयोजन नहीं है, बल्कि भगवान के साथ सीधा संबंध स्थापित करने का एक आध्यात्मिक साधन है। स्तोत्र का प्रत्येक पद भगवान के विभिन्न गुणों का वर्णन करता है, मन को शुद्ध करता है और आध्यात्मिक चेतना को बढ़ाता है।
१. रमणियरमास्तनमण्डलमसङ्गत...: हे निंबाद्री नृसिंह स्वामी! आपका दिव्य सिंह रूप रमणीय लक्ष्मी देवी के वक्षस्थल पर स्थिर रूप से विराजमान है। आपकी करुणा से युक्त लाल आभा मुझे सदैव विजय और शांति प्रदान करे। आपकी महिमा हर जगह विजयशाली होकर प्रकाशित हो।
२. हर पंकजजन्म सुरेंद्र...: हे निंबगिरि नृसिंह स्वामी! आप ब्रह्मा, इंद्र और अन्य सभी देवताओं द्वारा पूजित हैं। आप भक्तों के मन के अंधकार को दूर करने वाले सूर्य के समान हैं। कृपया हमारी रक्षा करें और हमारे अज्ञान को दूर करें।
३. मतिहीनतया वनिता वदनस्तनलोभ...: हे दयासिंधु नृसिंह! काम, मोह और अज्ञान के कारण सांसारिक इच्छाओं में उलझे हुए मेरे इस मन को अपने चरणारविंदों में पूरी तरह से समर्पित करने की कृपा करें। मुझे अपने चरण कमलों का दास बना लें।
४. वर निंबगिरींद्र दरीविहरत्...: हे दयासागर! वेदों द्वारा निरंतर कीर्तित आपकी महिमा अपरंपार है। निंबाद्री पर्वत की गुफा में विचरण करने वाले हे नृसिंह! जिन्होंने आपके दिव्य रूप का साक्षात्कार किया है, उन्हें कोई भय नहीं रहता। मुझे अटूट श्रद्धा और ज्ञान प्रदान करें।
५. नखदंष्ट्रसुशोभित...: हे नृसिंह! आपके नाखून और दाढ़ों से सुशोभित मुख अंधकार को दूर कर भक्तों की रक्षा करता है। हे निंबाद्रीपते, मेरे सभी पापों का नाश करें और मुझे अज्ञान से बचाएं। आपका तेजस्वी सिंह मुख सभी दोषों को हरता है।
६. सुरवैरि विनाशक कोपवशात्...: हे परम वीर नृसिंह! आपने हिरण्यकशिपु जैसे दुष्ट राक्षसों का संहार करने के लिए क्रोधित होकर गर्जना की और तीनों लोकों की रक्षा की। आपकी कृपा सदैव प्रवाहित होती रहे और आपकी शक्ति निरंतर प्रकाशित होती रहे।
७. वरदं नतभक्तमनोवशगं...: हे नीले वर्ण वाले, लक्ष्मीपति नृसिंह! आप भक्तों के मन को अपनी करुणा से वश में करने वाले, धन और आनंद प्रदान करने वाले हैं। करुणामयी सिंह रूप धारण करने वाले, मैं आपको कभी अपने हृदय से दूर नहीं करूंगा।
८. भुजशाखमभीष्टफलप्रकरं...: हे नृसिंह! आप शंख, चक्र, गदा और पद्म को अपनी चार भुजाओं में धारण किए हुए हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करने वाले कल्पवृक्ष के समान हैं। लक्ष्मी देवी से आवृत कल्पवृक्ष की तरह, आप भक्तों को सभी शुभ फल प्रदान करते हैं। मैं आपको अपने महान मन से स्मरण करता हूँ।
९. हरिं निंबशैलेशमीशं विना...: हे निंबाद्रीपति नृसिंह! आपके अतिरिक्त इस संसार में मेरा कोई आश्रय नहीं, कोई लक्ष्य नहीं। आपके चरण कमलों की सेवा ही मेरा परम गंतव्य है।
१०. शरद्येकवारं हि निंबाद्रीनाथं...: शरद ऋतु में कम से कम एक बार भी निंबाद्री लक्ष्मीनृसिंह स्वामी के दर्शन करने से एक वर्ष के पुण्य की प्राप्ति होती है। यह स्वामी के दर्शन के महत्व को दर्शाता है।
११. महापराधयुक्तेन...: हे निंबाद्री नृसिंह! इस स्तोत्र का पाठ करते समय मुझसे कोई भी शब्द दोष हुआ हो, तो कृपया मेरी भक्ति को स्वीकार करें और मुझे क्षमा करें। मैं सदैव आपकी करुणा का पात्र बना रहूँ।
लाभ (Benefits):
- भय और अज्ञान का निवारण: इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से मन में व्याप्त भय, चिंता और अज्ञान का अंधकार दूर होता है, जिससे मन को साहस और स्पष्टता मिलती है।
- शत्रु नाश और सुरक्षा: भगवान नृसिंह दुष्ट शक्तियों का संहार करने वाले हैं, इसलिए यह स्तोत्र भक्तों को शत्रुओं और नकारात्मक प्रभावों से बचाता है।
- स्वास्थ्य और धन वृद्धि: लक्ष्मी सहित नृसिंह स्वामी की आराधना उत्तम स्वास्थ्य, समृद्धि और ऐश्वर्य प्रदान करती है।
- मन की शांति और आध्यात्मिक प्रगति: यह सांसारिक इच्छाओं से मन को मुक्त कर आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने में सहायता करता है, जिससे आंतरिक शांति और संतोष प्राप्त होता है।
- इच्छित फलों की प्राप्ति: भगवान नृसिंह कल्पवृक्ष स्वरूप हैं, अतः इस स्तोत्र का पाठ भक्तों की सभी सद्भावनाओं और न्यायसंगत इच्छाओं को पूरा करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री निंबाद्री लक्ष्मीनृसिंह स्तोत्रं क्या है?
इस स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
श्री निंबाद्री लक्ष्मीनृसिंह स्तोत्रं के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
इस स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
निंबाद्री लक्ष्मीनृसिंह स्तोत्रं का मूल क्या है?
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