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श्री निंबाद्री लक्ष्मीनृसिंह प्रपत्तिः

संपादन: अद्यतन
स्तोत्रलक्ष्मी देवी
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लक्ष्मी पक्षिरथस्य वक्षसि गतामब्जे क्षणीमब्जां ।
क्षुद्रक्षुब्धदरिद्रभक्तजनतारक्षादुरीणक्षमां ।
क्षीरोदप्रिय पुत्रिकांत्रिजगतः क्षेमंकरी भास्वरीं ।
वंदे निंबगिरीशमेश नृहरेर्वामांकगां मातरं ॥1॥

जननी जगतामशेषशक्तेर्जगदीशस्य जनार्दनस्य पत्नीं ।
कमलाममलाब्जपत्रनेत्रां कलये मनसा हिरण्यवर्णां ॥2॥

लक्ष्मीपते नरहरे नतभक्तपाल
नारायणाश्रित सुखप्रद दैत्यहारिन् ।
निंबाद्रिकंदरनिवास सुरेशवंद्य
लक्ष्मीनृसिंहचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥3॥

भक्तस्समर्पित पवित्रसहस्रनाम
पूजाविधीय तुलसीदलशोभमानौ ।
प्राप्यां भवाब्धितरणे तरणिस्स्वरूपां
निंबाद्रिनाथचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥4॥

कालीयमस्तकमणींद्र विशेषशोभा
नीराजितो सुरनदीजननालवालों ।
भूम्यंतरिक्ष परिमापक मानदंडों
निंबाद्रिनाथचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥5॥

राजीवचक्ररथशंखघटातपत्र
संतानहस्तिमणिवज्रविशेषचिन्हेः ।
युक्तौ सुरासुरकिरीटमणिद्युभासां
निंबाद्रिनाथचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥6॥

पद्माक्षमादिमहिषिभिरदभ्रभीत्या
संवाह्यमानमृदुलौ मधुरायमानां ।
तापत्रयातुरजनस्य शरण्यभूतौ
निंबाद्रिनाथचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥7॥

पंकेरुहद्वयसमागमसुंदरौ तौ
भक्ताक्षिभृंगपरिवेष्टितनीलशोभां ।
राकाकलाधरदशेव नखप्रकाशां
निंबाद्रिनाथ चरणौ शरणं प्रपद्ये ॥8॥

सद्भक्तमानससरोवरराजहंसा
सांगाखिलश्रुतिशिरोमकटायमानां ।
ब्रह्मादिकीरजगदेकशरण्यभूतौ
निंबाद्रिनाथ चरणौ शरणं प्रपद्ये ॥9॥

प्रह्लादगौतमसती मुचकुंद पार्थ
भीष्मादिभक्तजनसंवितभव्यरूपौ ।
सर्वाद्यशांतिकरसर्वशरण्यभूते
निंबाद्रिनाथ चरणौ शरणं प्रपद्ये ॥10॥

गोविंदलान्वयसुधाकरनारसिंह
श्रीश्रीनिवासगुरुपुंगवयुग्मकेन ।
प्राप्यौ तवेति ममदर्शितपैतृकस्वौ
निंबाद्रिनाथ चरणौ शरणं प्रपद्ये ॥11॥

इति श्रीनिंबाद्रीलक्ष्मीनृसिंहप्रपत्तिः संपूर्णा ।

अर्थ

श्री निंबाद्री लक्ष्मीनृसिंह प्रपत्तिः भगवान नृसिंह और माता लक्ष्मी को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली और भावपूर्ण स्तोत्र है। 'प्रपत्ति' का अर्थ है पूर्ण शरणागति, जहाँ भक्त अपने आप को पूरी तरह से भगवान के चरण कमलों में समर्पित कर देता है। यह स्तोत्र निंबाद्रि क्षेत्र में विराजमान श्री लक्ष्मीनृसिंह स्वामी के दिव्य रूप, उनके गुणों और भक्तों पर उनकी असीम करुणा का वर्णन करता है। यह भक्त की आध्यात्मिक यात्रा में निंबाद्रि नृसिंह की रक्षा और कृपा की याचना करने वाली एक पूर्ण शरणागति प्रार्थना है।

इस स्तोत्र का प्रत्येक श्लोक भगवान की महिमा और माता लक्ष्मी की करुणा को उजागर करता है। पहले श्लोक में, भक्त लक्ष्मी देवी की करुणा का वर्णन करते हुए, उन्हें निंबाद्रि नृसिंह के वक्षस्थल पर विराजमान, तीनों लोकों की रक्षक, और सर्व-मंगल प्रदाता के रूप में नमन करता है। दूसरा श्लोक लक्ष्मी देवी के सुंदर रूप का ध्यान करता है, उन्हें जगत की सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता महाशक्ति के रूप में, कमल के समान नेत्रों वाली और स्वर्ण कांति से युक्त बताता है। तीसरे श्लोक से प्रपत्ति का आरंभ होता है, जहाँ भक्त निंबाद्रि गुफा में निवास करने वाले, भक्तों के रक्षक और पापों का नाश करने वाले लक्ष्मीनृसिंह स्वामी के चरणों की शरण लेता है।

आगे के श्लोकों में, भगवान के चरणों की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है। चौथे श्लोक में कहा गया है कि तुलसी दल के साथ सहस्रनाम पूजा करने वाले भक्तों के लिए निंबाद्रिनाथ के चरण भवसागर को पार करने की परम नौका के समान हैं। पाँचवाँ श्लोक कालिया के मस्तक पर जड़े मणियों के समान चमकने वाले, नदी के जल के समान पवित्र और सत्य-धर्म का प्रतिनिधित्व करने वाले चरणों की शरण लेने का आह्वान करता है। छठे श्लोक में शंख, चक्र, गदा, पद्म जैसे दिव्य चिह्नों से सुशोभित नृसिंह के चरणों का भजन करने का वर्णन है। सातवाँ श्लोक बताता है कि लक्ष्मी देवी और अन्य देवताओं द्वारा भय और भक्ति से सेवित ये चरण तीनों तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) को दूर करते हैं। आठवाँ श्लोक कमल के समान सुंदर चमकने वाले चरणों का वर्णन करता है, जो भक्तों की आँखों रूपी हंसों के लिए आश्रय स्थल हैं।

नौवें श्लोक में, सत्भक्तों के हृदय सरोवर में निवास करने वाले राजहंसों के समान दिव्य चरण ब्रह्मा सहित सभी देवताओं के लिए आश्रय स्थल बताए गए हैं। दसवाँ श्लोक यह घोषणा करता है कि प्रह्लाद, गौतम, भीष्म जैसे महान भक्तों ने जिनकी आराधना की है, वे ही भगवान सभी शांति के प्रदाता हैं। अंतिम श्लोक में, गोविंद वंश के गुरुओं की कृपा से, भक्त स्वयं को उस पवित्र परंपरा में शामिल करके भगवान की शरण लेता है। यह स्तोत्र केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि भगवान के साथ गहरा आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने का एक साधन है। इसके पाठ से भक्त के मन में शांति, भक्ति और शरणागति का भाव बढ़ता है।

लाभ (Benefits):

  • पाप क्षय और भवभय निवारण: इस स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करने से सभी पापों का नाश होता है और संसार चक्र के भय से मुक्ति मिलती है।
  • लक्ष्मी कृपा और ऐश्वर्य वृद्धि: लक्ष्मी सहित नृसिंह स्वामी की आराधना जीवन में समृद्धि, धन लाभ और सभी प्रकार के ऐश्वर्य प्रदान करती है।
  • रक्षा और निर्भयता: निंबाद्रि नृसिंह भक्तों के लिए संकटमोचक हैं, जो सभी बाधाओं और शत्रुओं से रक्षा करते हैं।
  • आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष: यह प्रपत्ति भगवान में पूर्ण शरणागति सिखाती है, जो आध्यात्मिक प्रगति और अंततः मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है।
  • शांति और मन की स्थिरता: इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से मन में शांति और स्थिरता आती है, तथा मानसिक तनाव दूर होते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री निंबाद्री लक्ष्मीनृसिंह प्रपत्तिः क्या है?
यह निंबाद्रि क्षेत्र में विराजमान श्री लक्ष्मीनृसिंह स्वामी को समर्पित एक शरणागति स्तोत्र है। इसमें भक्त भगवान के चरणों में पूर्ण समर्पण की प्रार्थना करता है।
इस प्रपत्ति का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?
इस प्रपत्ति का पाठ प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद या शाम को दीपक जलाने के बाद किया जा सकता है। इसे शुद्ध मन से, भक्ति और श्रद्धा के साथ, शांत वातावरण में पढ़ना उत्तम है।
श्री निंबाद्री लक्ष्मीनृसिंह प्रपत्तिः के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इसके पाठ से पापों का नाश होता है, सांसारिक भय दूर होते हैं, धन, धर्म, सुख और मोक्ष की प्राप्ति होती है, लक्ष्मी की कृपा मिलती है और जीवन में शांति आती है।
इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
भगवान नृसिंह और लक्ष्मी देवी में श्रद्धा रखने वाला कोई भी भक्त इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है। विशेष रूप से संकटग्रस्त लोग, सुरक्षा चाहने वाले या आध्यात्मिक प्रगति की इच्छा रखने वाले इसे पढ़ सकते हैं।
इस प्रपत्ति का पाठ कितनी बार करना चाहिए?
अपनी सुविधानुसार इसे प्रतिदिन एक, तीन, पाँच या ग्यारह बार पढ़ा जा सकता है। नियमित पाठ अधिक फलदायी होता है।
इस प्रपत्ति का उद्भव या स्रोत क्या है?
यह प्रपत्ति प्राचीन काल से प्रचलित एक भक्ति स्तोत्र है, जो निंबाद्रि क्षेत्र में विराजमान लक्ष्मीनृसिंह स्वामी की महिमा का गुणगान करती है। इसके सटीक रचयिता ज्ञात नहीं हैं, लेकिन यह भक्ति परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

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